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17 September 2020

चाहिए

जो बैठे हैं बेकार उनको रोज़गार चाहिए।
जो सुने सबकी पुकार ऐसी सरकार चाहिए।

खुशहाल मजदूर-किसान-नौ जवान चाहिए।
दो जून की रोटी, कपड़ा और मकान चाहिए।

संविधान की प्रस्तावना का स्वीकार चाहिए।
शोषण मुक्त समाज का स्वप्न साकार चाहिए।

जागृति के गीतों का अब आह्वान चाहिए।  
प्रगति की राह पर नया अभियान चाहिए।

-यशवन्त माथुर ©
17092020
#बेरोजगार दिवस

10 September 2020

True Caller को मिलने वाली है Google से चुनौती

True Caller एक ऐसी एप्लीकेशन है जो लगभग सभी के एंड्रॉएड फोन में पाई जाती है। एक ऐसे समय में जब हर व्यक्ति व्यस्त है, सभी का प्रयास यथा संभव अनचाहे फोन कॉल्स से बचना होता है और ऐसे में True Caller जैसी एप्स जरूरी भी हो जाती हैं। 

तकनीकी विशेषज्ञ True Caller को डाटा चुराने वाली एप भी बताते रहे हैं और तमाम नकारात्मकता के बाद भी यह एप अपनी खसियतों की वजह से सबसे ज्यादा उपयोग  की जाने वाली एप बनी हुई है।   

गत मंगलवार (08 सितंबर) को गूगल ने सभी एंड्रॉएड आधारित फोन्स पर Verified Calls के एक नए  फीचर की घोषणा की है। अपने शुरुआती चरण में यह फीचर भारत, ब्राजील, मैक्सिको, स्पेन और अमेरिका में उपलब्ध कराया जाएगा और बाद में दुनिया के सभी एंड्रॉएड आधारित फोन्स में इसका अपडेट दिया जाएगा।
   

इससे पहले दिसंबर 2019 में Verified SMS नाम का फीचर गूगल द्वारा उपलब्ध कराया गया था और इसके सफल परिणामों और लोकप्रियता के बाद अब गूगल ने ट्रू कॉलर को चुनौती देने का पूरा मन बना लिया है। 

Verified Calls नाम का यह नया फीचर फोन में पहले से ही मौजूद गूगल एप के ही एक हिस्से के रूप में कार्य करेगा, यानी इस फीचर के उपयोग हेतु किसी अन्य एप को इन्स्टॉल करने की आवश्यकता नहीं होगी। 

इस फीचर के जरिए कॉलर का नाम , उसका लोगो, और व्यापारिक पहचान की जानकारी स्क्रीन पर ही मिल जाएगी जिससे निश्चित तौर पर स्पैम और फ्रॉड कॉल्स से बचा जा सकेगा। 

गूगल के आधिकारिक ब्लॉग पर उपलब्ध इस फीचर के बारे में अधिक जानकारी यहाँ क्लिक करके प्राप्त कर सकते हैं। 


-यशवन्त माथुर- 

04 September 2020

निजीकरण : दूर के ढोल सुहावने --- राकेश श्रीवास्तव

आज कल निजीकरण एक विमर्श का विषय बना हुआ है। वर्तमान सरकार का सारा ध्यान येन केन प्रकारेण सरकारी संस्थानों का निजीकरण करके अप्रत्यक्ष रूप से आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था को समाप्त करने पर लगा हुआ है। रेलवे से लेकर बैंक तक सभी जगह या तो विलय की बात चल रही है या इन संस्थानों का  निजीकरण करने के प्रयास किये जा रहे हैं और आश्चर्य की बात तो यह है कि समाज के एक बड़े वर्ग द्वारा इन प्रयासों का खुलकर समर्थन किया जा रहा है। निजीकरण वास्तव में दूर के ढोल सुहावने लगने जैसा ही है। इसकी अव्यावहारिकता पर प्रकाश डालते हुए सेवनिवृत्त बैंकर श्री राकेश श्रीवास्तव जी ने एक फ़ेसबुक पोस्ट लिखी है जो साभार यहाँ प्रस्तुत है -

