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18 January 2013

'इनके' 'उनके' सपने.............

(चित्र आदरणीय अफलातून जी की फेसबुक वॉल से )
सपने 'ये' भी देखते हैं
सपने 'वो' भी देखते हैं 

'ये' इस उमर में कमाते हैं
दो जून की रोटी जुटाते हैं 
जुत जुत कर रोज़
कोल्हू के बैल की तरह 
'उनको' निहार कर 
'ये' बस मुस्कुराते हैं 

'इनको' पता है कि दुनिया 
असल में होती क्या है 
रंगीन तस्वीरें हैं 
मगर अक्स स्याह है 

'इनके' सपनों की दुनिया में 
'उनकी' बे परवाह मस्ती है 
'ये' दर्द को पीते हैं 
और 'उनकी' आह निकलती है 

सपने 'ये' भी देखते हैं 
सपने 'वो' भी देखते हैं 
बस 'ये' ज़मीं पे चलते हैं 
और 'वो' आसमां में उड़ते हैं।    

©यशवन्त माथुर©

11 comments:

डॉ. मोनिका शर्मा said...

सपने 'ये' भी देखते हैं
सपने 'वो' भी देखते हैं
बस 'ये' ज़मीं पे चलते हैं
और 'वो' आसमां में उड़ते हैं।


सटीक पंक्तियाँ

कालीपद "प्रसाद" said...

सपने 'ये' भी देखते हैं
सपने 'वो' भी देखते हैं
बस 'ये' ज़मीं पे चलते हैं
और 'वो' आसमां में उड़ते हैं।
hakikat bayan karti sundar rachna!
New post कुछ पता नहीं !!! (द्वितीय भाग )
New post: कुछ पता नहीं !!!

निहार रंजन said...

बहुत अच्छी लगी यह रचना यशवंत भाई.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सुंदर तुलनात्मक विश्लेषण सपनों का .... यथार्थ को कहती हुई रचना

ANULATA RAJ NAIR said...

इनमें और उनमें ये फर्क सदियों से चला आ रहा है...जाने कभी मिटेगा या नहीं..
गहन भाव ..
सस्नेह
अनु

विभा रानी श्रीवास्तव said...

'इनके' सपनों की दुनिया में
'उनकी' बे परवाह मस्ती है
'ये' दर्द को पीते हैं
और 'उनकी' आह निकलती है
वाह ! क्या बात है !!

Anita said...

काश ! किसी बच्चे का बचपन मजूरी करते न बीते..

vandan gupta said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (19-1-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!

Saras said...

और कहने को सब बच्चे हैं......जिनके हिस्से में भी एक बचपन है ....

mridula pradhan said...

सपने 'ये' भी देखते हैं
सपने 'वो' भी देखते हैं
बस 'ये' ज़मीं पे चलते हैं
और 'वो' आसमां में उड़ते हैं। badi achchi tulna ki hai......

अनुभूति said...

सपने ये भी देखते हैं सपने वो भी देखते हैं पर फर्क इतना है की वहाँ समृद्धि का सुनहरा संसार लहलहाता है और यहाँ अभावों और विवशता हर दम मुह बाये खड़ी रहती है...........बेहद भाव पूर्णभिव्यक्ति शुभ कामनाएं यशवंत जी !!!