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21 June 2019

किश्तों में बंटी जिंदगी

न रिश्तों में न फरिश्तों में
जिंदगी बंटी है किश्तों में
जिन्हें चुकाने की हसरत
दिल में लिए
बीत जाती है उमर
चंद मिनटों में।

छन-छन कर मिलती
तनख़्वाह में जीना है
बेशर्म ई.एम. आई. की
न कोई सीमा है
मकान मालिक के ताने
सुनते हुए
सीढ़ी दर सीढ़ी
रोज़ चढ़ना
और उतरना है।

ये क्या है ?
जो चारों तरफ फैला हुआ
किसी मुकाम पर कोई
रोता हुआ-हँसता हुआ
कहीं मुखौटों के भीतर
सच के चेहरे हैं
मिथ्या अँधेरों पर
उजालों के पहरे हैं।

हूँ शर्मिंदा कि
क्रेडिट कार्ड के इस दौर में
मिट रही है लकीर
आम और खास की
क्योंकि किश्तों में बंटी
जिंदगी में
बहुत ज़्यादा है कीमत
किसी प्यासे की प्यास
और हर उखड़ती साँस की।

-यश©
21/जून/2019

14 June 2019

आम व खास की खाई चौड़ी करती अर्बन प्लानिंग-माशा

हाल ही मुंबई में डॉ. पायल तड़वी की मौत के बाद किसी ने टिप्पणी की कि शहरों में दलित-आदिवासी बसते तो हैं, लेकिन उनके बाशिंदे नहीं बन पाते। वहां दलित-सवर्ण खाई साफ नजर आती है। वैसे, यह खाई अमीर-गरीब के बीच भी दिखती है। दुनिया के हर कोने में। अब अर्बन प्लानिंग ही इस तरह की जा रही है कि यह अलगाव अधिकाधिक स्पष्ट होता जाता है। पिछले महीने लंदन के ‘इंडिपेंडेंट’ अखबार में खबर थी कि लंदन में रियल एस्टेट डिवेलपर्स एक ही सोसायटी में अमीर और गरीब निवासियों के साथ भेदभाव करते हैं। हाउसिंग सोसायटी को दो खंडों में बनाया जाता है- लग्जरी होम्स और सोशल हाउसिंग। लग्जरी होम्स वाले सेक्शन में बगीचे और खेल के मैदान भी होते हैं। व्यवस्था यह होती है कि उनमें दूसरे सेक्शन वाले लोग नहीं जा सकते। सोशल हाउसिंग वाले सेक्शन के लिए अलग से छोटा गेट बनाया जाता है। 

ये खास तरह का सेग्रगेशन यानी अलगाव दुनिया के हर देश की सचाई है। सत्तर के दशक में अमेरिकी शहरों में गेटेड सोसायटी की शुरुआत हुई तो अमीर-गरीब वर्गों के बीच का फर्क दिखाई देने लगा। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के दौर में श्वेत-अश्वेत लोग अलग-अलग हिस्सों में रहते थे। ग्लासगो विश्वविद्यालय (यूके) में रिसर्च असोसिएट बिल्ज सेरिन का शोध बताता है कि शहरी स्पेस में अमीर-गरीब का और जातियों का विभाजन तेजी से बढ़ रहा है। सार्वजनिक सुविधाएं और सेवाएं भी अमीर-गरीब के हिसाब से तय की जा रही हैं। हमारा देश भी इस रवैये से अलग नहीं है। दिल्ली से सटे गुड़गांव की हाउसिंग सोसायटियों में काम करने वाली बाइयों को लिफ्ट वगैरह के इस्तेमाल की इजाजत नहीं है।

दुनिया के हर देश के बड़े शहरों में ऐसी गेटेड सोसायटी मौजूद हैं। यहां दुनिया भर के ऐशो आराम हैं। बस, उनकी कीमत चुकानी होती है। वियतनाम की राजधानी हनोई में इलीट सोसायटी में रहवासियों के लिए शुद्ध हवा, टेनिस गार्डन, ब्यूटी सैलून, पोस्ट ऑफिस सब कुछ है। कनाडा के टोरंटो में विदेशी निवेशकों को आलीशान कॉन्डो मतलब फैंसी अपार्टमेंट खरीदने का मौका मिल रहा है। नाइजीरिया के लागोस में समुद्र को पाटकर प्राइवेट सिटी इको एटलांटिक प्रॉजेक्ट बनाया जा रहा है।