" निजीकरण के लाभ दूर से ही अच्छे लगते हैं।  पहले निजी बैंकों को ही ले।  ग्लोबल ट्रस्ट बैंक को बदहाल होने पर ओबीसी में मर्ज किया गया। यस बैंक की शिखा शर्मा ने नोट बंदी में क्या किया सबको पता है।  वीडियोकॉन और आईसीआईसीआई बैंक दोनों प्राइवेट हैं । चंदा कोचर मैडम के कारनामे सबके सामने हैं। उन पर मेहरबानी के लिए बीमार होने के बावजूद जेटली साहब का लिखा ब्लॉग शायद याद हो। यस बैंक की हालत भी किसी से छुपी नहीं है। एनबीएफसी को भी शामिल करेंगे तो यह बढ़ता ही जाएगा। 

रही बात निजीकरण के अच्छी होने की तो इसमें यह नही भूलना चाहिए कि अपने देश की कंपनियो की लाभ की ललक इतनी बढ़ जाती है कि वो कंपनी को ही खाने लगती है।  जेट एयरवेज का उदाहरण सामने है। एसबीआई को उसको बेल आउट करने के प्रयास के लिए सरकार के निर्देश पर पैसा देना पड़ा।  इसके अतिरिक्त तमाम निजी कंपनियों का पैसा आखिरकार बैंकों को राइट ऑफ करना पड़ता है। 

आपने स्कूल और अस्पताल की बात की है।  अब भी भारत की अधिकांश जनता सरकारी स्कूल और अस्पताल पर ही निर्भर है।  यदि यह न हो तो करोड़ों बच्चे बेसिक शिक्षा से भी वंचित रह जाएंगे।  इसी प्रकार इलाज के लिए अभी भी बहुसंख्यक आबादी या तो सरकारी अस्पतालों पर निर्भर है या फिर झोला छाप डॉक्टरों पर।  उनके पास भरपेट भोजन के पैसे तो है नहीं। प्राइवेट स्कूल व प्राइवेट डॉक्टर की फीस तो एक सपना है।  शिक्षा व चिकित्सा दोनो ही आजकल सबसे अच्छे धंधे हैं। 

इसमें कोई शक नहीं कि गैर सरकारी उपक्रमों मे हमारे भाई ही काम करते है। पर उनका भी किस तरह से शोषण हो रहा है।  ठेके पर रखे जाने वाले किसी भी कर्मचारी को देख लीजिए चाहे वो गार्ड, सफाई कर्मचारी, अस्पतालों में कार्यरत कर्मचारी, कंप्युटर ऑपरेटर, टेक्नीशियन हो उनकी तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा ठेकेदार की ही जेब में जाता है।" 

राकेश श्रीवास्तव
एक रिटायर्ड बैंकर 

02 September 2020

मन का एक कोना है और मैं हूँ

नहीं चाहता बताना
नहीं चाहता समझाना
कि इस दौर में
आखिर इतना उलझा हुआ
क्यूँ हूँ
बस मन का एक कोना है
और मैं हूँ

ये जो संगीत की लहरें
गुजर रही हैं
कानों से मन के भीतर
साथ हैं मेरे फिर भी तन्हा सा
क्यूँ हूँ
बस मन का एक कोना है
और मैं हूँ

यूं लिखते-लिखते
पढ़ते-पढ़ते
सब समझते-बूझते
आखिर ना-समझ इतना
बनता क्यूँ हूँ
बस मन का एक कोना है
और मैं हूँ

दिखते हैं सब अपने
लेकिन पराए ही हैं
बेमतलब के रिश्तों में
फँसता ही क्यूँ हूँ
बस मन का एक कोना है
और मैं हूँ

-यशवन्त माथुर ©
02092020

27 August 2020

बहुत हैं....

प्रश्न भी बहुत हैं
उत्तर भी बहुत हैं
फिर भी
उलझनों की राह पर
वक़्त चलता जा रहा है
जाने क्या होता जा रहा है?

सोचा तो नहीं था
कि ऐसा भी होगा
जिन्हें अपना समझता रहा
उनकी नज़रों में
धोखा ही होगा।

कल्पना के हर उजाले में
अब अंधेरे बहुत हैं
कोरे स्याह इन पन्नों को
कुरेदने वाले बहुत हैं।

-यशवन्त माथुर ©
27082020 

26 August 2020

फ्यूचर ग्रुप-- यह तो होना ही था

फ्यूचर ग्रुप की बदहाली की खबरें काफी दिन से सुनने में आ रही हैं और आज एक और खबर सुनने में आ रही है कि आई पी एल 2020 की एसोसिएट -स्पॉन्सरशिप से भी आखिरी समय में यह ग्रुप पीछे हट गया है। 

