प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

वेब सर्च (Enter your keywords to search on web)

06 November 2014

बीते दौर की बातें

कभी कभी
बीते दौर की कुछ बातें
यादों के बादल बन कर
छा जाती हैं
मन के ऊपर
बना लेती हैं
एक कवच
रच देती हैं
एक चक्रव्यूह
जिसे भेदना
नहीं होता आसान
नये दौर की
नयी बातों के लिये ।
मन !
उलझा रहता है
सिमटा और
बेचैन रहता है
भीगने को
अनंत शब्दों की
तीखी बारिश में
जो अवशेष होते हैं
उड़ते जाते
उन बादलों के
जिनके भीतर
छुपा होता है
इतिहास 
उस आदिम
दौर का
जब चलना सीखा था
कल्पना की
दलदली धरती पर
कलम की
बैसाखी लेकर ।
मैं !
आज भी चल रहा हूँ
कल भी चलूँगा
चलता रहूँगा
पार करता रहूँगा 
उस दौर से
इस दौर के
नये चौराहे
मगर
इस थकान भरे सफर में
थोड़ा रुक कर
थोड़ा थम कर
आत्म मंथन के
अल्प अवकाश को
साथ ले कर
कभी कभी
बीते दौर की कुछ बातें
छा जाती हैं 
यादों के
बादल बन कर।
  
~यशवन्त यश©
owo04112014 

10 comments:

कुमकुम त्रिपाठी said...

कभी खुशी तो कभी गम दे जातीं हैं ....ये बीते दौर की बातें !

सुशील कुमार जोशी said...

बढ़िया ।

Rajendra kumar said...

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (07.11.2014) को "पैगाम सद्भाव का" (चर्चा अंक-1790)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

Anita said...

यादों के ये बादल जब बरस जायेंगे तब मन की धरती पर खिलेंगी नये उत्साह से नये दौर की बातें भी...सुंदर रचना !

Rohitas ghorela said...

अद्भुत लेखनी :)

प्रभात said...

बेहद उम्दा!

डॉ. मोनिका शर्मा said...

विचारणीय , बीता हुआ भी साथ ही चलता है

रश्मि शर्मा said...

Bilkul sahi...bahut sundar

mohan intzaar said...

सुन्दर मंथन भावनाओं का

Pratibha Verma said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।