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04 August 2012

भ्रम

एक सच है
एक झूठ है
एक मुखौटा है
एक असली चेहरा है
एक शतरंज है
एक मोहरा है
एक साँप है
एक सपेरा है
एक अंधेरा है
एक सवेरा है
एक प्रश्न बहुत टेढ़ा है
किसका साथ दूँ ?
जब सब कुछ साफ है
है पट्टी बंधी आँखों पे
पर क्या इंसाफ है ?
मति भ्रम कहो या
या पैदाइशी दृष्टि भ्रम
मैंने सोचा है
सच की आग में
झुलसुंगा।


©यशवन्त माथुर©

29 comments:

Rajesh Kumari said...

बहुत खूब मन में उपजने वाले भाव ...बहुत सुन्दर

Onkar said...

सुन्दर पंक्तियाँ

Unknown said...

एक प्रश्न बहुत टेढ़ा है
किसका साथ दूँ ?
जब कुछ साफ है
है पट्टी बंधी आँखों पे
पर क्या इंसाफ है ?

संशय किसी चीज को कह न कह पाने की

Unknown said...

अच्छी कविता के लिए बधाई

सदा said...

बहुत बढिया ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (05-08-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Anju (Anu) Chaudhary said...

बहुत खूब ...

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून said...

वाह जी बढ़ि‍या है

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

बहुत से लोग झुलस रहे हैं भीतर ही भीतर...इस सच्चाई की आग में! मगर इसे बुझाने वालों की चीख अनसुनी हुई जाती है..~बहुत सुंदर!

ANULATA RAJ NAIR said...

बहुत सुन्दर और सशक्त रचना...
जियो मेरे भाई.

सस्नेह

babanpandey said...

yaswant jee,
we always want to cooperate many thing at a time
but we should follow which is crystal clear.

sushma verma said...

behtreen....

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

एक प्रश्न बहुत टेढ़ा है
किसका साथ दूँ ?

निर्णय आपके हाथ में,,,,,,

RECENT POST ...: रक्षा का बंधन,,,,

***Punam*** said...

जब सब कुछ साफ है
है पट्टी बंधी आँखों पे
पर क्या इंसाफ है ?

अब जवाब कौन देगा.....??

मेरा मन पंछी सा said...

सच की आग में जलकर ही
एक आइडल(idol) बनता है..
बहुत बेहतरीन और सशक्त रचना..
:-)

संध्या शर्मा said...

बहुत सुन्दर रचना... शुभकामनायें

Asha Lata Saxena said...

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना |
आशा

डॉ. मोनिका शर्मा said...

एक बेहतरीन कविता

रविकर said...

झूठ-सांच की आग में, झुलसे अंतर रोज |
किन्तु हकीकत न सके, नादाँ अब तक खोज |
नादाँ अब तक खोज, बड़े वादे दावे थे |
राष्ट्र-भक्ति के गीत, सुरों में खुब गावे थे |
दृष्टि-दोष दम फूल, झूल रस्ते में जाते |
भूले सही उसूल, गलत अनुसरण कराते ||

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

बहुत सुन्दर....

विभा रानी श्रीवास्तव said...

मैंने सोचा है
सच की आग में
झुलसुंगा।
कलियुग है ,अकेले हो जाइएगा
झुलस कर कोयला हो जाइएगा
हीरा तो झूठ बोलनेवाले होते हैं .... !!

Dr Varsha Singh said...

NICE ONE....

HAPPY FRIENDSHIP DAY....!!!!!!!

Aditi Poonam said...

ati-sunder,bhav-purn rachnaa.hameshaa padhne milti rahe
pls vsitmy blg purvaai.blogspot.com

शिवनाथ कुमार said...

सच कहा आपने
सच का साथ हमेशा ही सही होता है भले ये दुखदायी लगे !
बेहतरीन प्रस्तुति !

दिगम्बर नासवा said...

सच की आग में ताप कर ही जीवन निखरता है ...
लाजवाब रचना है ...

अनुपमा पाठक said...

सच की आग के प्रति आस्था बनी रहे!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

ये बीएचआरएम भी कितना भ्रम पैदा करता है ...सुंदर प्रस्तुति

Naveen Mani Tripathi said...

rachana achhi lagi ....sadar badhai

prritiy----sneh said...

sach hai bhrm kaisa bhi ho, uska koi jawab nhi bas yahi ki bhrm ko chetna se dur karna hoga... sunder abhivyakti.

shubhkamnayen