अपुष्ट सूत्रों से सुनने में यह भी आ रहा है कि इसे 'जिओ मार्ट' द्वारा खरीदने की तैयारी है। सच यह है कि फ्यूचर ग्रुप, खासकर बिग बाजार पर रिलायंस की नजर आज से नहीं  एक लंबे समय से है/ थी । 

बिग बाजार छोड़े हुए मुझे ही 10 वर्ष से ज्यादा हो गया है और जिस दौरान बिग बाजार स्टोर्स का एक्सपेन्शन हो रहा था यानी एक ही शहर में जगह-जगह स्टोर्स खोले जा रहे थे, उस दौरान भी रिलायंस द्वारा इसे खरीदने के प्रयासों की बातें सामने आ रही थीं। 

(चित्र में आगरा बिग बाजार के तत्कालीन स्टोर मैनेजर श्री गौतम जोशी जी के साथ मैं और अन्य सहकर्मीगण) 

उस समय भी हम कुछ कर्मचारियों का एक वर्ग आंतरिक तौर पर इस स्टोर एक्सपेन्शन से चिंतित था क्योंकि इतने बड़े स्टोर्स एक शहर में 1-2 हों तो ही प्रॉफ़िट जेनरेशन के लिए अच्छा होगा। लेकिन पता नहीं किस दिमाग से एक ही शहर में 4-4 बिग बाजार (जैसे लखनऊ में ही 4 से ज्यादा स्टोर्स हैं) खोल दिये गए और कर्मचारियों से उम्मीद की जाने लगी कि वे सेल्स टारगेट पूरे करके दें। 

2006 में आगरा के पैसिफिक मॉल वाला स्टोर, जहाँ से मैंने अपने करियर की शुरुआत की थी, बहुत पहले ही बंद हो चुका है। क्योंकि हरिपर्वत स्थित रतन मॉल  वाले स्टोर ने एक बड़ा फुटफ़ॉल कैप्चर कर लिया और लोग फतेहाबाद रोड जाने से हिचकने लगे। 

(15 सितंबर 2006 को आगरा में पहला बिगबाजार खुला जिसका समाचार 16 सितंबर के 'हिंदुस्तान' में प्रकाशित हुआ था) 

बहरहाल अब जो हो रहा है, कुछ लोगों को इसका अंदाज पहले से ही था इसलिए फ्यूचर ग्रुप की इस हालत पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यह और बात है कि जो लोग इससे जुड़े हैं या जुड़े रहे हैं उनकी यादों में यह हमेशा जीवित रहेगा। 


-यशवन्त माथुर ©
26082020

23 August 2020

आज की शाम (2 शब्द 3 चित्र)


हम सिर्फ सोचते रह जाते हैं
ख्यालों के बादल
आ कर चले जाते हैं

Shot by Samsung M30s-Copyright-Yashwant Mathur©
 मैं चाहता हूँ
बरस जाएं लेकिन
थोड़ा गरज कर ही
मंजिल पा जाते हैं

Shot by Samsung M30s-Copyright-Yashwant Mathur©
 ये आज की शाम है
मगर किस्सा हर रोज का है
कुछ शब्द लिखते हैं 
कुछ मिटा दिये जाते हैं। 

Shot by Samsung M30s-Copyright-Yashwant Mathur©

-यशवन्त माथुर ©
23082020 



22 August 2020

छोटी बात

जो सक्षम हो कर भी
असमर्थ हों
उन तथाकथित
अपनों से दूर होने की
गर आ जाए सामर्थ्य
तो धन्य हो कर
कूच कर जाऊँ
एक नयी दुनिया की ओर।

-यशवन्त माथुर ©
22082020

21 August 2020

कुछ तो होना ही है

विध्वंस या निर्माण
जन्म या मरण
प्रश्न या उत्तर
उत्तर या प्रश्न
जो आज यक्ष है
कल उसे
प्रत्यक्ष होना ही है
समय का परिवर्तन
सुनिश्चित ही है
पाना है कुछ
और कुछ तो
खोना ही है।

-यशवन्त माथुर
20082020

16 August 2020

मैं लोकतंत्र हूँ

मैं
समय के पहियों पर
जीता-जागता
चलता-फिरता
उलझता-सुलझता
अक्सर दिखता रहता हूँ
सबको
आकर्षित करता रहता हूँ
अपनी
खोखली देह के ऊपर
रचे-बसे
मांसल
हुष्ट- पुष्ट
आवरण से।

