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15 July 2012

जिंदगी ये भी है


जिंदगी ये भी है कि, सीख कर ककहरा
लिख दूँ इबारत, एक मुकम्मल तस्वीर की

जिंदगी ये भी है कि, खाक छान कर गलियों की
जला कर शाम को चूल्हा, तस्वीर देखूँ तकदीर की

हूँ उलझन में बहुत ,जलते चराग देख कर
रोशन हैं अरमां कहीं ;कहीं सिसकते राख़ बन कर 

जिंदगी ये भी है कि ,महलों की बदज़ुबानी के साये तले
बगल की बस्ती में, बाअदब गुलाब महकते हैं। 


©यशवन्त माथुर©

23 comments:

Anupama Tripathi said...

ज़िंदगी के पहलू बहुत शिद्दत से उकेरे हैं ....बहुत भाव प्रबल रचना बनी है ...!!
बधाई एवम शुभकामनायें...यशवंत .

sushma verma said...

बेहतरीन अंदाज़..... सुन्दर
अभिव्यक्ति........

ANULATA RAJ NAIR said...

बहुत सुन्दर यशवंत.....
बहुत सुन्दर ख़याल............

सस्नेह
अनु

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बहुत सुदर रचना

Maheshwari kaneri said...

जिंदगी ये भी है कि ,महलों की बदज़ुबानी के साये तले
बगल की बस्ती में, बाअदब गुलाब महकते हैं। ......वाह: बहुत भावपूर्ण रचना..बहुत सुन्दर...यशवंत

संध्या शर्मा said...

जिंदगी ये भी है कि ,महलों की बदज़ुबानी के साये तले
बगल की बस्ती में, बाअदब गुलाब महकते हैं।
लाज़वाब रचना... बधाई

shalini rastogi said...

बहुत खूब!

Noopur said...

जिंदगी ये भी है.... :)

डॉ. मोनिका शर्मा said...

हूँ उलझन में बहुत ,जलते चराग देख कर
रोशन हैं अरमां कहीं ;कहीं सिसकते राख़ बन कर
बहुत उम्दा....

निवेदिता श्रीवास्तव said...

ज़िन्दगी के इतने सारे रंग समेट लिए ......... शुभकामनाएं !

विभा रानी श्रीवास्तव said...

जिंदगी ये भी है कि ,महलों की बदज़ुबानी के साये तले
बगल की बस्ती में, बाअदब गुलाब महकते हैं।
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .... !

मेरा मन पंछी सा said...

सुन्दर भाव लिए रचना यशवंत जी..

Anonymous said...

very nice

सदा said...

वाह ... बेहतरीन भाव

Anju (Anu) Chaudhary said...

bahut khub

Shashiprakash Saini said...

bahut sundar rachna

Anonymous said...

हूँ उलझन में बहुत ,जलते चराग देख कर
रोशन हैं अरमां कहीं ;कहीं सिसकते राख़ बन कर
Bahut sundar rachna...

Anonymous said...

हूँ उलझन में बहुत ,जलते चराग देख कर
रोशन हैं अरमां कहीं ;कहीं सिसकते राख़ बन कर
bahut sundar rachna..

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

भिन्न भिन्न रूपों में साँस लेती ज़िंदगी...सुंदर प्रस्तुति !

हरकीरत ' हीर' said...

जिंदगी ये भी है कि, सीख कर ककहरा
लिख दूँ इबारत, एक मुकम्मल तस्वीर की

जिंदगी ये भी है कि, खाक छान कर गलियों की
जला कर शाम को चूल्हा, तस्वीर देखूँ तकदीर की

संगीत और शब्दों का जादू एक साथ .....
वाह ....!!

Madan Mohan Saxena said...

वाह बहुत खूबसूरत अहसास हर लफ्ज़ में आपने भावों की बहुत गहरी अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया है.बधाई आपको.सादर वन्दे...
बहुत बहुत शुभकामनाएं ।
http://madan-saxena.blogspot.in/
http://mmsaxena.blogspot.in/
http://madanmohansaxena.blogspot.in/

संजय भास्‍कर said...

सुन्दर अभिव्यक्ति .....यशवंत जी

prritiy----sneh said...

जिंदगी ये भी है कि ,महलों की बदज़ुबानी के साये तले
बगल की बस्ती में, बाअदब गुलाब महकते हैं।
sach hai, bahut khoob likha hai.

shubhkamnayen