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25 December 2011

अंकल सेंटा नहीं जाना (बाल कविता )

आप सभी को क्रिसमस की ढेर सारी बधाइयाँ। इस अवसर पर प्रस्तुत है बाल कविता लिखने का मेरा पहला प्रयास-


दूर देश से आ कर के
झोली भर खुशियाँ दे जाना
अबकी बार जो आए तो
अंकल सेंटा नहीं जाना।
(चित्र:साभार गूगल इमेज सर्च )

ज़िंगल बेल्स की प्यारी धुन 
और क्रिसमस ट्री सजा हुआ है
दुनिया का कोना कोना 
स्वप्नलोक सा बना हुआ है।

नहीं रहे कहीं जात धर्म
रंगभेद दूर हटा जाना
गुरबत मे जीने वालों को
एक नयी राह दिखा जाना।

हम मानव हैं मानव बनें 
माँ बहनों का सम्मान करें 
मिलजुल रहें दुनिया के वासी
नहीं खुद पर अभिमान करें। 

और कुछ चाहिये नहीं हमको
बस संकल्प नेक करा जाना
और जब तक कोई समझ सके ना
अंकल सेंटा नहीं जाना।

~यशवन्त यश ©  

19 December 2011

जिंदगी के मेलों में.......

जिंदगी के मेलों में, मैं देख रहा हूँ तमाशे
कहीं ठेलों पर बिकती चाट, और कहीं पानी बताशे *

खट्टा सा है स्वाद खुशी का ,कहीं गम मीठे लगते हैं
जलजीरे मे कभी मिठास, कभी शर्बत तीखे लगते हैं

पीना है फिर जीना है,जी जी का जंजाल हुआ
इससे पहले कभी न जाना ,लंगोटिया और कंगाल हुआ

जीवन की इन रेलों में ,बड़े अजीब से मेलों में
सबको हँसते देखा है,जब जोकर भी रो देता है। 

-----
*गोलगप्पे

16 December 2011

तकिया कलाम

कहते हैं खाली दिमाग शैतान का घर होता है और जब शैतान सिर पर सवार हो जाए तो बचना मुश्किल होता है। इसी मनः स्थिति मे लिखी गयी बे सिर पैर की यह पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं--

एक शब्द
जो अक्सर
रह रह कर
आता रहता है
जुबां पर
कभी जाने
कभी अनजाने
हर देश, काल
परिस्थिति मे
सिद्ध करता हुआ
अपनी सार्वभौमिकता
उम्र और रिश्तों के
शिष्टाचार को तोड़ता हुआ
हर बंधन से स्वतंत्र
हर प्रतिक्रिया की
क्रिया में
अदृश्य रूप मे सदृश्य
कभी कारण
कभी अकारण
उस एक शब्द को
जिसे चाहता है
हर खास ओ आम
कहलाता है
तकिया कलाम :)

13 December 2011

मकान

बन रहा है
एक मकान
मेरे घर के सामने
ईंट ईंट जोड़कर
दो नहीं
तीन मंज़िला
सुंदर सा मकान
जिसके तीखे नयन नक्श  पर
फिदा हो जाए 
देखते ही कोई भी
मगर मौका नहीं किसी को
कि भीतर झांक भी ले
सूरज की किरणें हों
या चाँद की चाँदनी
कंक्रीट की छत
कर रही है
हर ओर पहरेदारी
मुख्य द्वार से
भीतर तक

मुझे पता है
आने वाले हैं
कुछ दिन में
ए सी
करने वाले हैं
स्थायी गठबंधन
दीवारों से
मंद मंद हवा  के साथ
रूम फ्रेशनर की
भीनी भीनी खुशबू
भीतर से बाहर तक महकेगी
क्योंकि
घर के बाहर लगा
हरसिंगार का पेड़
हो गया है
अतीत की बात

आज उस मकान पर
टंग  गया है
काला सा डरावना मुखौटा
ठीक वैसे ही
जैसे शिशु के माथे पर
काला काजल
लगाया जाता है
मेरे जैसी
बुरी नज़रों से बचने को !


(कल्पना पर आधारित )

10 December 2011

माटी की याद .....

