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27 May 2014

कुछ लोग -4

कुछ लोग
चलते रहते हैं
जीवन के हर सफर में
कभी अकेले
कभी किसी के साथ ....
पीते हुए
कभी कड़वे -मीठे घूंट
और कभी
सुनते हुए
दहशत की चिल्लाहटें ....
उनकी राह में
फूलों के गद्दे पर
बिछी होती है
काँटों की चादर
जिस पर चल चल कर
अभ्यस्त हो जाते हैं
उनके कदम
सहने को
वक़्त की हर ठोकर
और साथ ही
महसूस करने को
हर मुरझाते
फूल की तड़प ....
कुछ लोग
बस चलते रहते हैं
बिना रुके
बिना थके
क्योंकि वो जानते हैं
इंसान के रुकने का वक़्त
उस पल आता है
जब सांसें
थमने को  होती हैं
हमेशा के लिए।

~यशवन्त यश©

10 comments:

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

Digvijay Agrawal said...

आपकी लिखी रचना बुधवार 28 मई 2014 को लिंक की जाएगी...............
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत सुंदर ।

prritiy----sneh said...

bahut achha likha hai

shubhkamnayen

sushma verma said...

shaskat abhivaykti....

Anita said...

लेकिन यह जीवन क्या वास्तव में जीवन है..कभी जीवन में थम कर देखें वे लोग तो जानेंगे रुकने का वक्त तो तब भी नहीं आता जब सांसे थमने को होती हैं..

dr.mahendrag said...

सुन्दर रचना यशजी

Maheshwari kaneri said...

बहुत बढिया यशवंत ...शुभकामनाएं

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

बहुत सुन्दर ......सुन्दर भाव ..बधाई

भ्रमर५

Onkar said...

वाह, बहुत खूब