यह आवरण
जो सिर्फ छद्म
क्षणिक ही है
अपनी अपार शक्ति
और गुरुत्वाकर्षण से
अपने आगे
कर देता है
नतमस्तक
समूचे ब्रह्माण्ड को।

फिर भी
सच तो यही है
कि
आज के इस दौर में
संभव नहीं उपचार
मेरे भीतर को चीरती
दीमक का
मृगमरीचिका जैसे
प्रत्यक्ष भ्रमजाल का
अस्तित्व की कड़ी परीक्षा के
इस विपरीत काल का।

..और तब भी
कागजों पर यह कहा जाता है
कि मैं अमर हूँ ....
स्वतंत्र हूँ ..

मैं  लोकतंत्र हूँ !

-यशवन्त माथुर ©
16082020

15 August 2020

राग देश का ऐसा गाओ


गूंज उठे नभ जयकारों से
राग देश का ऐसा गाओ
भारत के इस मंगल पर्व पर
संकल्प समरसता का दोहराओ।

बांटने वाले हर विकार को
मन से अपने दूर हटाओ
एक ज़मीं पर एक हमीं हैं
एक सूत्र से सब बंध जाओ।

संस्कृतियों के समवेत स्वर से
अखिल शांति का गीत बनाओ
विश्व सुने सिर्फ अपनी गाथा
राग देश का ऐसा गाओ।

-यशवन्त माथुर ©

14 August 2020

देहरी के उस पार

बरसाती रात के
गहरे सन्नाटे में
मौन के आवरण के भीतर
मेरे मैं को खोजते हुए
चलता चला जा रहा हूँ
हर पहर
बढ़ता जा रहा हूँ।

एक अजीब सी दुविधा
एक अजीब सी आशंका
हर कदम पर
हाथ पकड़ कर
खींच ले रही है
अपनी ओर
जाने नहीं देना चाहती
उस ओर
जहाँ
मन की देहरी के उस पार
मुक्ति
कर रही है
बेसब्री से
मेरा इंतजार।

-यशवन्त माथुर ©
14/08/2020 

13 August 2020

Libre office का वर्जन 7.0 जारी

ऑफिस सॉफ्टवेयर के प्रयोग के बारे में यदि बात की जाय तो ढेरों विकल्प उपलब्ध होने के बाद भी एम एस ऑफिस के बाद सर्वाधिक उपयोग किया जाने वाला सॉफ्टवेयर लिब्रे ऑफिस (Libre Office) ही है।
(Image with thanks from libreoffice.org)

लिब्रे ऑफिस (Libre Office) एक ऐसा ऑफिस प्रोग्राम है जो न सिर्फ लिनक्स बल्कि विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम को भी सपोर्ट करता है। 

एम एस ऑफिस जहां ढेरों फीचर्स से युक्त एक पेड (Paid) सॉफ्टवेयर है वहीं मुक्त स्रोत होने के कारण लिब्रे ऑफिस मुफ़्त होने के साथ ही एक सामान्य प्रयोगकर्ता को उसकी आवश्यकता के सभी फीचर्स उपलब्ध कराता है।

अभी हाल ही में इसके विकासकर्ताओं की ओर से एक नया वर्जन 7.0 जारी किया गया है। जानते हैं इस वर्जन की कुछ मुख्य बातें-
  1. इस नए वर्जन में यूजर इंटरफ़ेस पर काम किया गया है और इसे SUKAPURA नाम की एक नई थीम से और आकर्षक बनाने का प्रयास किया गया है। 
  2. लिब्रे ऑफिस (Libre Office) के स्प्रेडशीट प्रोग्राम CALC में  “RAND.NV()” और “RANDBETWEEN.NV()” को सक्षम किया गया है। 
  3.  Libre Office Writer में padded numbering का विकल्प जोड़ कर और अधिक सुविधाजनक बनाया गया है। साथ ही Semi Transparent Text का विकल्प भी जोड़ दिया गया है। 
इनके अलावा Impress & Draw  में आमूल-चूल परिवर्तन करने के साथ ही अब Vulkan और ODF 1.3Suport के द्वारा इसे और भी अधिक उपयोगी बना दिया गया है।

Libre Office 7.0 के बारे में और अधिक जानकारी यहाँ क्लिक करके प्राप्त कर सकते हैं। 


