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22 November 2018

बदलाव के साथ .....

मन के
कोरे पन्ने पर
लिखते-मिटते शब्द
समय के बदलाव के साथ
बदलते जाते हैं
बस अपनी ही कहते जाते हैं।
इन शब्दों से
खेलने की चाह
होते हुए भी
मैं
मौन ही रह जाता हूँ
कुछ कर नहीं पाता हूँ।
मेरे इस मौन में
सिर्फ इंतज़ार है
अपने अन्तिम पड़ाव का
जहाँ से
बदलाव का चरम
संग ले चलेगा
एक नयी दुनिया की
नयी यात्रा पर।

-यश ©

20 November 2018

इंतज़ार में हूँ ....

इंतज़ार में हूँ
कि मौत की राह पर
बढ़ते ये कदम
कहीं थम जाएँ
तो कह सकूँ
कि अभी ज़िंदा हूँ मैं।
.
-यश ©
20/11/2018

15 November 2018

बिछड़ने के लिए यहाँ .........

सबक ज़िंदगी के 
यूं हर रोज़ मिलते हैं 
बिछड़ने के लिए यहाँ 
कुछ लोग मिलते हैं।  

कुछ पल का हँसना 
कुछ पल का मुस्कुराना
कुछ पल गले लगाना 
कुछ पल  साथ निभाना। 

न मालूम किस नशे में 
दो अनजान मिल कर 
काँच के से नाज़ुक 
कुछ सपनों को बुन कर।  

कभी खाते हैं कसमें 
कभी हर वादा तोड़ते हैं 
बिछड़ने के लिए ही यहाँ 
कुछ लोग मिलते हैं। 

-यश©
15/11/2011

10 November 2018

छुट्टियों के बाद .......

लंबी छुट्टियों के बाद
थमी हुई ज़िंदगी 
थोड़ा अलसाते हुए 
फिर पा लेती है 
ऊर्जा 
कहीं काम पर 
जाते हुए 
कहीं  से 
वापस आते हुए 
हिस्सा बन कर 
उसी भागदौड़ का 
जिससे पाया था 
थोड़ा सा अंतराल। 
यह अंतराल 
किसी को छोटा लगता है 
किसी को खलता है 
कोई इसे सुकून से जीता है 
कोई हर पल गिनता है 
पर 
छुट्टियों के बाद का 
हर पहला दिन 
सबके लिए 
थोड़ा अजीब सा होता है। 

-यश ©
(10/11/2018)

07 November 2018

दीप जलें कुछ ऐसे जग में

दीप जलें कुछ ऐसे जग में
उजियारा हर कहीं हो जाए
जन जन में उल्लास बसे
भूखा न कहीं कोई सो पाए।

मिले सद्बुद्धि हर जन-मन को
ऋद्धि-सिद्धि से युक्त सभी हों
आशा के हर गीत को गा कर
गहन निराशा से मुक्त सभी हों।

समय की बहती इस धारा में
मन का तमस गर मिट जाए
भेद-भाव से रहित दीवाली
ज्योतिर्मय सब को कर जाए।

-यश©


04 November 2018

भेद

चित्र साभार - The Eyes of Children around the World
शब्द-यशवन्त माथुर


02 November 2018

न होतीं बेटियाँ अगर तो

न होतीं बेटियाँ अगर तो
कन्या पूजन कैसे करते ?
न पढ़तीं  बेटियाँ अगर तो
बुढ़ापे में भजन कैसे करते ?
न बढ़तीं बेटियाँ अगर तो
पूरे सपने कैसे करते ?
न होतीं बेटियाँ अगर तो
सबके रिश्ते कैसे होते ?

वो दौर गया जब बेटे ही
जीने का सहारा होते थे
वो दौर गया जब बेटे ही
आँखों का तारा होते थे
वो दौर गया जब बेटे ही
आसमां को चूमा करते थे
वो दौर गया जब बेटे ही
सरहद पर झूमा करते थे

ये दौर नहीं कि बेटी को
दुनिया में कोई न आने दे
ये दौर नहीं उसके सपनों को
आकार न कोई  लेने दे ।

ये दौर है कर्ता-धर्ता का
और उसकी आत्मनिर्भरता का
ये दौर है साझी समता का
उसकी विलक्षण क्षमता का।

ये दौर है नारी शक्ति का
उसके मन की अभिव्यक्ति का
किसी मंदिर की मूरत नहीं
पर उसकी सच्ची भक्ति का।

-यश©

इन पंक्तियों के लिए मुझे मेरे संस्थान द्वारा स्मृतिचिह्न एवं प्रशस्ति पत्र द्वारा सम्मानित किया गया।