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01 July 2019

'छोटू' सिर्फ 'छोटू' नहीं होते

शीशे कारों के
चौराहों पर
कहीं साफ करते हुए
मन में घबराहट
चेहरे पर
मासूम मुस्कान
सहेजे हुए
किसी ढाबे या
दुकान पर
मजदूरी करते हुए
वो देखते हैं सपने
कि
किसी दिन
बहुत दूर होगी
ये लाचारी
बाप की बीमारी।
माँ-भाई-बहनों की
परवरिश का बोझ
अपने नाज़ुक से
कंधों पर लिए
समय से पहले ही
प्रौढ़ता के चरम को
हर कदम
अपने साथ लिए
इन्सानों की
चलती-फिरती
स्याह-सफ़ेद जिंदगी के
हर पहलू में
रचे बसे
स्वनामधन्य
ये 'छोटू'
सिर्फ 'छोटू' नहीं होते
घर के
बड़े होते हैं।

-यश ©
01/07/2019 

1 comment:

Anita said...

मार्मिक रचना..

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