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18 December 2012

मर्दानगी की ख़ुदकुशी ......

पिशाचत्व का
रूप देख कर
उस रात से
शर्मसार
पौरुषत्व
नज़रें गड़ाए
ज़मीन पर
मना रहा है
शोक
मर्दानगी की
ख़ुदकुशी का

हाँ
ख़ुदकुशी
जो रोज़ करती है
मर्दानगी
कभी यहाँ
कभी वहाँ
छपती है
सुर्खियों में
तीर-तलवार या
तोप नहीं ...
दम तोड़ती
गूंगी खबर
बन कर

और बेचारा
पौरुष
अब तलाश में है
नयी उपमा की
ताकि भर सके दंभ
खुद के होने का
इसी दुनिया के
किसी पर्दानशीं
कोने में

©यशवन्त माथुर©

(दिल्ली की शर्मनाक घटना पर मेरी प्रतिक्रिया)
 

27 comments:

avanti singh said...

सही और सटीक शब्दों का इस्तेमाल किया आप ने

रमेश यादव said...

कानून से अधिक महत्वपूर्ण है,कानून का भय...
बेहतरीन !

संज्ञा अग्रवाल said...

Aapka Dhanyavaad Yashwantji .
Purushon ki or se aisi pratikriyaon ki apeksha thi. Main apke vicharon se sahmat hoon. Apne apni vyatha bahut achchhe satik shabdon me vyakt ki hai.

सु-मन (Suman Kapoor) said...

behtreen yashwant

विभा रानी श्रीवास्तव said...

अपनी लाचारगी-बेबसी पर दम घूंट रहा ....
हत्यारों की एक ही सजा , फांसी की सजा :(
:'(

Noopur said...

:'(
Kuch nahi hoga fir bhi....

Rewa Tibrewal said...

hum kitna hi likh le kitna hi sooch le....hota kuch nahi...fir dusra din fir dusri khabar...

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

बेहतरीन,सटीक प्रस्तुति,,

recent post: वजूद,

संध्या शर्मा said...

आपकी भावनाओं का सम्मान करते हैं हम... विभा जी से सहमत

Maheshwari kaneri said...

बहुत सुन्दर और,सटीक प्रस्तुति,, यशवंत

Unknown said...

नर रूप में घूम रहे, आज कई पिशाच |
मर रही है मानवता, व्याघ्र रहे हैं नाच ||

आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (19-12-12) के चर्चा मंच पर भी है | अवश्य पधारें |
सूचनार्थ |

ANULATA RAJ NAIR said...

ऐसी मानसिक अपंगता का कोई इलाज नहीं है क्या....
सशक्त प्रस्तुति यशवंत.
सस्नेह
अनु

shalini rastogi said...

पौरुष का झूठा दंभ भरने वाले विकृत मानसिकता के लोगों का सही चित्रण किया है यशवंत.

Rohitas ghorela said...

बहुत अच्छे काव्य की ठेरों शुभकामनायें .

मैं सौचता हूँ की ओरतों और पुरुषों दोनों को कुछ सावधानियां बरतने की जरूरत है ...पुरुष के मन में कानून का खोप इतना गहरा हो की वो ऐसा कुकर्म करने से पहले हजार बार सौचे और उसकी रूह तक कांप उठे और लड़कियों को चाहिए की वो पश्चातीय सभ्यता की तरफ ज्यादा अग्रसर न हों। उनको सर पर चुन्नी और सलवार कुर्ता पहनने में शर्म नहीं गर्व होना चाहिए। (कोई गलती हो तो माफ़ी चाहता हूँ)

yashoda Agrawal said...

आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 22/12/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

Bhavana Lalwani said...

well said .. par ab jab tak koi sufficient aur strong law nahin banega tab tak ham aise hi likhte rahenge aur aage hoga kuchh nahin

Anonymous said...

........... यथार्थ !!!

Poonam Matia said...

यशवंत जी ज्वलंत विषय पर आपकी बेहद खूबसूरत रचना ......बधाई

virendra sharma said...

आपने जो लिखा है वह गहरे सामाजिक सरूकारों से जुड़ा है वोट बैंक की राजनीति से जुड़ा कोई सीधा हल नहीं है इस सामाजिक विकृति की .दोषियों को तो सख्त सज़ा हो ही साथ ही सरकार को भी फांसी पे लटकाया जाए .भले प्रतीक स्वरूप .सामाजिक हस्तकक्षेप को पुनर जीवित किया जाए .

हमारे समय की एक विकृति की कराह अनुगूंज और ललकार आपकी रचना में है .

Arvind kumar said...

bilkul sach

Unknown said...

और बेचारा
पौरुष
अब तलाश में है
नयी उपमा की
ताकि भर सके दंभ
खुद के होने का
इसी दुनिया के
किसी पर्दानशीं
कोने में ।
PERFECT REACTION

Sadhana Vaid said...

बहुत ही संवेदनशील एवं सार्थक रचना यशवंत जी ! पुरुषों का पौरुष लज्जित ना हो इसके लिए उन्हें कुछ तो करना होगा ! बहुत बढ़िया रचना !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 20 -12 -2012 को यहाँ भी है

....
मेरे भीतर का मर्द मार दिया जाये ... पुरुष होने का दंभ ...आज की हलचल में .... संगीता स्वरूप
. .

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

बहुत खूब यशवन्त जी । पुरुष नारी को संरक्षक होना चाहिये और वह है भी । जो उसे अपमानित या आहत करते हैं उसकी मर्यादा भंग करते हैं वे सचमुच ही अपने पौरुष की हत्या करते हैं उसे कलंकित करते हैं ।

vandan gupta said...

काहे का पौरुष? धिक्कार है

अपने इस दर्द के साथ यहाँ आकर उसे न्याय दिलाने मे सहायता कीजिये या कहिये हम खुद की सहायता करेंगे यदि ऐसा करेंगे इस लिंक पर जाकर

इस अभियान मे शामिल होने के लिये सबको प्रेरित कीजिए
http://www.change.org/petitions/union-home-ministry-delhi-government-set-up-fast-track-courts-to-hear-rape-gangrape-cases#

कम से कम हम इतना तो कर ही सकते हैं

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

सही कहा........

Aparna Bose said...

यशवंत जी आपने बहुत सटीक लिखा है. इसका एक कड़वा पहलू यह भी है की कुछ मर्दों की इस जघन्यता के कारण समस्त पुरुषजाति को हम महिलाएँ संदिग्ध नज़रों से देखने लगती हैं .यह समाज के उन्नति के लिए अवांछनीय है.

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