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04 July 2014

मैं मजदूर हूँ

आज की नींव पर
गाता हूँ
मैं
कल की
सँवरी इमारत का राग
छैनी हथोड़ी की सरगम
और ईंटों का साज़
सुना देता है
मेरे मन के
भीतर की आवाज़ ....
मैं
रूप धरता हूँ
कभी बढ़ई का
कभी राजमिस्त्री का
और कभी
नज़र आता हूँ
सिर और पीठ पर
किस्मत का
बोझा उठाए
साधारण
बेलदार के रूप में ....
मेरी झोपड़ी में
चहल पहल नहीं
हलचल नहीं
मेरे ही बनाए
आपके महलों की तरह
रेशमी पर्दे नहीं ...
मैं
बे पर्दा हूँ
क्योंकि
खुशी
और गम छुपाने को
न कल था
न आज मजबूर हूँ
मैं
मजदूर हूँ। 

~यशवन्त यश©

12 comments:

Unknown said...

बहुत ही भावपूर्ण रचना। यश जी सचमुच मजदुर की भावानुभूति बहुत ही गहरी की है आपने

सु-मन (Suman Kapoor) said...

वाह यशवंत ..बहुत अच्छा लिखा है

Anita said...

वाह ! बहुत प्रभावशाली पंक्तियाँ

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (05-07-2014) को "बरसो रे मेघा बरसो" {चर्चामंच - 1665} पर भी होगी।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत बढ़िया :)

Madhuresh said...

आह! एक मजदूर मजबूरियों को सही दिए हैं आपने यशवंत भाई! सुन्दर अभिव्यक्ति!
सादर
मधुरेश

डॉ. मोनिका शर्मा said...

भावपूर्ण .... ये तो जीवन गढ़ते है ...

Onkar said...

वाह

kuldeep thakur said...

आप की ये खूबसूरत रचना...
दिनांक 07/07/2014 की नयी पुरानी हलचल पर लिंक की गयी है...
आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित हैं...आप के आगमन से हलचल की शोभा बढ़ेगी...
सादर...
कुलदीप ठाकुर...

kuldeep thakur said...

आप की ये खूबसूरत रचना...
दिनांक 07/07/2014 की नयी पुरानी हलचल पर लिंक की गयी है...
आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित हैं...आप के आगमन से हलचल की शोभा बढ़ेगी...
सादर...
कुलदीप ठाकुर...

Bhavana Lalwani said...

badhiya likha hai yashwant ji ..bahut samay baad labour class ke baare mein aisi koi rachna padhi .. kuchh waqt pahle kaifi aazmi ki nazm "makan" padhi thi wahi yaad aa gai.

Unknown said...

bahut khoob likha hai aapne... sunder rachna