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28 July 2014

शून्य को समझना आसान नहीं

जितना आसान है
कागज़ पर उकेर देना
शून्य का चित्र
उतना ही कठिन है
ढालना
और समझना
शून्य का चरित्र .....
जो आदि से अंत तक
गुज़रता है
अनगिनत
घुमावदार मोड़ों से
जिसके रास्ते में
कभी मिलती है
समुद्र की गहराई
अंतहीन गहरी खाई
कभी मिलते हैं
मौसम के अनेकों रूप
कहीं छांव कहीं धूप
कहीं कांटे-फूल
गड्ढे
और न जाने क्या क्या
फिर भी
वह वृत्त
वह शून्य
वहीं आ मिलता है
जहां से
चला था
अपने सफर में .....
हज़ार यादों की
एक पन्ने मे रची
बेहद जटिल किताब
जिसके भीतर
कहीं छुपी सी हो
उस शून्य को
उकेरना
बहुत आसान है
पर उसे समझना
बिलकुल भी
संभव नहीं।

~यशवन्त यश©

5 comments:

Anita said...

बहुत सही कहा है..शून्य दीखता है पर उसी में सब समाया है

डॉ. मोनिका शर्मा said...

कई बार सरलता ही सबसे बड़ी कठिनाई होती है।

Pratibha Verma said...

बेहतरीन ...

Asha Joglekar said...

शून्य को पूर्ण भी कह सकते हैं। जिसमें सब कुछ समाया है।

Misra Raahul said...

शून्य का चरित्र बड़ा अजीब सा है।
बहुत उम्दा अभिव्यक्ति।
नई रचना : सूनी वादियाँ