प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

वेब सर्च (Enter your keywords to search on web)

28 June 2013

देख नहीं सकता

ऊपर वाले की नेमत से मिली हैं दो आँखें
चार दीवारी की बंधी पट्टी के उस पार
देख नहीं सकता।

मैं महफूज हूँ अपनी ही चादर में सिमट कर
बाहर निकल कर खुले जिस्मों को
देख नहीं सकता।

नीरो की तरह बांसुरी बजा कर अपनी मस्ती में
मुर्दानि में झूमता हूँ किसी को रोता
देख नहीं सकता।

ऊपर वाले की नेमत से मिली हैं दो आँखें
इंसान के लबादे में इंसा को
देख नहीं सकता।  

~यशवन्त माथुर©

19 comments:

Dr.NISHA MAHARANA said...

WAAH BAHUT HI GAHAN BAT KAH DI KAVITA KE MADHAM SE .......

Ranjana verma said...

आज के इंसान की इंसानियत ऐसी ही हो गयी है... अच्छी प्रस्तुति !!

विभा रानी श्रीवास्तव said...

आपके जज़बात को नमन
हार्दिक शुभकामनायें

Unknown said...

बढिया कटाक्ष .......

Rewa Tibrewal said...

shandar rachna....

रेखा श्रीवास्तव said...

bahut sundar bat kahi hai . insaan to ab labadon men hi milane lage hain kitne hain jinka charitra aur man paardashi kaha jaay .

prritiy----sneh said...

sunder abhivyakti.

shubhkamnayen

prritiy----sneh said...

sunder abhivyakti.

shubhkamnayen

आनन्द विक्रम त्रिपाठी said...

बहुत बढियां

Kailash Sharma said...

बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति...

Bhavana Lalwani said...

theme toh badiya hai par thodi adhoori si lagi .. ise kuchh aur badhaa sakte the aap abhi lagta hai ki abhi bhi kuchh ankaha rah gaya hai

sushma verma said...

sarthak abhivaykti,,,

vandan gupta said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(29-6-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!

डॉ. मोनिका शर्मा said...

मर्मस्पर्शी बात

Unknown said...

सुन्दर अभिव्यक्ति आज अंतर्दृष्टि भी बाधित लगती है

Onkar said...

बहुत खूब

दिगम्बर नासवा said...

बहुत खूब ...वैसे इन्सान समझ भी कहां आता है ..

मेरा मन पंछी सा said...

मार्मिक प्रस्तुति..
आज की इंसानियत कहे या इन्सान का स्वार्थ और उसकी व्यस्तता

Madhuresh said...

वाह, बहुत खूब कही!