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30 November 2010

तरस जाता हूँ

कभी
हरे भरे ऊंचे पेड़
कुछ आम के
कुछ  नीम के
कुछ बरगद और
गुलमोहर के
दिखाई देते थे
घर की छत से

(फोटो:साभार गूगल)

 सड़क पर चलते हुए
 कहीं से आते हुए
कहीं को जाते हुए
कभी गरमी की
तपती धूप में
कभी तेज बरसते पानी में
या कभी
यूँ ही थक कर
कुछ देर को मैं
छाँव में बैठ जाता था

पर अब
बढती विलासिताओं ने
महत्वाकांक्षाओं ने
कंक्रीट की दीवारों ने
कर लिया है
इन पेड़ों का शिकार

(मोबाइल फोटो:मेरे घर की छत से)

ये अब दिखाई नहीं देते
घर की छत से
और न ही
किसी सड़क के किनारे
अब इन्हें पाता हूँ

दो पल के सुकून को
मैं तरस जाता हूँ.




(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

14 comments:

वीना श्रीवास्तव said...

सच में... आप क्या थके राहगीरों को भी थकान उतारने के लिए नीड़ की छांव तले राहत के दो पल नहीं मिलते....यही हैं कंकरीट के जंगल....बहुत अच्छा लिखा है...

36solutions said...

ये तड़फ जिन्‍दा रहे. धन्‍यवाद.

संजय भास्‍कर said...

वाह यशवंत जी...
सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।
.........बेहद खूबसूरत हैं

sheetal said...

yashwant ji aapne bahut sahi baat kahi hain.aajkal hamare charo aur concrete ka jungle hain,jo hum insaano ki hi den hain.par abhi kuch bigda nahi hain hum apni galati ko sudhaar sakte hain aur fir hariyaali ka samrajya basa sakte hain.
fir raaho main aam aur neem jaise ghane vriksh ke tale wahi khoya hua sukun paa sakte hain.

Shikha Kaushik said...

yashwant ji ! manav ki lalsaon ka hi fal hai ki prakriti ka ye haal ho gaya hai .bahut hi samyochit samasya ko apni kavita me uthhaya hai .badhai .

BrijmohanShrivastava said...

यशवन्त जी।आपके पापा का व्लाग पढ रहा था तब आपके व्लाग वाबत जानकारी हुई । दुर्भाग्य तो ये है दोसाल बाद पहली बार आपके ब्लाग पर आया ।कुरीतियों के खिलाफ वाले ब्लाग पर न पहुचा होता तो यहां भी नहीं आ पाता।छत से बहुत शानदार फोटो लिया है आपने ,लेकिन बृक्षो वाले चित्र का बात ही अलग है। सही है दुष्टों ने किस कदर नाश किया है बृक्षों का । इनके नीचे बैठने के सुकून की तो बात ही अलग है आपने बैठने के लिये तरसने वाली बात सही कही

डॉ. मोनिका शर्मा said...

बहुत सुंदर ...... सच खो गए हैं यह हरे भरे वृक्ष .....सार्थक सोच

सूफ़ी आशीष/ ਸੂਫ਼ੀ ਆਸ਼ੀਸ਼ said...

यशवंत,
मैं भी मुस्कुरा रहा हूँ...
वंस अपोन ए टाईम की बातें हैं सब.
जंगल तब भी था, जंगल अब भी है!
बस पेड़ बदल गए हैं!
आशीष
---
नौकरी इज़ नौकरी!

ashish said...

अच्छा है भाई, कंक्रीट के जंगल में मंगल कहा? सुन्दर अभिव्यक्ति.

vandan gupta said...

कंक्रीट के जंगल पर बेहद उम्दा प्रस्तुति…………सच कहा आज वो आलम देखने को कहाँ मिलता है।

Akshitaa (Pakhi) said...

..पर अंडमान में तो खूब पेड़ दिखते हैं.

_______________________
'पाखी की दुनिया ' में पाखी पहुँची पोर्टब्लेयर....

वाणी गीत said...

हमारी छत से तो खूब दिखेते हैं हरे -भरे पेड !
मगर आपने लिखा अच्छा है !

यशवन्त माथुर (Yashwant R.B. Mathur) said...

आदरणीया वीना जी,संजीव तिवारी जी,संजय भाई,शीतल जी,शिखा जी,ब्रिज मोहन जी,मोनिका जी,आशीष सर,आशीष,वंदना जी,प्रिय पाखी,एवं वाणी जी-आप सभी के उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.

वीना जी-आपका कहना सही है हर कोई आज भारी धूप में पेड़ों की ठंडी छाँव की तलाश में है.

पाखी-मुझे जान कर अच्छा लगा की अंडमान में खूब पेड़ हैं..खूब आनद लो इस हरियाली का.

वाणी जी-बहुत अच्छा लगा आप से सुन कर की आप के घर की छत से पेड़ दिखाई देते हैं.

यहाँ मैं एक बात और कहूँगा की लखनऊ में जहाँ मैं रहता हूँ यहीं पास में पहाडपुर नाम का गाँव/क़स्बा सा था (जिसका अब केवल नाम ही बाकी है) जहाँ काफी ऊँचे ऊँचे बरगद,कदम्ब और नीम के पेड़ थे और शायद इस इलाके में मिटटी के पहाड़ भी हुआ करते थे.अपनी आँखों से के सामने बचे खुचे पेड़ों को कटते देखा है सड़क चौडीकरण के नाम पर.मैं चाह कर भी अपने घर में पेड़ नहीं लगा सकता क्योंकि नए मकानों में .कम जगह होने के कारण बिल्डर लोग खुली जगह दे ही कहाँ रहे हैं.

यही कुछ विचार जो मन में आये बस उन्हें यहाँ रख दिया है.

DrRaghunath Mishr 'Sahaj' said...

shresht rachanaayen. badhaee.