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28 October 2018

दुविधा

इस दुनिया की सरहद से
मीलों दूर
निर्वात के
एकांत और सूनेपन में
शरीर से निकल कर
अनंत यात्रा पर
बढ़  चली
मेरी आत्मा
इस इंतज़ार में है
कि
शायद कोई मिले
जो दिखा दे
मंज़िल और
मिलवा दे
मिट्टी से बने
या आकार लेने जा रहे
किसी पुतले से ,
क्योंकि
यह अब तक अतृप्त
यह आत्मा
हमेशा की तरह
नहीं चाहती
यूं ही
भटकते रहना
न ही चाहती है
आदी होना
किसी शरीर की
फिर भी
यूं भटकते हुए
या कहीं रहते हुए
उबर नहीं पाती
खुद की
स्वाभाविक दुविधा से।

-यश©
28/10/2018



25 October 2018

शमा के बुझने तक........

ढलती जाती
गहराई हुई रात के 
सन्नाटे में 
मद्धम संगीत के 
लहराते सुर 
एकांत सफर के
साक्षी बन कर 
जैसे भर देते हैं प्राण 
साथ छोड़ चुके 
किसी साए में। 

पौ के फटने तक 
अनगिनत 
ख्वाबों के दरिया में 
डूब कर-उतर कर 
पलकें खुलते ही 
मिल जाती है 
मुक्ति 
हो जाती है 
विरक्ति 
नयी निशा के मिलने तक 
और 
शमा के बुझने तक। 

-यश ©
25/10/2018

23 October 2018

वक़्त के कत्लखाने में -14

समय की देहरी पर 
लिखते हुए 
कुछ अल्फ़ाज़ 
गुनगुनाते हुए 
जिंदगी की सरगम 
बजाते हुए 
बेसुरे साज 
कभी-कभी सोचता हूँ 
कि 
आते-जाते ये पल 
ऐसे क्यों हैं ?
कभी 
मेरे मन की करते हैं 
और कभी 
अपने हर वादे से 
मुकरते हैं 
लेकिन यह 
फितरत है हर पल की 
हम इन्सानों की तरह। 
ये पल 
ये समय 
ये लोग 
एक ही जैसे नहीं होते 
वक़्त के 
कत्लखाने में 
आदि से अंत तक 
इनको 
जूझना पड़ता है 
अपने ही 
जुड़वा मुखौटों से। 

-यश ©
23/10/2018

22 October 2018

मुरझाए हुए फूल .....

दिन भर 
खिले-खिले 
मुस्कुराने वाले फूल 
शाम को जब मुरझाते हैं 
जीवन का सत्य कह जाते हैं। 

सत्य जिसका 
अस्तित्व कायम है 
चौरासी करोड़ योनियों में 
भूत,वर्तमान और भविष्य की 
निरन्तर गतिशील समय यात्रा में।  

दिन भर 
इंसानी हाथों में 
दबे- छुपे तड़पते फूल 
शाम को जब मुक्ति पाते हैं 
सिर्फ अपने अवशेष छोड़ जाते हैं। 

-यश ©
22/10/2018

20 October 2018

बस चलना ही है .....

वक़्त के साथ एक दिन
गुमनाम तो होना ही है
दर्ज़ हो कर कुछ पन्नों में
कभी तो खोना ही है।

सुर बन कर  कभी तो
साज़ों में ढलना ही है
किसी की कल्पना को
कोई शब्द तो देना ही है।

ये और बात है कि रंग
हर पल तो बदलना ही है
सारे मुखौटों को चेहरे से
कभी तो उतरना ही है।

बहती हुई धारा के साथ
कदमताल तो करना ही है
घड़ी की हर सुई को
रुके बिना बस चलना ही है।

-यश ©
20/10/2018

16 October 2018

बहकते अल्फ़ाज़

अल्फ़ाज़ जब बहकते हैं
बेहया से बहते हैं
मौन धारा के साथ
राहें तय करते हैं।

मन के कहीं
किसी कोने में
बादलों की तरह
उमड़-घुमड़ कर
अनगिनत बातें
अपने भीतर लेकर
अल्फ़ाज़  जब बरसते हैं
बेहया से हँसते हैं
या आँखों की कोरों से
आँसू बन कर रिसते हैं।