ऐसे लग्जरी अपार्टमेंट्स ने बुनियादी सुविधाओं को कमोडिटी बनाने का काम किया है। साफ हवा, शुद्ध पानी, साफ-सफाई आदि के लिए किसी को पैसे देने पड़ें तो जिनके पास पैसे नहीं हैं, उनका क्या होगा/ होगा यही कि वे बुनियादी सुविधाओं से वंचित होते जाएंगे। लग्जरी अपार्टमेंट्स और सोसायटी के ट्रेंड ने ऐसा ही किया है। इसने प्रशासन की जवाबदेही कम की है और लोगों के कहीं भी बसने के अधिकार का उल्लंघन किया है। हर इनसान को यह हक है कि वह अपने देश के किसी भी कोने में बस सकता है। उसकी बुनियादी जरूरतें पूरी करने की जिम्मेदारी प्रशासन की है। यह प्रवृत्ति उनका यह हक छीन रही है।

अस्सी के दशक में मुंबई की पत्रकार ओल्गा टेलिस ने बॉम्बे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (बीएमसी) के खिलाफ एक मामला दायर किया कि वह बारिश के मौसम में फुटपाथ पर रहने वालों को वहां से खदेड़ रही है। ओल्गा का कहना था कि लोग बड़े शहरों में रोजगार की तलाश में आते हैं। यह सरकार की आर्थिक नीतियों की विफलता है कि उन्हें अपने इलाकों में रोजगार उपलब्ध नहीं हो पाता और बड़े शहरों में आना पड़ता है। 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने ओल्गा की याचिका मंजूर की और कहा कि लोगों को वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराए बिना, उनके मौजूदा घरों को तोड़ने या उन्हें किसी इलाके से खदेड़ने का अधिकार प्रशासन को नहीं है।

सेग्रगेशन प्रक्रिया में हालांकि किसी को जबरन खदेड़ा नहीं जाता, लेकिन धीरे-धीरे बुनियादी सुविधाओं से बेदखल कर दिया जाता है। नतीजा वही होता है। शहर की आबादी के एक हिस्से की कीमत पर दूसरा हिस्सा चमकता है और उसे हम शहरी विकास का नाम देते हैं।

-साभार -नवभारत टाइम्स-13/जून/2019- 

13 June 2019

कुछ लोग -45

चौराहों पर
आते जाते
जीवन धारा की
तेज़ रफ्तार में
मंज़िल तक पहुँचने की
जद्दोजहद में लगे
कुछ लोग
कैसे भी कर के
बस पा लेना चाहते हैं
अपना अंतिम पड़ाव
जिसे छूना
नहीं होता
इतना भी आसान
क्योंकि
ये राहें
ये सड़कें
खुद में समाए हुए हैं
अनेकों गड्ढे और
गति अवरोधक....
इनके किनारों पर
कहीं मिलता है
अतिक्रमण
और कहीं
गंदे,बदबूदार
कूड़े के ढेर....
जिन्हें
पार कर के ही
कुछ चुनिन्दा लोग
उकेर सकते हैं
अपना अंतिम बिन्दु।
.
-यश©
13/जून /2019 

08 June 2019

अक्षर-अक्षर मिटता जा रहा हूँ

यहीं कहीं
अपने मन को
किसी कोने में रख कर
बे खयाली में
कहीं खो कर
खुद पर लगे
अनगिनत
प्रश्न चिह्नों को
सहेजते हुए
निर्वात में चलते हुए
अस्तित्वहीनता
के साक्षात स्पर्श की
अधूरी चाह के साथ
'मैं' से दूर होता हुआ
मैं
हर बीतते क्षण के साथ
सिमटता जा रहा हूँ
अक्षर-अक्षर
मिटता जा रहा हूँ ।