Libre Office Download Page


-यशवन्त माथुर-

12 August 2020

Windows10 जैसा दिखने वाला नया ऑपरेटिंग सिस्टम - Linuxfx

जैसा कि हम जानते हैं, वर्तमान में कंप्यूटर उपयोगकर्ताओं हेतु 3 प्रकार के ऑपरेटिंग सिस्टम्स प्रचलन में हैं-Windows, Mac और Linux. भारत में एक सामान्य प्रयोगकर्ता विंडोज़ पर ही कार्य करना पसंद करता है क्योंकि यह बहुत ही आसान और सुविधाजनक है। 

(Image curtsy:Google Image Search)

इसके विपरीत Mac एप्पल के लैपटॉप पर देखने में आता है और लिनक्स के लिये यह माना जाता है कि इस पर कार्य करने हेतु विशेष तकनीकी कुशलता की आवश्यकता होती है। 

एक तरफ जहां विंडोज और मैक पेड (Paid) ऑपरेटिंग सिस्टम्स हैं वहीं लिनक्स और इस पर चलने वाले सॉफ्टवेयर मुक्त स्रोत (Open Source) होने के कारण बिल्कुल मुफ़्त होते हैं, अर्थात इन्हें मुफ़्त में डाउनलोड किया जा सकता है, इनके तकनीकी कोड्स में परिवर्तन किया जा सकता है और मुक्त रूप से वितरित भी किया जा सकता है।

(Image curtsy:Google Image Search)

यूं तो लिनक्स के बहुत सारे वर्जन उपलब्ध हैं लेकिन ubuntu एक सामान्य लिनक्स प्रयोगकर्ता द्वारा सर्वाधिक प्रयोग और पसंद किया जाने वाला ऑपरेटिंग सिस्टम है। 

ubuntu के ही कोड्स में परिवर्तन करके एक नए ऑपरेटिंग सिस्टम Linuxfx/Winfx का विकास ब्राजील के डेवलपर राफेल राशिद (RAFAEL RACHID) द्वारा किया गया है जो दिखने और कार्य करने में बिल्कुल विंडोज 10 के जैसा ही है। 

(Image curtsy:Google Image Search)

अन्य लिनक्स वितरणों के विपरीत  कंप्यूटर पर इंसटालेशन और कार्य करना बहुत ही सुविधाजनक होने के कारण  Linuxfx/Winfx वर्तमान में चर्चा बना हुआ है। 

तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि विंडोज के लोगो और ले-आउट का प्रयोग करने के कारण एक ओर जहां इसके विकासकर्ता पर माइक्रोसॉफ्ट की ओर से कॉपीराइट का उल्लंघन का मामला दर्ज कराए जाने की संभावना है वहीं दूसरी ओर Linuxfx/Winfx  अपनी सरलता के कारण विंडोज के लिए खतरे की घंटी बन कर उभरा है। 

बहरहाल जो भी हो, यदि Linuxfx/Winfx विंडोज का एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी बन कर उभरता है तो यह लिनक्स की लोकप्रियता को बढ़ाने के साथ ही सभी के हित में होगा। 

(Image curtsy:Google Image Search)

Linuxfx/Winfx के बारे में अधिक जानकारी निम्न लिंक्स पर प्राप्त की जा सकती है-






-यशवन्त माथुर-

11 August 2020

Shravasti Trip Photographs (30/11/2019)-Part-III



































IMAGEs COPY RIGHT-YASHWANT MATHUR©

09 August 2020

चाहता हूँ अब प्रलय आए

कुछ ऐसा हो
जो दिल दहलाए
धरती गगन समंदर
सब हिल जाए
 चाहता हूँ
अब प्रलय आए।

ठौर बदलते इस
बुरे दौर का
जलता दीपक
अब बुझ जाए
 चाहता हूँ
अब प्रलय आए।

कोई नहीं
भरोसे जैसा
धोखे का
निशाँ  मिट जाए
चाहता हूँ
अब प्रलय आए।

-यशवन्त माथुर ©

25 July 2020

दोहरापन

एक दिन एक पुरानी डायरी के पन्ने पलटते हुए 18 वर्ष पहले लिखी गई इन पंक्तियों पर निगाह रुक गई।
संभवतः  कक्षा 12 की परीक्षा का परिणाम तब तक नहीं आया था और उस समय खाली समय बिताने का अपने पास यही एक माध्यम था।

