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24 October 2019

दो दो आसमां .......

एक ये भी ....... है
एक वो भी आसमां है। 
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ये ज़मीं से ऊपर है
वो सितारों से नीचे है।
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एक आसमां
सिरहाने तकिये के
कहीं चैन की नींद सोता है
एक आसमां
किसी चौराहे पर
सरेआम रोता है। 
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एक आसमां
मन की रारों का है
या नदी के किनारों का है
एक आसमां
सरहदों पर लगे
कँटीले तारों का है।
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एक आसमां
थोड़ा तुम्हारा है 
थोड़ा हमारा है
एक आसमां में सिर्फ
फिज़ाओं  का बँटवारा है।
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-यश ©
20/10/2019 


20 October 2019

कुछ कह न सका.....

अफसोस ये कि दिल से कुछ कह न सका,
अफसोस ये कि दिल की कुछ सुन न सका।
यूँ तो राही बनके आया था इस जहां में मगर,
कदम कमज़ोर ये ही थे कि ठीक से चल न सका।
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-यश©
17/10/2019

08 October 2019

दशहरा मना कर क्या होगा ?

मर न सका जो रावण मन का
पुतले जला कर क्या होगा ?
अज्ञानी थे,अज्ञानी हैं हम
दशहरा मना कर क्या होगा ?

मन के भीतर अंधकार हमारे
मर रहे संस्कार हमारे
केवल कागज़ी सिद्धांतों का
नारा लगाने से क्या होगा ?

एक रंग का लहू है भीतर
तलवार चलाने से क्या होगा?
बन न सके जो इंसान अभी तक
दशहरा मना कर क्या होगा ?

-यश ©
06/10/2019

02 October 2019

रीत युग की बदल रही

श्रद्धा के दो फूल चढ़ाऊँ 
कैसे तुम्हारी समाधि पर? 
रीत युग की बदल रही 
अब खुद की बर्बादी पर। 

सोचता हूँ तुम जहाँ भी होगे 
परिवर्तन को तो देखते होगे 
इन्हीं दिनों के लिए दी कुर्बानी 
तुमने देश की आज़ादी पर ?

नोटों पर छप कर क्या होगा 
आदर्शों की नीलामी पर ?
'हे राम'! ही मालिक अहिंसा के 
सूने चरखे,खादी पर!

-यश ©
01/10/2019