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01 September 2011

मुक्त होना चाहता हूँ --

 (1)
बदन को छू कर
निकल जाने वाली हवा से
गर्मी की लू से
जाड़ों की शीत लहर से
मन भावन बसंत से,
बरसते सावन से
हर कहीं दिखने वाली
रोल चोल से
चहल पहल से
खामोशी से
तनहाई से
खुशी से -गम से
खुद से ,खुद की परछाई से
इस कमजोर दिल  से
मुक्त होना चाहता हूँ। 


(2)
ये मुक्त होने की चाह
सिर्फ चाह रहेगी
पत्थरों की बारिश मे
सिर्फ एक आह रहेगी
आह रहेगी;
मन की बेगानी महफिलों मे
रहेगा जिसमे संगीत
यादों का
कुछ कही-अनकही बातों का 
इस सुर लय ताल पर
हिलता डुलता सा
थिरकता सा
तुम्हारा अक्स
मुझे फिर कुलबुलाएगा
मुक्त हो जाने को ।

32 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर।
गणशोत्सव की शुभकामनाएँ।

sushma verma said...

ये मुक्त होने की चाह
सिर्फ चाह रहेगी
पत्थरों की बारिश मे
सिर्फ एक आह रहेगी
आह रहेगी;....बहुत ही खुबसूरत और भावमयी रचना....

Dr Varsha Singh said...

गहन अनुभूतियों की सुन्दर अभिव्यक्ति ... हार्दिक बधाई.

Maheshwari kaneri said...

खुद से ,खुद की परछाई से
इस कमजोर दिल से
मुक्त होना चाहता हूँ। ..बहुत सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति....

Shikha Kaushik said...

बहुत सार्थक अभिव्यक्ति .मुक्ति की चाह सभी को रहती है .आभार

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत बढ़िया!
माँ सरस्वती आपकी लेखनी में विराजमान है।
गणेशोत्सव की शुभकामनाएँ!

रेखा said...

ये मुक्त होने की चाह
सिर्फ चाह रहेगी
पत्थरों की बारिश मे
सिर्फ एक आह रहेगी

सुन्दर अभिव्यक्ति .

Dr (Miss) Sharad Singh said...

अत्यंत हृदयस्पर्शी...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

यह मुक्त होने की चाह ... मन की कश्मकश को कह रही है ..गहन वेदना महसूस हुयी पढते हुए ...

निराशा में भी आगे बढने की चाह भी दिखी ...अच्छी प्रस्तुति

डॉ. मोनिका शर्मा said...

बहुत खूब.... बेहतरीन प्रस्तुति...

Shalini kaushik said...

इस सुर लय ताल पर
हिलता डुलता सा
थिरकता सा
तुम्हारा अक्स
मुझे फिर कुलबुलाएगा
मुक्त हो जाने को ।
भावात्मक अभिव्यक्ति.
फांसी और वैधानिक स्थिति

Rajesh Kumari said...

bahut achchi kavitayen.ganeshchaturthi ki badhaaiyan.

www.navincchaturvedi.blogspot.com said...

सुंदर कवितायें प्रस्तुत करने के लिए बधाई

Jyoti Mishra said...

wow that was so subtle and emotional...
very well written !!

रश्मि प्रभा... said...

कितनी सहजता है इस चाह में ... कोई बनावट नहीं , वाह

संध्या शर्मा said...

तनहाई से
खुशी से -गम से
खुद से ,खुद की परछाई से
इस कमजोर दिल से
मुक्त होना चाहता हूँ।

ये मुक्त होने की चाह
सिर्फ चाह रहेगी ...
अति सुन्दर जीवन के दोनों पहलु को दर्शाती रचना... गणेश उत्सव की हार्दिक शुभकामनायें...

vandan gupta said...

मन की कशमकश की सुन्दर प्रस्तुति।

अनुपमा पाठक said...

मुक्त होने की स्वाभाविक सी चाह को सुन्दर अभिव्यक्ति मिली है!

monali said...

Mukti ki chah har baar poori kahaan hi hoti h... sundar rachna :)

Anupama Tripathi said...

आपकी किसी पोस्ट की चर्चा शनिवार ३-०९-११ को नयी-पुरानी हलचल पर है ...कृपया आयें और अपने विचार दें......

Anonymous said...

मुक्त हो जाना ही अंतिम अवस्था है.........अनुभवों के लम्बे दौर से गुज़र कर ही कोई मुक्त हो सकता है|

Amrita Tanmay said...

खुबसूरत रचना ,बहुत सुन्दर।

Deepak Saini said...

अत्यंत हृदयस्पर्शी..
सुन्दर अभिव्यक्ति

Sadhana Vaid said...

मुक्ति की यह कामना दिल की वेदना को अनजाने ही मुखरित कर जाती है ! बहुत ही सुन्दर रचना ! बधाई तथा गणेशोत्सव की हार्दिक शुभकामनायें !

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

बहुत बढ़िया....
सादर...

Anita said...

खुशी से -गम से
खुद से ,खुद की परछाई से
इस कमजोर दिल से
मुक्त होना चाहता हूँ।
जिसके भीतर यह मुक्ति की चाह उठी वह मंजिल की ओर कदम बढा ही चुका है... बधाई!

Unknown said...

ये मुक्त होने की चाह
सिर्फ चाह रहेगी ...

खुबसूरत रचना

Kailash Sharma said...

बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति..

सु-मन (Suman Kapoor) said...

bahut sundar..mukti hi niyati hai

सुनीता शानू said...

चर्चा में आज नई पुरानी हलचल

निवेदिता श्रीवास्तव said...

बहुत प्रभावी अभिव्यक्ति ...... शुभकामनायें !

दिगम्बर नासवा said...

चाह तो होती है पर काश मुक्त होना आसान होता ...