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04 December 2010

ज़िन्दगी

हंसाती कम, रूलाती ज्यादा है ज़िन्दगी
टूटे कांच के ढेर पर, ठौर सजाती है ज़िन्दगी

ज़िन्दगी हसीं किताब है, जिसके हर हर्फ़ में शिकवे हैं
पल भर में अर्श को,सिफर बना देती  है जिंदगी

क्या कहूँ कि इतना नादाँ भी नहीं हूँ मैं
समझा यही फलसफा कि बेवफा है ज़िन्दगी.





(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

10 comments:

  1. भाई आप ऐसी ऐसी सोच कहाँ कहाँ से लाते हो

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  2. bahut hi achchi abhvyakti jindi ko lekar .

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  3. बहुत सुंदर ..... बस यही ज़िन्दगी है....

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  4. हंसाती कम, रूलाती ज्यादा है ज़िन्दगी
    टूटे कांच के ढेर पर, ठौर सजाती है ज़िन्दगी

    बस यही है ज़िन्दगी।

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  5. जिंदगी को लिखते समझते रहें...
    शुभकामनायें!

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  6. बहुत सुन्दर ....
    हंसाती कम, रूलाती ज्यादा है ज़िन्दगी ...एकदम सच कहा है आपने !

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  7. यह सच है कि हंसाती कम रुलाती ज्यादा है जिंदगी
    जिस नजरिए से देखो वही लगने लगती है जिंदगी


    लेकिन ऐसे सबक भी देती है जिसकी जरूरत हर कदम पर पड़ती है...
    इसलिए बेवफा मत कहिए...आप जीवन से वफा कीजिए जिंदगी आपसे वफा करेगी....

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  8. क्या कहूँ कि इतना नादाँ भी नहीं हूँ मैं
    समझा यही फलसफा कि बेवफा है ज़िन्दगी
    सुन्दर अभिव्यक्ति.
    ज़िन्दगी की हक़ीक़त बयान करता हुआ मेरा एक शेर:-
    ज़िन्दगी जीना है गर आसान तो मुश्किल भी है,
    इस तरफ तूफ़ान है तो उस तरफ साहिल भी है.

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  9. बस यही ज़िन्दगी है

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  10. आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद!

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