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08 March 2011

वो जानती है

आज फिर
वो चली आई
अपने काम पर
रोज की तरह
वही कूड़ा बीनना 
कहीं ईटों को 
सर पर ढोना
कहीं कपड़ों को धोना
कहीं खाना बनाना
और बदले में 
पिटना,गालियाँ खाना 
हर शाम 
सहना वार 
अपने तन पर 

वो डरी हुई है 
आज भी 
सहमी हुई है 
घूरती आँखों में तैरते 
अनजान 
लाल डोरों को देख कर 
वो कांपती है 
सर्द रातों में 
जलते अलावों को
देख कर
वो ठिठुरती है 
भरी गर्मी में 
ठन्डे पानी की 
धार को देख कर  

वो
बेखबर है
अखबारों में छपती
अनोखी रंगीन दुनिया से
उस दुनिया से
जो दिखाती है
एक नयी तस्वीर 
खूबसूरती के बदलते 
मायनों की 
एक नयी तहजीब की 
सभ्यता की 
विकास की
मन में 
सुलगती हुई 
बदले की आग की

उसकी नज़रों में 
ये सब
निरर्थक है 
क्योंकि 
वो जानती है 
ये रस्मी दिन 
अगले साल 
फिर लौटकर 
आना है!

17 comments:

Coral said...

उसकी नज़रों में
ये सब
निरर्थक है .............

बहुत सच लिखा है आपने ....

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

वो
बेखबर है
अखबारों में छपती
अनोखी रंगीन दुनिया से
उस दुनिया से
जो दिखाती है
एक नयी तस्वीर
खूबसूरती के बदलते
मायनों की
एक नयी तहजीब की
सभ्यता की
विकास की
मन में
सुलगती हुई
बदले की आग की

सुन्दर अभिव्यक्ति !

डॉ. मोनिका शर्मा said...

सुंदर भाव लिए रचना ...बेहतरीन

सदा said...

बहुत ही सुन्‍दर ।

निवेदिता श्रीवास्तव said...

उसकी बेखबरी ही हमारी नाकामयाबी की दास्तान है ....
अच्छी भावाभिव्यक्ति ,शुभकामनायें ।

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

बहुत सुन्दर ! वाह !

रजनीश तिवारी said...

बहुत अच्छी रचना ...

Dr (Miss) Sharad Singh said...

वो डरी हुई है
आज भी
सहमी हुई है
घूरती आँखों में तैरते
अनजान
लाल डोरों को देख कर
वो कांपती है
सर्द रातों में
जलते अलावों को
देख कर
वो ठिठुरती है ....

बहुत सुन्दर शब्दचित्र ....बहुत सुन्दर प्रस्तुति..
भावपूर्ण कविता के लिए हार्दिक बधाई।

मनोज कुमार said...

रचना अच्छी लगी।

Unknown said...

उस दुनिया से
जो दिखाती है
एक नयी तस्वीर
खूबसूरती के बदलते
मायनों की
एक नयी तहजीब की
सभ्यता की
विकास की
मन में
सुलगती हुई
बदले की आग की


भावपूर्ण कविता के लिए हार्दिक बधाई।

Deepak Saini said...

बहुत बढिया भावपूर्ण कविता
शुभकामनायें

यशवन्त माथुर (Yashwant R.B. Mathur) said...

आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद!

VenuS "ज़ोया" said...

hmm wo jaanti he ....उसकी नज़रों में
ये सब

निरर्थक है
क्योंकि
वो जानती है
ये रस्मी दिन
अगले साल
फिर लौटकर
आना है!
aapne jo bhaaw ukeren hain..unke aage kuch bhi kehan faaltu sa lg rha he...jahan ik tarf ahum women day ki baat kr rhe hain..wahin..aaj bhi aurat ki halat hum sab se chupi nhi he
bahut hi ..sarthak pryaas..prbhaawshaali rchna

Unknown said...

bahut hi ummda lekhan hai aapka, aap isi tarah achchhi rachnayen prakashit karte rahen. all the best.

संजय भास्‍कर said...

बहुत सुन्दर शब्दचित्र.....भावपूर्ण कविता

संजय भास्‍कर said...

गहन अनुभूतियों की सुन्दर अभिव्यक्ति ...
चित्र भी बहुत अच्छा है।

Ravi Rajbhar said...

Dars se bhari bhawpoorn rachna ke liye badhai.