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10 October 2012

न जाने क्यों ?

आते जाते
राहों पर
तिराहों-चौराहों पर
मंदिर -मजारों पर
गिरिजा-गुरुद्वारों पर
मैं देखता हूँ
हाथ फैलाए खड़े 
लठिया टेक लोगों की
अनोखी दुनिया को

आसमान की
खुली छत के नीचे
बसने वाला आदिम युग
खत्म होती सब्सिडी से
बेखबर हो कर भी
बा खबर रहता है
अगले फुटपाथ पर
गूँजती नयी किलकारी से
ईद और दीवाली से

अब एक कमरे मे सिमटी
लाखों किलोमीटर की
गोल दुनिया
छोटी लगती है
लठिया टेक लोगों की
दो गज़ चादर से

न जाने क्यों ?

©यशवन्त माथुर©

29 comments:

इस्मत ज़ैदी said...

अब एक कमरे मे सिमटी
लाखों किलोमीटर की
गोल दुनिया
छोटी लगती है
लठिया टेक लोगों की
दो गज़ चादर से

न जाने क्यों ?

बहुत सुन्दर यशवंत ,,ख़ुश रहिये और ऐसे ही अच्छा लिखते रहिये

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

Yashwant aapki kavita kee dhaar din wa din badhti ja rahi hai ... bahut acche !

Madan Mohan Saxena said...

जीवंत भावनाएं.सुन्दर चित्रांकन,बहुत खूब
बेह्तरीन अभिव्यक्ति

ANULATA RAJ NAIR said...

सोच में पड़ गयी हूँ....न जाने क्यूँ???

अच्छी अभिव्यक्ति यशवंत
सस्नेह
अनु

Maheshwari kaneri said...

जीवंत चित्रांकन..क्या क्या सोचता मन..बहुत सुन्दर .यशवंन..

Unknown said...

सुन्दर अभिव्यक्ति

kuldeep thakur said...

नमन करता हूं आप की लेखनी को... कविता पढ़ते हुए कविता और भी मनमोहक लग रही है... मेरी नयी रचना के लिये मेरे ब्लौग पर आना... http://www.kuldeepkikavita.blogspot.com

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

खूबसूरत भावभिव्यक्ति

Saras said...

आसमान की
खुली छत के नीचे
बसने वाला आदिम युग
खत्म होती सब्सिडी से
बेखबर हो कर भी
बा खबर रहता है
अगले फुटपाथ पर
गूँजती नयी किलकारी से
ईद और दीवाली से
सच है ..उसे तो अपने और अपने से जुड़े लोगों से ही लेना देना है ...वह क्या जाने सियासी दांव पेंच ..बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति यशवंत.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

shalini rastogi said...

महानगरों का विरोधाभास... एक ही शहर में जैसे दो अलग अलग दुनिया बसी हुई है...

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून said...

:)

संध्या शर्मा said...

सचमुच बहुत अनोखी और बड़ी है, लठिया टेक लोगों की दो गज़ चादर से बनी दुनिया... गहन भाव

कुमार राधारमण said...

वो जो लठिया टेक है
नहीं चाहिए सब्सिडी उसे
पास आते इस विश्व-ग्राम में
व्यापार का हिस्सा है वह!

आशा बिष्ट said...

yakinan... naa jaane kyun???..ye prashn tairata rahta hai..

विभा रानी श्रीवास्तव said...

अब एक कमरे मे सिमटी
लाखों किलोमीटर की
गोल दुनिया
छोटी लगती है
लठिया टेक लोगों की
दो गज़ चादर से
न जाने क्यों ?
मेरे जैसे
लोगो की वजह से .....
गुरुदेव,एक कमरे में सिमटी जिन्दगी !
अकेलापन बे-मौत मारता है !!
शुभकामनायें !

Kavita Rawat said...

अब एक कमरे मे सिमटी
लाखों किलोमीटर की
गोल दुनिया
छोटी लगती है
लठिया टेक लोगों की
दो गज़ चादर से
..बहुत बढ़िया आत्म चिंतन कराती संवेदनशील प्रस्तुति

Bhavana Lalwani said...

mere khyaal se isko thoda aur expand kar sakte the.. aisa lagta hai ki ekdum se pravaah ruk gaya vichaaron ka... main isse aur aage padhna chaahungi..

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

गोल दुनिया
छोटी लगती है
लठिया टेक लोगों की
दो गज़ चादर से
न जाने क्यों ?,,,,,जीवांत भावनाओं की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति,,,,

RECENT POST: तेरी फितरत के लोग,

मेरा मन पंछी सा said...

गहन भाव लिए संवेदनशील रचना..

डॉ. मोनिका शर्मा said...

बहुत बढ़िया.....

Anonymous said...

गहन,ह्रदय स्पर्शी रचना ....

नीरज गोस्वामी said...

वाह...लाजवाब रचना यशवंत जी...बधाई

नीरज

Unknown said...

अक्सर... ना जाने क्यूं ही होता है...
बहुत ही अच्छी...

Saras said...

उन्हें क्या लेना ...दुनिया के ग़मों से ...उन्हें क्या वास्ता कौमो की फितरत से ....अपनी ही दुनिया बस जीते हैं ....अपनों में हैं फ़रिश्ते से ...!

Bhawna Kukreti said...

hmm..soch me hoon.

Anonymous said...

gahre bhavon se yukt sundar kavita

Ways to find Happiness in Life

Bharat Bhushan said...

आपकी कविताओं में निखार आ रहा है. बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति.

Onkar said...

सुन्दर कविता

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