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30 April 2020

खाली पन्ने

कभी-कभी 
आँखों के सामने 
ये खाली पन्ने 
बाट जोहते रहते हैं 
कि कोई कलम 
समय रहते 
उनकी सुध ले ही ले। 
 
ये खाली पन्ने 
कभी शांत बैठे रहते हैं 
कभी हवा के हर झोंके के साथ 
मिलाते हुए ताल 
बड़बड़ाते रहते हैं 
बताते रहते हैं 
अनचाहे निर्वासन की 
मजबूरी में 
न लिखी जा सकने वाली 
कहानी और 
अपना हाल। 
 
काश!
इन खाली पन्नों का हर कोना 
अमिट स्याही और 
शब्दों से आबाद रह कर 
गर बता पाता 
बनती-बिगड़ती सभ्यताओं की दास्तान 
तो क्या हम 
और हमारा इतिहास 
वर्तमान जैसा होता ?
या हम निकल ही नहीं पाते बाहर 
भूत के हर निकास पर बने 
समय के चक्रव्यूह से ?

-यशवन्त माथुर ©
30/04/2020

29 April 2020

कुछ लोग-50

वर्षों से
जीवन का हिस्सा बने
कुछ लोग
खोखला करने का
मौका पाते ही
बन जाते हैं
ऐसी दीमक
जो भीतर ही भीतर
भेदती जाती है
अंग-प्रत्यंग
और हमें पता ही नहीं चलता
क्योंकि हम
आँखें मूँद कर
करते रहते हैं विश्वास
सच जैसे दिखने वाले
उनके सफेद झूठ पर।

हमें बचना चाहिए
ऐसी दीमकों के
कुप्रहार से ..
हमें करना चाहिए
पहले ही कोई उपाय
कि पनप ही न पाएं
पल ही न पाएं
नहीं तो
सच सामने आते-आते
हो चुकती है इतनी देर
कि सिर्फ  बाकी रहते हैं
अवशेष
धूल में मिल कर
कहीं उड़ चुके
विश्वास के।

-यशवन्त माथुर ©
29/04/2020

28 April 2020

हिन्मुश्चियन (Hinmustian) हूँ मैं

कौन हूँ मैं
अक्सर लोग पूछते हैं
मेरी जाति, मेरा धर्म बूझते हैं
जैसे यह कोई पहेली हो
जैसे यह जानना बहुत जरूरी हो
ताकि वो सहज हो सकें
मेरे इंसानी चेहरे-मोहरे
रंग-रूप और नस्ल से
या मुझे ही सहज कर सकें
अपने पूर्वाग्रही
अक्स से।

मैं खुद भी
दीवार पर लगे आईने में
खुद को देखकर भी
यही पूछता हूँ
कि इस देह
और मन के सिवा
क्या कुछ और भी हूँ मैं ?
आखिर कौन हूँ मैं ?

आत्ममंथन के कई दिनों
और रातों के बाद
स्वप्नों में खुद से कही बातों के बाद
निष्कर्ष निकला यही
कि सब कुछ हूँ -
हिन्दू हूँ-
मुस्लिम-सिख और
क्रिश्चियन भी हूँ मैं
हिन्मुश्चियन (Hinmustian) हूँ मैं ।

-यशवन्त माथुर ©
28/04/2020

27 April 2020

मानता हूँ

मानता हूँ 
कि मेरे शब्द 
बहुत साधारण हैं 
ये साहित्यिक नहीं 
न ही इनमें दिखता है 
काव्य का सौन्दर्य और 
व्याकरण। 

ये शब्द 
सिर्फ आकार हैं 
उन विचारों और 
बातों के 
जो मन में उमड़ती रहती हैं 
कुछ-कुछ कहती रहती हैं 
और मैं 
घूम-फिर कर 
अपनी सीमित शब्दावली को 
उलट-पुलट कर 
सिर्फ दोहराता ही रहता हूँ। 

यह गद्य है या पद्य 
मैं खुद नहीं जानता हूँ 
स्वाभाविक है 
प्रश्न चिह्नों का लगना 
यह मानता हूँ।  

-यशवन्त माथुर ©
27/04/2020

26 April 2020

अच्छा नहीं लगता

अच्छा नहीं लगता
जब देखता-सुनता हूँ खबरें
कि कहीं
दुनिया के किसी कोने में
भूख और प्यास से तड़प कर
मर जाता है कोई।

अच्छा नहीं लगता
जब तस्वीरें दिखाती हैं
कहीं कूड़े की तरह
बिखरा हुआ अनाज और
किसी पंप से
यूं ही बहता हुआ पानी।

अच्छा नहीं लगता
जब खुद को
घर में कैद पाता हूँ
दो वक्त या उससे ज्यादा
जितना मन हो खाता हूँ ।

अच्छा नहीं लगता
कि इतना सब कुछ भी
कुछ नहीं के जैसा है
किसी को नसीब हैं
महल और महफिलें
और कोई
अपनी भूख को खाता
पसीने को पीता है।