अल्फ़ाज़ जब बहकते हैं
बेसुध से बिखरते हैं
कई शब्द रूपों के साथ
नए आकार लेते हैं।

-यश ©
16/10/2018





15 October 2018

कुछ लोग -42

अनेकों
औपचारिकताओं के
लबादे में
ढँके-छुपे कुछ लोग
सिर्फ चाह में रहते हैं कि
बने रहें अच्छे
और सच्चे
औरों की निगाहों में ;
लेकिन;
भूल जाते हैं
कि उनके चेहरे पर लगा
आदर्शवादी मुखौटा
देर से ही सही
पर
जब हटता है
तब साफ दिखने लगते हैं
वो तमाम कील और मुँहासे
जिनसे रिसता है
उनके वास्तविक सच
और चरित्र का मवाद।

अपने 'अभिनय' से
सबको कायल करने वाले
ऐसे लोग
समय रहते ही
पहचान में आ तो जाते हैं
मगर
पहचानने वाले भी
छू लेने देते हैं
उन्हें उनका  फ़लक
क्योंकि
ऊंचाई से गिरने पर
शर्मिंदा अर्श भी
कर लेता है
खुद को और भी कठोर
ताकि
वो कर सकें
एहसास
खुद के दिल
और दिमाग पर पुती
कालिख के
गहरेपन का।

~यश©
15/10/2018
  

14 October 2018

चौराहे

जीवन की
इस अविरल समय यात्रा में
अपने अनेकों रूप लिए
अनगिनत चौराहे
निभाते हैं
हमारा साथ
उस हमसफर की तरह
जो
कभी-कभी
साथ न हो कर भी
साथ रहता है
मन का
हर भेद जान लेता है।

ये चौराहे
अपनी चारों दिशाओं में
कहीं फूल
कहीं काँटे
और कहीं
दिखाते हैं
पथरीले -रपटीले रास्ते
जिनसे गुज़र कर
तय होता है
मंज़िल का मिलना
या उससे दूर रहना ।

हर
आने -जाने वाले के साथ
ये चौराहे
बिना हीनता का एहसास कराए
अपने सार्वभौमिक
अस्तित्व के साथ
बस इस बाट में रहते हैं
कि इन हो कर
जो जा रहा है
कल
फिर लौट कर आएगा
अपनी एक
नयी परछाई के साथ।

~यश ©
14/10/2018

13 October 2018

वक़्त और पन्ने

ये वक़्त
अपने साथ लाता है
कुछ स्याह
कुछ सफेद पन्ने
जिन पर रचा होता है
हमारा भूत
वर्तमान और भविष्य.....
हमारी अपेक्षाएँ
आशा
और निराशा।

ये पन्ने-
कभी धारा के साथ
बहते हैं
कभी
विपरीत चलने की
कोशिश में
लगाते हैं
अपना पूरा ज़ोर।
कहीं
किसी किनारे पर
ठिठक कर
रुकते हैं
सुस्ताते हैं
किसी हमराह को
कुछ राज़ बताते हैं
और बढ़ जाते हैं
अंतहीन आदि से
अनंत की ओर।

ये वक़्त
उसकी किताब
और पन्नों का
होश खोकर
चिन्दी-चिन्दी होकर
बिखरना
ऐसा लगता है
जैसे इन चलती साँसों को
मिल गया हो मुकाम
एक निर्बाध
यात्रा के बाद।

~यश©
13/10/2018

12 October 2018

समय की बेख्याली में

समय की बेख्याली में,
मन के भीतर
उठती गिरती
कई बातों के साथ
कभी-कभी
लगता है
जैसे धँसता जा रहा हूँ
किसी दलदल में
या फँसता जा रहा हूँ
किसी रेगिस्तान की
मृगमरीचिका के
मायाजाल में।
पर
यह जो भी है
कहीं ऊपर है
दिन-रात
या
पल-पल बदलते
मौसम की
हर रंगत से
समय की
हर फितरत
और
संगत से।
वजह
या बेवजह
चलते जाने की
चाह
या
मज़बूरी
समय की बेख्याली में
ज़रूरी भी होती है
ज़ाया करने के लिए
कुछ शब्द
बस इसी तरह।

~यश©
12/10/2018