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11 November 2013

जिंदगी एक मज़ाक है

जिंदगी एक मज़ाक है
इसे यूं भी जीना पड़ता है 
खुशी को निगलना
गम को पीना पड़ता है

कुछ पाने के लिये
कुछ खोना पड़ता है
जो खो न सके कुछ तो
दर्द को ढोना पड़ता है

यहाँ निशाना भी है
तीर कमान भी है
यहाँ ज़मीन भी है
और आसमान भी है 

उड़ते ख्वाब
भटकते अरमान भी हैं
पूरे होने को तरसते
कुछ फरमान भी हैं

ईमान के उर्वर खेतों में
बेईमान को उगना पड़ता है
भरे पेट हो कर भी
हर दाना चुगना पड़ता है

जिंदगी एक मज़ाक है
इसे यूं भी जीना पड़ता है
कड़वी गोली जीभ में धर के 
बोलना मीठा पड़ता है।

~यशवन्त यश ©

12 comments:

parul said...

ज़िन्दगी को यूं ही जीना पड़ता है... क्या करें। बहुत अच्छा लिखा है।

Deepak Saini said...

very good

मेरा मन पंछी सा said...

जिंदगी का अलग ही तरीका....
बेहतरीन रचना......

विभा रानी श्रीवास्तव said...

मज़ा हो न हो जिंदगी ऐसे ही जीना पड़ता है ...
हार्दिक शुभकामनायें ....

दिगम्बर नासवा said...

जिंदगी जैसे भी है इसे जीना पड़ता है ... जहर हो तोभी पीना पड़ता है ... सच लिखा है गहरा सच ...

Manjusha negi said...

वाह...बेहद सुन्दर प्रस्तुति...बधाई..

Ranjana verma said...

जिंदगी जैसे भी जीना पड़ता है... बहुत खूबसूरत रचना ...

Rajeev Kumar Jha said...

बहुत सुंदर.

Rajeev Kumar Jha said...

इस पोस्ट की चर्चा, बृहस्पतिवार, दिनांक :- 14/11/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" चर्चा अंक - 43 पर.
आप भी पधारें, सादर ....

सुशील कुमार जोशी said...

सुंदर अभिव्यक्ति !

कालीपद "प्रसाद" said...

जिंदगी पानी का बूंद है ,धरा में बहती है -सुन्दर रचना
नई पोस्ट लोकतंत्र -स्तम्भ

Saras said...


ज़िन्दगी इतनी भी बुरी नहीं यशवंत....:)....अलबत्ता रचना खूब है .....!!!!!