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16 October 2011

बेबस मन.....

(Photo curtsy:Google image search)










कागज के किरचों की तरह 
कभी कभी
बिखरता है मन
उड़ता जाता है
कितनी ही ऊंचाइयों को
छूता जाता है
हवा की लहरों के संग
कितने ही सँकरे
तीखे मोड़ों से गुज़र कर
टुकड़ा टुकड़ा टकरा कर आपस मे
छू लेता है ज़मीन को
थक हार कर
बेबस मन...
कागज के किरचों की तरह!

35 comments:

Onkar said...

सुन्दर पंक्तियाँ

Suresh kumar said...

मन के भावों को दर्शाती बहुत ही शानदार कविता ..

मेरा मन पंछी सा said...

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति है

Kailash Sharma said...

बहत भावपूर्ण प्रस्तुति..

Maheshwari kaneri said...

अत्यंत सहज और मनोभाव को दर्शाती प्रस्तुति...

निवेदिता श्रीवास्तव said...

very nice ......

अनुपमा पाठक said...

मन बिखरता है... पर पुनः क्षीण होती शक्तियों को समेट नए क्षितिज की ओर निकल भी तो पड़ता है!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

monali said...

Sach hi to h... lakh koshish kar le udne ki.. koi kheench hi leta h ise wapas zameen pe..

रजनीश तिवारी said...

कितना भी उड़ ले पर वापस जमीन पर आ जाता है ... बहुत सुंदर भाव

Prakash Jain said...

wah kya baat hai...kagaz ke jariye mann ko badi sahajta se pravahit kiya hai yashwantji....

www.poeticprakash.com

Unknown said...

वाह.... यशवंत बेहतरीन , उम्दा काव्य शुभकामनाएं

Anonymous said...

सुभानाल्लाह.........बहुत खुबसूरत.........मन की भटकन को बहुत सुन्दरता से शब्द दिए हैं आपने.......हैट्स ऑफ इसके लिए|

www.navincchaturvedi.blogspot.com said...

मन और कागज़ की किरचें। बहुत खूब यशवंत भाई।

sushma verma said...

थक हार कर
बेबस मन...
कागज के किरचों की तरह!बेहद खुबसूरत....

***Punam*** said...

कागज के किरचों की तरह
कभी कभी
बिखरता है मन
उड़ता जाता है
कितनी ही ऊंचाइयों को
छूता जाता है
हवा की लहरों के संग
कितने ही सँकरे
तीखे मोड़ों से गुज़र कर
टुकड़ा टुकड़ा टकरा कर आपस मे
छू लेता है ज़मीन को
थक हार कर
बेबस मन...
कागज के किरचों की तरह!


और फिर उभरते हैं उसमें कुछ अक्षर...
कुछ सीधे-साधे,कुछ टेढ़े-मेढ़े
और फिर कागज की किरचें जुड़ने लगती हैं
और कुछ ऐसी ही रचना आकार ले लेती है....
स्वतः ही..........!!

सागर said...

behreen rachna....

सदा said...

वाह ...बहुत ही बढि़या ।

संध्या शर्मा said...

बेबस मन कागज़ की किरचों की तरह, फिर जुड़ती किरचें और आकार लेती रचना ... बहुत सुन्दर रचना

Anita said...

कागज की किरचें तो नहीं सुनीं थीं कांच की किरचें और कागज की कतरनें या चिन्दियाँ... लेकिन मन के स्वभाव को बहुत गहराई से समेटा है कविता में...

नीरज गोस्वामी said...

बेजोड़ रचना...कागज़ की किरचें...नया प्रयोग है

नीरज

रेखा said...

सुन्दर अभिव्यक्ति ...

रश्मि प्रभा... said...

कागज के किरचों की तरह
कभी कभी
बिखरता है मन... समेटते हुए कितना कुछ दरकता जाता है !

Unknown said...

कागज़ कि किरचें ..अनुपम कल्पना ..मन कि बेबसी का बयां ...बहुत खूब यशवंत जी ...शुभ कामनाएँ !!!

Rachana said...

बिखरता है मन
उड़ता जाता है
कितनी ही ऊंचाइयों को
छूता जाता है
हवा की लहरों के संग
bahut hi khoob
aunder bimb
rachana

डॉ. मोनिका शर्मा said...

बहुत ही सुन्दर....बेजोड़ कविता ..

सदा said...

कल 19/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

दिगम्बर नासवा said...

भावुक कर गई आपकी रचना ... मन की गहराई से लिखा है ...

Pratik Maheshwari said...

बड़ा ही बेबस हो जाते हैं हम और हमारा यह मन कभी कभी..
समानता बहुत है उन उड़ते हुए कागज़ों और इस बेबस मन में..

Dr.NISHA MAHARANA said...

कभी कभी
बिखरता है मन
उड़ता जाता है
कितनी ही ऊंचाइयों को
छूता जाता है.
वास्तव में मन हमं बेबस बना देता है।अच्छी रचना।

Jyoti Mishra said...

short but intense..
lovely read !!

कुमार राधारमण said...

बस,दिशा देने की ज़रूरत है मन को।

Kailash Sharma said...

बहत सुन्दर कल्पना...सुन्दर और भावमयी अभिव्यक्ति..

Anonymous said...

बहुत बढि़या।

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

अच्छी रचना सुंदर पोस्ट,बधाई ....