-यश ©
08/06/2019

01 June 2019

लाइन में रहते थे मगर साथ-साथ-विजय गोयल

कुछ लोग कहते हैं कि टाइम नहीं है, इसलिए ऑनलाइन सामान मंगवाते हैं। मैं कहता हूं, घर से बाहर ही नहीं निकलोगे तो समाज को क्या जानोगे! ऑनलाइन शॉपिंग ने आज लोगों को अपने तक सिमटाकर रख दिया है 

ऑनलाइन शॉपिंग बेहद सुविधाजनक है। बस आपको घर बैठे-बैठे फोन पर उंगलियां घुमानी हैं। अगले ही दिन सामान आ जाएगा। आपको सामान पसंद नहीं आए तो आप उसे बिना अपना नुकसान किए वापस भी कर सकते हैं। अब शायद ही ऐसी कोई चीज है, जिसे घर बैठे आप मंगवा न सकते हों। आप ऑर्डर करें और सामान आने के बाद उसके पैसे दें। इस व्यापार में कहीं कोई बड़ी धांधली भी नहीं है। ऑनलाइन शॉपिंग के जमाने में, यानी आजकल कपल्स के लिए ‘वी टाइम’ यानी दोनों को अकेले में बतियाने के लिए समय निकालना बहुत मुश्किल है। पूरा दिन काम में निकल जाता है। शाम को घर पहुंचकर हम टीवी देखते हैं और सो जाते हैं। ऐसे में अगर शॉपिंग भी लैपटॉप या मोबाइल से होगी तो आपस में जान-पहचान कब होगी/ 

किसी जमाने में जरूरत की हर चीज लेने के लिए अलग-अलग लाइनें लगती थीं और आदमी घंटों कतार में खड़ा रहता था। मुझे याद है, जब दिल्ली मिल्क स्कीम की बोतलें आती थीं, तब हम उसे लेने के लिए सवेरे-सवेरे लाइनों में लगते ताकि स्कूल जाने के समय से पहले ही दूध घर में आ जाए। सभी भाइयों को अलग-अलग दिन लाइनों में लगना होता था। कई बार तो हम थैले में पत्थर रखकर लाइन में लगा आते थे। भैंस का दूध लेने के लिए भी लाइन लगती थी। हम हर समय अपनी आंखें बाल्टी में गड़ाए रहते थे क्योंकि देखना चाहते थे कि दूधवाला कब दूध में पानी मिलाता है। वह भैंस के थन धोता तो भी हमें लगता कि कहीं वह पानी तो नहीं मिला रहा। पर उसको हमारी इन हरकतों पर कभी गुस्सा नहीं आता था। 

मिट्टी के तेल की लाइन तो बहुत ही मशहूर थी। उस समय मिट्टी के तेल से स्टोव जलाया जाता था और मिट्टी का तेल तब राशन में मिला करता था। मिट्टी का तेल पा लेने का मतलब था बहुत बड़ी उपलब्धि प्राप्त करना। स्टोव से पहले अंगीठी पर खाना बना करता था तो घर में कोयला और लकड़ी दोनों आती थी। कोयले की भी लाइन हुआ करती थी। पुराने अखबार और कागजों को जला कर अंगीठी सवेरे-सवेरे जलाते थे। जब तक वह बुझ न जाए, तब तक मां की कोशिश रहती थी कि उस पर एक-एक भगोना नहाने के लिए पानी भी गर्म हो जाए और स्कूल जाने से पहले बच्चों के लिए खाना भी बन जाए। सारे घर में इस अंगीठी का धुआं ही धुआं हो जाता था।