दहेज प्रथा की  विषयवस्तु पर आधारित ये पंक्तियाँ आगरा की एक वरिष्ठ नेत्री के बारे में पापा द्वारा बताई गई बातों और उस पर मेरी कल्पना के नमक-मिर्च का परिणाम थीं। इनमें कुछ नाम-मात्र के सम्पादन के साथ आज डिजिटाइज़ कर दे रहा हूँ।
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सजा था भव्य मंच, इत्र सुगंध थी चहुं दिशि छाई हुई।
नारी कल्याण समिति की अध्यक्षा थीं,सभा में आई हुईं।
गा रही थीं स्वागत गान उनका, संचालिका कोकिल कंठ से।
और निकल रहे थे उदगार दहेज विरोधी, समवेत स्वर से।
सुन स्तुति अपनी, अध्यक्षा थीं बड़ी प्रफुल्लित हुईं।
फिर आग्रह पर, बन ठन कर,जा माइक पर खड़ी हुईं।
निकृष्ट पुरुष समाज का,निंदा गान उन्होंने कर दिया।
इस तरह दहेज विरोध में,लंबा व्याख्यान उन्होंने दे दिया।
सभा थी चल रही, किन्तु बीच में, मोबाइल की घंटी बजी।
सुनकर संदेश, तुरंत ही वह अपने घर को निकल पड़ीं।
बात पुत्र के विवाह की, थी उनके घर पर चल रही।
कार, टीवी, फ्रिज, स्कूटर की मांग पर वह अड़ी रहीं।
किन्तु तभी किसी ने, उनका टीवी चालू कर दिया।
होने वाली पुत्रवधू ने, उनका भाषण देख लिया।
थी उठ खड़ी वह तुरंत ही, माता-पिता चकित हुए।
बोल उठी वह कन्या अपना संकोच त्यागते हुए।
मैं नहीं करूंगी विवाह, इस दो रंगे परिवार में।
दहेज विरोधी सास भी, है फँसी इसी व्यापार में।
धीरे-धीरे बात यह, जब औरों को मालूम हुई।
शहर की जनता को भी जब उनकी असलियत मालूम हुई।
कालिख पोत के चेहरे पर, उन्हें नगर में घुमाया गया।
इसके बाद किसी सभा में, उनको नहीं पाया गया।
कैसे करें उपचार दहेज का, इसे विचारें हम और आप।
लेना-देना ऐसे दान का, है समाज पर यह अभिशाप।

-यशवन्त माथुर ©

04 July 2020

बेमानी ही है

कुछ सवाल
अब तक
सिर्फ सवाल ही बने हुए हैं
और मैं
नहीं समझता देना
जवाब
हर उस बात का
जिसका होना
या न होना
बेमानी ही है।

-यशवन्त माथुर ©
04072020 

02 July 2020

मौसमों की तरह गुजरता रहा..

वक़्त आकर गुजरता रहा
मैं टकटकी लगाए बस देखता रहा
कोई छू कर गुज़रा था अभी - अभी जैसे
मैं सोया था, दिन में तारे गिनता रहा।

और जब होश आया -
तो कितनी ही शामें गुज़र चुकी थीं
शमा कितनी ही जली थीं,
और बुझ चुकी थीं।

ये दौर तन्हाइयों का है,
तुम क्या समझोगे साहिब!

एक नश्तर चुभता रहा
और मैं जीता रहा
वक़्त आ-आकर
मौसमों की तरह गुजरता रहा।

-यशवन्त माथुर ©
02072020

01 July 2020

जो हो रहा है, होने दो

अंधेरे हैं, अंधेरे ही रहने दो। मुखौटों के पीछे, मुखौटे ही रहने दो।
डर लगता है, सच के बाहर आने से। जो दबा है भीतर, भीतर ही रहने दो।
हो गया उजास, तो नाकाबिल हो जाऊंगा मैं। मुकाबिल होके जमाने का, खो जाऊंगा मैं।
हैं हरे अब भी ज़ख्म, उन बीत चुकी बातों के। फिर सींच दिया, तो सूख कर बिखर जाऊंगा मैं।
इसलिए अच्छा है कि जो हो रहा है, होने दो।
वक़्त गर्द में कहीं खो रहा है, खोने दो।
-यशवन्त माथुर ©
01072020

Shravasti Trip Photographs (30/11/2019)-Part-II

































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