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06 December 2010

विविधता में एकता

दिन भर
घर के बाहर की सड़क पर
खूब कोलाहल रहता है
और सांझ ढलते
सड़क के दोनों किनारों पर
लग जाता है मेला
सज जाती हैं दुकानें
चाट के ठेलों की
और कहीं
पटरी पर
पुराने गरम और सूती कपड़ों
की दुकानें
५० रुपये की शर्ट खरीदने को
जुटी हुई भीड़
कहीं कारों से उतरती हुईं
मेम
जो उस पार खड़े ठेले से
खरीद रही हैं
ताज़ी हरी सब्जियां
और उनके साथ वो छोटे बच्चे
अपनी मॉम से 
मचल रहे हैं
बैलून खरीदने  को
और मेरे  बगल में रहने  वाला
नन्हा छोटू
झगड़ रहा है
उस गुब्बारे के लिए
अपने बाबा के साथ 

मैं महसूस करता हूँ
विविधता में एकता को
अँधेरे के गहराने के साथ
सड़क का ये कोलाहल
शांत होने पर
घरों पर 
तेज आवाज़ में चिल्लाते
टीवी के थमने पर  
आखिर सब सो ही तो जाते हैं
कुछ मखमली गद्दों में
और कुछ
आसमां की छत के  नीचे
एक नयी सुबह की आस बांधे

सोना और जगना-
इसमें कोई भेद नहीं है
अमीर गरीब का
जाति औ धर्म का

बस तरीके अलग हैं
सोने और जागने के
कुछ सोते हुए जागते हैं
और कुछ
जागते हुए सोते हैं

आखिर कहीं तो है एकता

विविधता में एकता ! 

14 comments:

  1. बहुत सुन्दर चित्र खींचे हो भाई शब्दों से ... बधाई !

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  2. आपकी अनुभूति विविधता में एकता को उद्घाटित करने में सफल रही है!

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  3. बहुत सुंदर चित्रण....ढूंढने पर ऐसी ही शायद कुछ और एकता मिल जाए पर विषमताएं तो सर्वत्र विद्यमान हैं....जिसके बीच की खाई बढ़ती ही जा रही है....वह एकता की विविधता है....बहुत संवेदनशील विषय है...आपने अपनी रचना के साथ पूरा न्याय किया है....भावपूर्ण अभिव्यक्ति

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
    विचार-प्रायश्चित

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  5. भावपूर्ण संवेदनशील रचना .......

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  6. akhir kahin to hai ekta
    vividhta me ekta
    vishamta me khojti hai ekta aapki rachna...
    achchha post!

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  7. भावमय करते शब्‍द ..।

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  8. bahut badhiya dhang se vividhata me ekta ko paribhaashit kiya hai....aabhaar

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  9. बहुत खूबसूरती से आसपास की बातों को कविता में प्रस्तुत किया है और उन्हें देखने का यह दृष्टिकोण भी पसंद आया.

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  10. अच्छा लगा पढ़ कर

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  11. bahut khoob, aankhon ke aage chitr khinch gaya.

    shubhkamnayen

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  12. इतने सारे हिट मिले ये तो अच्छी बात है .. बधाई हो ...

    ReplyDelete

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