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19 July 2014

सशक्तिकरण बनाम निर्भया

जिसे लोग समझते हैं
सशक्तिकरण
क्या वही सही है ?
घर की चौखट के बाहर
दिन के उजालों मे
रातों की चकाचौंध में
अंधेरे रास्तों से
गुज़रती
कभी पैदल चलती
कभी मोटर मे दौड़ती
हर वामा
भीतर ही भीतर
समाए रहती है
एक डर
एक दर्द
क्या पहुँच भी पाएगी
अपनी मंज़िल पर ?
किताबों में
यूं तो उसे कहा गया है
देवी और पूजनीय
उसके कदमों को
माना गया है
शुभ -लाभ
फिर भी
सिहरता रहता है
उसका मन
डोलता रहता है
उसका विश्वास ....
यहाँ कदम दर कदम
उसके 'अपनों' की नज़रें
'गैर' नजरों जैसी लगती हैं
'दृष्टि दोष' पीड़ित दुर्योधन
अपनी आँखों मे
तैरते लाल डोरों को
छुपाने के लिए
'सम्मान' का
चश्मा लगा कर
हर दिन
करते रहते हैं
उसका चीरहरण
और वह बचते बचाते
जब सोती है
गहरी नींद मे
तब बीते दिन के सपने
उसे कर देते हैं
बेचैन ....
वह
नहीं चाहती
'निर्भया'
या 'दामिनी' कहलाना
वह जीना चाहती है
अपने इसी अस्तित्व के साथ
अपनी इसी काया के साथ
जिसकी हर छाया में
उसका वामा रूप
कराता रहे एहसास
दिलाता रहे विश्वास
कि
'सशक्तिकरण'
होता है
सिर्फ
समाज की सोच
बदलने से .....
पर
क्या
यह सोच
बदली है ???
या बदलेगी ????
आखिर कब ?
आखिर कब तक ????

~यशवन्त यश©

15 comments:

Kailash Sharma said...

बहुत उत्कृष्ट और सटीक अभिव्यक्ति..

निवेदिता श्रीवास्तव said...

speechless .....

Onkar said...

बहुत सक्षम कविता

Anita said...

समाज की सोच बदल रही है..आवाज उठाते रहिये

Sadhana Vaid said...

गहन चिंतन के लिये मन को उद्वेलित करती सशक्त रचना ! बहुत खूब !

Sadhana Vaid said...

गहन चिंतन के लिये मन को उद्वेलित करती सशक्त रचना ! बहुत खूब !

vandan gupta said...

सटीक अभिव्यक्ति

Unknown said...

सत्य कहा आपने। शुभता जो जड़ कट दिया गया है। समाज पतन की तरफ जा रहा है

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी रचना।

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून said...

न जाने कब तक

Unknown said...

Bilkul sahi kah rahe hain aap....behtareen lekh...

Unknown said...

शायद राक्षशी सोच कभी नहीं बदलेगी , जब तक प्रत्येक व्यक्ति घर से बाहर नहीं आयेगा इस सब के खिलाफ . सामयिक कविता

सुशील कुमार जोशी said...

वाकई कब तक ?

Unknown said...

सार्थक विचारो को आगे बढाती अभिव्यक्ति. बहुत बढ़िया

Manav Mehta 'मन' said...

बहुत बढ़िया