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01 November 2014

वो निकलती है रोज़ मेरे घर के सामने से

पीठ पर लादे भारी भरकम सा बस्ता
जिसके भीतर उसका हर ज्ञान सिमटता 
कभी करती हुई बातें संगी साथियों से
वो निकलती है रोज़ मेरे घर के सामने से 

कभी हाथ थामे अपने किसी बड़े का 
गुनगुनाती हुई कोई प्यारी सी कविता 
खुश होता है मन उसकी शरारतों से 
वो निकलती है रोज़ मेरे घर के सामने से

उसे नहीं पता क्या दुनिया के तमाशे हैं 
उसे तो चंद खुशियों के पल ही भाते हैं  
बेखबर गुज़रती है  बचपन की राहों से 
वो निकलती है रोज़ मेरे घर के सामने से। 

~यशवन्त यश©

6 comments:

Sadhana Vaid said...

बहुत सुन्दर एवं ताज़गी भरी रचना !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (02-11-2014) को "प्रेम और समर्पण - मोदी के बदले नवाज" (चर्चा मंच-1785) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kailash Sharma said...

बहुत प्यारी भावपूर्ण रचना...

Unknown said...

bahut hi badhiya

Himkar Shyam said...

ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति…

दिगम्बर नासवा said...

वो दिन ही तो जावन के सबसे अच्छे दिन होते हैं ...
लाजवाब रचना ...