+Get Now!

प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

20 October 2012

आँखों देखी......

कभी कभी राह चलते स्मृति पटल पर हमेशा के लिये अंकित हो जाने वाले दृश्य दिख जाते है। प्रस्तुत पंक्तियाँ 4-5 दिन पूर्व देखे ऐसे ही एक दृश्य को शब्द देने का प्रयास मात्र हैं---

(हनुमान सेतु )
गहराती उस
आधी रात को
हनुमान सेतु* के
सन्नाटे में
ऊंची जलती स्ट्रीट लाइट्स
और नीचे गोमती के शीशे में
खुद को ताकता
काला आसमान
शायद देख रहा होगा
मेरी तरह मौन साधे
रेलिंग के सहारे
दो कपड़ों में सिमटा
गहरी नींद में खोया
एक मानव शरीर
जिसके सिर के बालों को
संवार रहा था एक श्वान
अपनी जीभ से।

दिन भर की थकान के बाद
इस सुखद एहसास को
महसूस न कर पाने का मलाल
टूट कर गिरते
उस तारे को भी हुआ होगा
जिसे देखा मैंने
बेपरवाह दौड़ते टेम्पो की
गद्देदार सीट पर बैठ कर
तेज़ आवाज़ में गूँजता 
"जीना यहाँ मरना यहाँ "
सुनते हुए।

©यशवन्त माथुर©

*हनुमान सेतु लखनऊ का एक प्रसिद्ध पुल है  जिसे कभी मंकी ब्रिज भी कहा जाता था ।

18 comments:

Kailash Sharma said...

बहुत प्रभावी भावपूर्ण रचना..

Dinesh Mishra said...

wah,bahut umda prastuti.........!!

Pratik Maheshwari said...

हनुमान सेतु को जीवंत कर दिया! खूब बहुत! :)

ANULATA RAJ NAIR said...

वाह...
बहुत अच्छी रचना....

सस्नेह
अनु

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून said...

सुंदर :)

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

उदास सी रचना..... शायद...ज़िंदगी का आईना...
~God Bless !!!

अनुभूति said...

ह्रदय स्पर्शी अभिव्यक्ति ....भाग दौड की इस जिंदगी में उतर कर देखने का वक्त ही कहाँ रहा....?? मन को झकझोरती रचना.....शुभ कामनाएं !!!

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

गोमती के शीशे में
खुद को ताकता
काला आसमान

वाह कितनी खूबसूरत उपमा ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

दृश्य को शब्द बहुत खूबी से दिये हैं .... संवेदनशील अभिव्यक्ति

डॉ. मोनिका शर्मा said...

सशक्त ...संवेदनशील रचना

babanpandey said...

हनुमान पुल .. भी दिलों को जोड़ता है ..ठीक आपकी कविता की तरह

Unknown said...

गोमती के शीशे में
खुद को ताकता
काला आसमान


नदी,पुल, आसमान, का बहुत ही प्रभावी और सटीक सहज,सरल मानवीकरण ने चित्र सहित आपके भावों को जीवंत कर जिवानौर मृत्यु को एक सूत्र में पिरो दिया है.क्या कहूँ लाजवाब.......

rahul ujjainkar (winlix infotech) said...

लाजवाब

सादर

Maheshwari kaneri said...

बहुत सुन्दर शब्द चित्रों के साथ सशक्त भावपूर्ण रचना,,शुभकामनाएं यशवंत.

संध्या शर्मा said...

प्रभावशाली रचना... शुभकामनायें

Unknown said...

बहुत सुन्दर . . . आपके इन ब्लॉग्स को पढ़ते-पढ़ते मेरे मन में कई प्रश्न उठते हैं। यह सब मेरे लिये अत्यन्त चिन्तनीय विषय है।

स्वामी विवेकानन्द के 150 वेँ जन्म वर्ष को सम्पूर्ण भारत में विवेकानन्द सार्ध शती समारोह वर्ष के रूप में मनाया जायेगा यह ब्लॉग इस भारत जागो! विश्व जगाओ!! विश्व-व्यापी महाभियान की विभिन्न गतिविधियों को जन-सामान्य तक पहुँचाने के उद्देश्य से बनाया गया है, कृपया अपना मार्गदर्शन अवश्य देवें।

मेरा मन पंछी सा said...

वास्तविक जीवन का यथार्थ चित्रण
होता है आपकी रचनाओ में...
प्रभावित करती रचना...
:-)

Saras said...

वाह वाह यशवंत ...सुन्दर !!!

Post a comment

कृपया किसी प्रकार का विज्ञापन कमेन्ट मे न दें।
कमेन्ट मोडरेशन सक्षम है। अतः आपकी टिप्पणी यहाँ दिखने मे थोड़ा समय लग सकता है।

Please do not advertise in comment box.
Comment Moderation is active.so it may take some time in appearing your comment here.