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16 December 2014

देखना नहीं चाहता कालिख को

बीते पलों की
कुछ बातें
कुछ यादें
बन कर
दबी रह जाती हैं
कहीं
किसी कोने में
वक़्त-बेवक्त 
आ जातीं हैं
अपनी कब्र से बाहर
देने लगती हैं
सबूत
खुद की
चलती साँसों का.....
उधेड़ देती हैं
परत दर परत
अनचाहे ही
सामने ला देती हैं
आदिम रूप
जिसे
खुद से ही
छिपाने से
न नफ़ा
न नुक्सान ही होता है .....
लेकिन
खुद के अक्स को
शीशे में 
इस तरह
नुमाया देख कर
शर्मिंदगी से
कुलबुलाता मन
दोबारा
जानना 
नहीं चाहता
देखना नहीं चाहता
सफेदी के
निचले तल पर
जमी और चिपकी हुई
कालिख को। 
 
~यशवन्त यश©

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