प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

वेब सर्च (Enter your keywords to search on web)

09 October 2011

डगमगाते कदम

जब चलना सीखा था
बचपन मे
दादा दादी की
मम्मी की पापा की
उँगलियों को थाम कर
ज़मीन पर खड़े होना
और फिर चलना
कभी दीवार  का सहारा लेकर
चलने की कोशिश
अक्सर गिरना
गिर कर रोना
उठना, संभलना और चलना
डगमगाते कदमों को 
प्रेरणा मिल ही जाती थी
तालियों की
मुस्कुराहटों की
बल मिल ही जाता था
ज़मीन पर स्थिर करने को
नन्हें नन्हें कदमों को

वो बचपन का दौर था
ये जवानी का दौर है
बीतते जाते हर पल की
नयी कहानी का दौर है

कदम अब भी लड़खड़ाते हैं
डगमगाते हैं
चोटिल होते हैं संभलते हैं
चलते जाते हैं

डगमगाना ज़रूरी है
गिरना ज़रूरी है
गुरूर और सुरूर को
ज़मीन पर लाने के लिये
आत्ममंथन के लिये
परिवर्तन के लिये
ज़रूरी हैं
ये डगमगाते हुए से कदम! 

33 comments:

रविकर said...

सुंदर प्रस्तुति |
बधाई |।

POOJA... said...

waah waah...
wakai bahut hi jaroori hai girna aur sambhlkar uthna... har baar girne par ham kuch naya seekhte hain...
"girte hain sahsavaar hi madaan-e-jung mei..."
parantu wo bachpan ka girna to yaad nahi haam dadi k munh se bahut si baatein suni thi tab kee...

रजनीश तिवारी said...

इसी का नाम ज़िंदगी ... आत्ममंथन ।

रश्मि प्रभा... said...

डगमगाना ज़रूरी है
गिरना ज़रूरी है
गुरूर और सुरूर को
ज़मीन पर लाने के लिये
आत्ममंथन के लिये
परिवर्तन के लिये
... कितना गहन अध्ययन किया है - उम्र के इस मोड़ पर यदि यह हौसला और स्वीकृति है तो मंजिल बेख़ौफ़ होगी

संध्या शर्मा said...

गुरूर और सुरूर को
ज़मीन पर लाने के लिये
आत्ममंथन के लिये
परिवर्तन के लिये
गिरना ज़रूरी है...
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति... गिरकर उठना, उठकर संभलना यही तो रीत है जिंदगी की...

विशाल said...

बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति.

ज़िन्दगी है तो डगमगाएगी
कभी पुकारेगी
कभी गुनगुनायेगी
कभी रोयेगी
कभी मुस्कराएगी
मौत नहीं है जो खामोश हो जायेगी.

मीनाक्षी said...

कविता की अंतिम पंक्तियाँ बेहद प्रभावशाली...और पीछे बजता संगीत मन मोहता है...

Dr Varsha Singh said...

सुन्दर प्रतीक ... संवेदनशील रचना ...
आपने बहुत सुन्दर शब्दों में अपनी बात कही है। शुभकामनायें।

डॉ. मोनिका शर्मा said...

बहुत गहरी बात ...डगमगाने के बाद संभलने के सही मायने समझ आते हैं...

Maheshwari kaneri said...

डगमगाना ज़रूरी है
गिरना ज़रूरी है
गुरूर और सुरूर को
ज़मीन पर लाने के लिये
आत्ममंथन के लिये
परिवर्तन के लिये
ज़रूरी हैं
ये डगमगाते हुए से कदम! ...सही कहा यशवंत..बहुत गहन भाव लिये सुन्दर अभिव्य्क्ति..शुभकामनायं..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

डगमगाना जरुरी है....
वाह! सार्थक चिंतन... सक्षम अभिव्यक्ति....
सुन्दर रचना पर बधाई के साथ
एक सुमधुर गीत सुनवाने के लिये सादर आभार

Amrita Tanmay said...

डगमगा कर ही संतुलित हुआ जाता है..अतिसुन्दर.

vandan gupta said...

बहुत गहरी बात कह दी………………गहन चिन्तन्।

सदा said...

बहुत ही बढि़या .. आभार ।

Pallavi saxena said...

गहन चिंतन वाकई डगमगाना ज़रूरी है संभालने के लिए बहुत खूब ....
समय मिले तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
http://mhare-anubhav.blogspot.com/

Anita said...

जीवन के टेढ़े-मेढे रास्तों पर चलने के लिये प्रेरित करती पंक्तियाँ !

sushila said...

चिन्तन लिये सुंदर अभिव्यक्ति जो पाठक को बाँधे रखती है ! बधाई !

मेरा मन पंछी सा said...

बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति.

Satish Saxena said...

डगमगाने से ही सीखेंगे ....
शुभकामनायें आपको !

रोली पाठक said...

आत्ममंथन के लिए परिवर्तन ज़रूरी है.....
बहुत उम्दा रचना..

babanpandey said...

saarth...parents are real teacher

अनुपमा पाठक said...

डगमगाते कदम ही आगे चल कर सुदृढ़ता का मार्ग प्रशस्त करते हैं!
सुन्दर चिंतन!

निवेदिता श्रीवास्तव said...

बहुत अच्छा लिखा है .... अभिव्यक्ति सशक्त होती जा रही है ....शुभकामनायें !

Sonroopa Vishal said...

इस सोच को स्वीकार्य किया है कविता के माध्यम से यानि स्वयं ने भी स्वीकारा .....बहुत उम्दा सोच .

G.N.SHAW said...

इसी लिए कहते है - जब तक ठोकर न लगे , जिंदगी के मायने समझ में नहीं आते ! बहुत सुन्दर , बधाई !

Prem Prakash said...

डगमगाना ज़रूरी है आत्ममंथन के लिये...परिवर्तन के लिये...!

Anonymous said...

सुन्दर भावों को दर्शाती एक सुन्दर पोस्ट|

BS Pabla said...

परिवर्तन के लिये
ज़रूरी हैं
ये डगमगाते हुए से कदम

सटीक

Raveesh Kumar Pandey said...

aachee prastuti hai yashwant ji

यशवन्त माथुर (Yashwant R.B. Mathur) said...

आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद!

Prakash Jain said...

डगमगाना ज़रूरी है
गिरना ज़रूरी है

ye panktiyan jeevan ka marm keh jaati hai
bahut badhiya likhte hain aap...

www.poeticprakash.com

दिगम्बर नासवा said...

सच कहा है गिरने की बाद ही उत्जने का स्वाद आता है ...