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10 March 2015

संघर्ष के साथ सफलता के शिखर पर .........

नाकामियां किसके जीवन में नहीं आतीं। उनके जीवन में भी विफलताओं का दौर आया। ऐसा दौर, जब मन में आया कि वह क्रिकेट ही छोड़ दें। पर क्रिकेट में तो उनकी जान बसी है। क्रिकेट छोड़ने का मतलब था जीवन से मुंह मोड़ना। तो क्या मुश्किलों से हारकर वह जीना छोड़ देंगे? उन्होंने तय किया कि वह ऐसा हरगिज नहीं करेंगे। निराशा से उबरकर उन्होंने मैदान में शानदार वापसी की और बन गए देश के सबसे तेज शतक बनाने वाले खिलाड़ी। नाम है शिखर धवन।

दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके में रहने वाले शिखर शुरू से पढ़ाई में कमजोर थे। इस बात को लेकर उनके नाना बहुत नाराज रहते थे। उन्हें अक्सर डांट पड़ती थी। पर मनमौजी मिजाज के शिखर पर इस डांट का खास असर नहीं होता। बगावती तेवर वाले इस बच्चे को घरवाले गब्बर कहकर पुकारने लगे। मां सुनैना की बड़ी ख्वाहिश थी कि बेटा पढ़-लिखकर सेना में जाए, पर शिखर का मन तो हर समय बैट-बॉल में लगा रहता था। मौका मिलते ही वह गेंद लेकर घर से भाग पड़ते। पिता महेंद्र पाल भी बेटे के रवैये को लेकर चिंतित रहते थे। क्रिकेट से क्या हासिल होगा, यह सवाल उन्हें बहुत परेशान करता। खैर, जल्द ही वह समझ गए कि बेटे को पढ़ाई के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। 12 साल की उम्र में शिखर को क्रिकेट ट्रेनिंग के लिए दिल्ली के सोनेट क्लब भेजा गया। शिखर के पहले कोच तारक सिन्हा कहते हैं, ‘जब शिखर मेरे पास आया, उस समय वह स्कूल टूर्नामेंट की अंडर-15 टीम का खिलाड़ी था। पहली मुलाकात में ही मुझे लगा कि बच्चे में कुछ खास है। उसके अंदर संघर्ष करने की अद्भुत क्षमता है, जो उसे दूसरों से अलग करती है।’


क्रिकेट मैच के साथ शिखर को एक और शौक लग गया। शिखर कहते हैं कि ‘तब मैं 15 साल का था। मन में ख्वाहिश जगी कि शरीर पर टैटू गुदवाया जाए। पहली बार बांह पर टैटू बनवाया, तो बड़ा रोमांचकारी लगा, पर मन में डर था। जानता था कि अगर पापा को पता चला, तो खैर नहीं। एक महीने तो मैंने किसी को पता ही नहीं लगने दिया, पर एक दिन पापा ने टैटू देख लिया। उनका गुस्सा सातवें आसमान पर था। पापा ने खूब डांटा और पिटाई भी की।’ वर्ष 1999 में शिखर अंडर-16 टीम में शामिल हो गए। शुरुआत शानदार रही। पहले अंडर-17 और फिर अंडर-19 टीम में उन्होंने बेहतरीन प्रदर्शन किया। वर्ष 2004 के अंडर-19 क्रिकेट वर्ल्ड कप सीरीज में शिखर को ‘प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट’ खिताब से नवाजा गया। वर्ष 2004-05 के रणजी मैच के दौरान वह पहली बार दिल्ली की तरफ से खेले।

घरेलू क्रिकेट में उनका प्रदर्शन बढ़िया रहा। पर घरेलू क्रिकेट का दौर लंबा चला। इस दौरान उनके कई साथी राष्ट्रीय टीम में जगह पा चुके थे, उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ा। वर्ष 2010 में पहली बार उन्हें वनडे इंटरनेशनल टीम में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेलने का मौका मिला। वैसे, पहले पांच वनडे इंटरनेशनल मैच में उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। लिहाजा वह टीम से बाहर कर दिए गए। शिखर बहुत निराश हुए। यह वह दौर था, जब उनके कई साथी बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे थे। यहां तक कि उनके जूनियर भी इंडियन टीम में जगह पा चुके थे। कोच तारक सिन्हा कहते हैं, ‘शिखर बहुत दुखी था। वह इतना निराश था कि क्रिकेट छोड़ने तक के बारे में सोच रहा था। पर क्रिकेटर होने के साथ वह फाइटर भी है। तमाम आशंकाओं को पीछे छोड़ते हुए उसने शानदार वापसी की।’

क्रिकेट की तरह ही शिखर की निजी जिंदगी भी दिलचस्प रही। साल 2012 उनके जीवन में रोचक मोड़ लेकर आया। दरअसल, उस वर्ष फेसबुक पर उनकी मुलाकात भारतीय मूल की ऑस्ट्रेलियाई नागरिक आयशा मुखर्जी से हुई। पहले दोस्ती, फिर दोनों में प्यार हो गया। आयशा उनसे दस साल बड़ी हैं। पहली शादी से उनकी दो बेटियां हैं। शिखर ने आयशा से शादी करने का फैसला किया,  घर वालों को यह नागवार गुजरा। हमेशा की तरह शिखर फैसले पर डटे रहे। उन्होंने परिवार और दुनिया की परवाह किए बगैर 12 अक्तूबर, 2012 को आयशा से शादी कर ली। पिछले साल उनका एक बेटा हुआ, जिसका नाम उन्होंने जोरावर धवन रखा है। शिखर कहते हैं, ‘मैंने परिवार से बगावत करके आयशा से शादी की। पर आज आयशा मेरी मां और पिताजी के काफी करीब हैं। मैं आयशा की खूबियों को जानता था। मुझे यकीन था कि एक दिन वह मेरे परिवार का दिल जीत लेंगी, और ऐसा ही हुआ।’

शादी के बाद शिखर के करियर में बड़ा बदलाव आया। मार्च, 2013 में उन्हें वीरेंदर सहवाग की जगह नेशनल टीम में लिया गया। वापसी शानदार रही। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेलते हुए वह टेस्ट क्रिकेट में सबसे तेज शतक बनाने वाले खिलाड़ी बन गए। वह पहले ऐसे भारतीय खिलाड़ी हैं, जिन्होंने अपने पहले टेस्ट मैच में 150 से ज्यादा रन बनाए। इन दिनों वर्ल्ड कप में बल्ले से जलवा बिखेर रहे शिखर कहते हैं, ‘आयशा मेरे लिए बहुत लकी रहीं। शादी के बाद मेरे प्रदर्शन में निखार आया। आयशा के साथ अब मेरे ऊपर दो बेटियों और एक बेटे की जिम्मेदारी है। यह एक सुखद एहसास है।’

प्रस्तुति:  मीना त्रिवेदी

साभार-http://www.livehindustan.com

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