विदेश में प्रवास कर रहीं अपनी एक फेसबुक और ब्लॉगर मित्र से चैट पर बात करने के बाद लिखी गयी यह पंक्तियाँ उनको और सभी प्रवासी भारतियों को समर्पित कर रहा हूँ---
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अपनी माटी की
सोंधी सी महक से
मीलों दूर
अपने सपनों की धरती पर
उड़न खटोले से
आ उतरने के बाद
मैंने कोशिश तो बहुत की
कि भूल जाऊं
उन तंग गलियों को
छुटपन मे भाग  भाग कर
जिनमे खेला करता था

कोशिश तो बहुत की
कि भूल जाऊं
गली के उस पार
काका की
कोने वाली दुकान को
जहाँ मैं लेता था स्वाद
गरम गरम जलेबी का
और अक्सर
झगड़ता था उनसे
100 ग्राम तौलने के बाद भी
एक जलेबी और
बढ़ा कर देने को

कोशिश तो बहुत की
कि भूल जाऊं
उस स्कूल को
जिसने दिया एक आधार
इस मुकाम तक आने का

कोशिश तो बहुत की
कि भूल जाऊं
घर घर मे खिलने वाले
देसी लाल गुलाब की
मादक खुशबू को

मगर न चाह कर भी
बे इंतिहा
आ रही है याद 
अपनी उसी माटी की
जहां अब भी
मेरे अपनों के बीच
कहीं छुपा बैठा है
मेरा दिल

भीगती आँखों से
गिरते आंसुओं मे
तैर रहा है अक्स
'काबुलीवाला'  का

मजबूरी के पिंजरे मे
कैद हो कर
गुनगुना रहा है
मेरा तन और मन-

'ऐ मेरे प्यारे वतन
ए मेरे बिछुड़े चमन 
तुझ पे दिल कुर्बान !'

07 December 2011

परिवर्तन हो कर रहेगा

 17 मार्च 2011 को लिखी गयी यह पंक्तियाँ ड्राफ्ट की कैद से आज़ाद हो कर अब आपके सामने हैं-

वो कहते हैं
भूल जाओ जन को
क्या होगा
उनकी
आवाज़ बन कर
तुम जिन को
सुनाना चाहते हो
और जिन की
कहना चाहते हो
वो नहीं सुन रहे
तुम्हारी
उलटे हंस रहे हैं
तुम्हारे
बड़बोलेपन पर
तुम्हारी सोच पर
शायद एक
नवीन सोच!
माना  कि
सार्थक है
माना  कि
परिवर्तन हो सकता है
किन्तु कैसे ?

मैं कहता हूँ
परिवर्तन हो सकता है
हो कर रहेगा
यदि
मैं चाहूँ तो
यदि
तुम चाहो तो
यदि
हम चाहें तो
कोई माने
न माने
तुम मानो
न मानो
अगर यह
बड़बोलापन है
तो मैं बोलूँगा
बोलता रहूँगा
कोई एक तो होगा
इस भीड़ में
मुझ को सुनने वाला
समझने वाला
मेरी राहों पर
मेरे साथ चलने वाला
एक एक करके
बन जाएगा रेला
देर से ही सही
मेरी बात पहुंचेगी
सबके कानों तक
और तब
तुम भी आओगे
मेरा हाथ थामने
सहगामी  बनने
स्वीकारोगे 
परिवर्तन को
जो हो चुकेगा
तब तक.

04 December 2011

जाना तो होगा ही

जाना तो होगा ही
आज नहीं तो कल
एक दिन
एक हल्की सी आहट
बुलावे की
और फिर
दीवार पर टंगी
किसी तस्वीर की जगह
पाना खुद को होगा ही
जाना तो होगा ही

जाना तो होगा ही
मैं चाहूँ न चाहूँ
तुम चाहो न चाहो
शायद पहले मैं
या मुझ से पहले तुम
कितनी ही क्यों न हो अंतरंगता
एक दिन
टूट कर 
बिखरना तो होगा ही

जाना तो होगा ही ।

01 December 2011

'अनजाना' और 'पार' (मम्मी की दो कविताएं)

 आज प्रस्तुत हैं मम्मी की लिखी दो नयी कविताएं --


(श्रीमती पूनम माथुर )
अनजाना

पुराना था एक सपना
उसमे झलका अपना
कब होगा उसका आना
कब होगा मेरा जाना

आयेगा एक मस्ताना
उसको बना देगा दीवाना
यह है उसका अफसाना
कौन है वह अनजाना
         *

पार

बढ़ना था
चढ़ना था
गिरना था
उठना था
प्यार था
झगड़ा था    
सबेरा था
साँझ था
हौसला था
घोंसला था
भूत था
वर्तमान था
भविष्य था
मझधार था
उतरना था
नाव था
माझी था
फासला था
दूर था
जाना था
पार ।