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08 August 2015

बेवकूफ़ हम ही थे.......

वह एक ही हैं
वह एक ही थे,
सबसे बड़े बेवकूफ़
हम ही थे।
शक तो पहले भी था
अब तो सबूत भी है
बात पहले से
और मजबूत भी है ।
यह भी अच्छा हुआ
कि राहें अलग हो चलीं
फिर भी हलचलों का
अब तक वजूद भी है ।
हमें हारा समझना
उनकी ना समझ है
भीतर के कालों की
थोड़ी ऊपरी चमक है ।
वह अब भी वही हैं
वह तब भी वही थे
सफ़ेद पर्दों के भीतर
स्याह चेहरे वही थे ।
थी गलती हमारी 
उन्हें अपना समझने की 
मतलब के 'रिश्तों' से 
अनजान हम ही थे।
 
~यशवन्त यश©

2 comments:

Onkar said...

बहुत सुंदर

Rajesh Kumar Rai said...

अति सुन्दर रचना यश जी।कविता एक तरफ आत्मविश्वास दर्शाती है तो दूसरी तरफ रिश्तो की सच्चाई बयाँ करती है।बहुत खूब।