राशन की दुकान पर तो सबसे ज्यादा लाइनें थी। हम पांच भाई-बहन थे। कोई एक लाइन में लगता तो कोई दूसरी लाइन में लगता। दिक्कत तो उनको थी, जिनके घर बच्चे नहीं थे। उन्हें चारों तरफ खुद भागना पड़ता था। उन दिनों नौकर भी नहीं हुआ करते थे और खर्चा भी बड़े संयम से किया जाता था। आजकल के बच्चों को यह जानकर बड़ा ताज्जुब होगा कि टेलीफोन, बिजली और पानी के बिल जमा करने के लिए भी लाइनें थीं। सुपर बाजार में सामान खरीदने के लिए भी लाइनें थीं और बसों के लिए भी। 

पिछले दिनों मैंने किसी से पूछा कि अब बस की लाइनें नहीं लगती हैं क्या, तो उसने तपाक से कहा, बसें ही अब कहां हैं जो लाइनें लगेंगी। आपको याद होगा कि घरों में गेहूं को खुद ही साफ करके चक्की पर पिसवाने ले जाया करते थे। हम खुद पीपा उठाकर चक्की तक जाते थे और वहां पर भी लाइन लगी होती थी। वहां देखते थे कि कहीं हमारे बढ़िया गेहूं से पिसते आटे में उसने अपना आटा तो नहीं मिला दिया, या आटा कम तो नहीं दिया/ 

तब लोग खूब मोल-भाव करके खरीदारी करते थे। महिलाएं सब्जी खरीदते हुए जब तक मुफ्त में धनिया और मिर्च न डलवा लें, तब तक उन्हें संतोष नहीं होता था। ये लाइनें बड़ा संयम सिखाती थीं। गर्मी-सर्दी का कोई असर न था। पता नहीं, अब लाइनों का वह समय कहां जा रहा है। ऐसा तो नहीं लगता कि इन लाइनों का समय बचा कर हम बहुत बड़े तीर मार रहे हों। बाहर की लाइनें तो खत्म हुई, पर मन के भीतर की लाइनें लंबी हैं। 

हमारी चाहतें बहुत बढ़ गई हैं लेकिन मन अशांत है। तब लंबी-लंबी कतारों के बावजूद तन और मन दोनों शांत थे। आज ऑनलाइन ने अड़ोस-पड़ोस तो खत्म कर ही दिया है, रिश्तेदारी भी खत्म कर दी। खुद वस्तुएं देखकर खरीदने का जो सुख था, वह भी खत्म हो गया। ऐसा लगता है कि लेने के लिए चीजें ली जा रही हैं, चाहे उनकी जरूरत भी न हो। मुझे याद है कि पहले पूरा परिवार मिलकर शॉपिंग करने जाता था। पर अब कोई भी अपने बंद कमरे में बैठकर किसी भी चीज का ऑनलाइन ऑर्डर कर देता है, घर में किसी दूसरे को पता भी नहीं चलता। आप मोबाइल पर ऑनलाइन काम कर रहे हैं। आपको कोई चीज दिखाई देती है, आपको जरूरत न हो तो भी आप बटन दबाकर उस चीज का ऑर्डर कर देते हैं। 

तब जिंदगी अच्छी-खासी लाइन में गुजर जाती थी, पर कतारों के भी बड़े फायदे थे। इसमें खड़े-खड़े दुनिया भर की बातें होती थीं। पता चल जाता था कि पास-पड़ोस में क्या चल रहा है। एक तरह से इन लाइनों के कारण समाज में सब जुड़े हुए थे। इन्हीं लाइनों में तकरारें, झगड़े भी हो जाते थे, पर उनमें भी एक मिठास थी। और इन्हीं लाइनों में प्रेम-मोहब्बत के किस्से भी हो जाते थे। आज सारा देश, खास तौर से नई पीढ़ी ऑनलाइन की लाइन में लग गई है। लेकिन ऑनलाइन शॉपिंग ने इंसान को इंसान से काट दिया है। कुछ लोग कहते हैं कि टाइम नहीं है, इसलिए ऑनलाइन सामान मंगवाते हैं। पर मैं कहता हूं कि घर से बाहर ही नहीं निकलोगे तो समाज को क्या जानोगे, देश की समस्याओं को क्या पहचानोगे! 

(लेखकराज्यसभा सांसद हैं)

साभार -नवभारत टाइम्स-01/06/2019