-यशवन्त माथुर©
26/04/2020

25 April 2020

कभी मजदूर न बनो

कुछ भी बनो इंसानों !
ऐसे मजबूर न बनो
ये आलम ऐसा है कि
कभी मजदूर न बनो।

न चलना पड़े पैदल
मीलों को नापते -नापते
न होना पड़े रुखसत
कहीं हांफते-हांफते।

कुछ भी बनो इंसानों !
बस कोई गुरूर न बनो
बेकदरी ही मिलेगी यहाँ
कभी मजदूर न बनो।

-यशवन्त माथुर©
25/04/2020

24 April 2020

माथुर नई सड़क वाले- साभार नवभारत टाइम्स

माथुर नई सड़क वाले
साड्डी दिल्ली
विवेक शुक्ला

च में लॉकडाउन के कारण घरों में बंद दिल्ली के माथुर परिवारों का भी धैर्य जवाब देने लगा है। अब देखिए कि वे ना तो अपने रोशनपुरा के चित्रगुप्त मंदिर में जा पा रहे हैं और ना ही कालकाजी मंदिर या महरौली के योगमाया मंदिर में। नई सड़क से बस चंदेक मिनटों में आप रोशनपुरा के चित्रगुप्त मंदिर में पहुंच जाते हैं। इधर कायस्थों के आराध्य चित्रगुप्त जी की मूर्ति है। एक बडा सा शिवाला भी है। इन सब मंदिरों में माथुर परिवार बीच-बीच में आना पसंद करते हैं।

हां, नई सड़क, किनारी बाजार, चहलपुरी, अनार की गली, चौक रायजी, चीराखाना, बीवी गौहर का कूचा वगैरह से बहुत सारे माथुर परिवार दिल्ली-एनसीआर के अलग-अलग एरिया में शिफ्ट कर गए हैं। आई.पी. एक्सटेंशन की श्रीगणेश सोसायटी में दर्जनों माथुर परिवार रहते हैं। लेकिन अपने पुरखों के मोहल्लों-हवेलियों से नाता टूटता थोड़े ही है। वह रिश्ता चित्रगुप्त मंदिर के जरिए बना हुआ है। पर इस सत्यानाशी कोरोना वायरस ने इन्हें अपने तीर्थस्थलों से ही दूर कर दिया है। कालकाजी मंदिर में साल में तीन बार दिल्ली के माथुर रसोई, फिर कढ़ाई और अंत में सावन की खीर के आयोजनों में मिलते हैं। ये सब सौ साल पुरानी परंपराएं हैं।


दिल्ली की माथुर बिरादरी की बात हो और पार्श्वगायक मुकेश और चीरखाना में जनमे गदर पार्टी के संस्थापक और अग्रणी क्रांतिकारी लाला हरदयाल का जिक्र ना हो, यह नहीं हो सकता। मुकेश का परिवार चहलपुरी में रहता था। वे मंदिर मार्ग के एमबी स्कूल में प़ढ़ते थे। वे बंबई जाने के भी बाद भी हर जन्माष्टमी पर दिल्ली में होते थे। यहां पर वे अपने इष्ट मित्रों के साथ नई सड़क में जन्माष्टमी पर लगने वाली झांकियों में जाकर भजन सुनाते थे। मुकेश के घर के बाहर कोई पत्थर वगैरह नहीं लगा हुआ ताकि उनके चाहने वाले कभी इधर आ सकें। लाला हरदयाल के नाम पर हरदयाल लाइब्रेयरी है।

इस बीच, आपने देखा होगा कि एक छोटी सी सड़क हरीशचंद्र माथुर लेन मिलती है कस्तूरबा गांधी मार्ग पर। दिलचस्प है कि इन माथुर साहब को अपने माथुर अपना नहीं मानते। वे तीसरी लोकसभा के राजस्थान से सदस्य थे।

बहरहाल, पुरानी दिल्ली से बहुत सारे माधुर परिवारों ने निकलकर दरियागंज में भी अपने आशियाने बनाए। इधर के सी.डी माथुर और के.एल. माथुर 50 और 60 के दशकों में दिल्ली क्रिकेट के आतिशी बल्लेबाज हुआ करते थे। ये दोनों दरियागंज जिमखाना से खेलते थे। इन दोनों की वजह से ही हिंदू कॉलेज दिल्ली यूनिवर्सिटी की क्रिकेट में सेंट स्टीफंस कॉलेज के अभेद्य किले में सेंध लगा सका। इसी तरह दिल्ली किकेट को दशकों राम प्रकाश मेहरा उर्फ लाटू शाह के साथ एमबीएल माथुर चलाते रहे। गौर करें कि दिल्ली के बहुत से माथुर अपना सरनेम एंडले भी लगाते हैं। इसलिए आपको हर माथुर कुनबे में कुछ एंडले भी मिलेंगे। वैसे माथुर और एंडले दिल्ली की अदालतों में छाए हुए हैं।

नहीं चलना धारा के साथ

हाँ माना
कि बहती धारा
सबको भाती  है
वह ले चलती है
अपने भीतर
कई सुनहरे पल
अपनी यात्रा में
सबके साथ
उसकी मंजिल
भले ही
आसान
और पास होती जाती है
लेकिन खोती जाती है
अपनी पहचान
हर अगले पड़ाव पर।

मेरे अंदर की महत्त्वाकांक्षा
मुझे रोक देती है
बहने से
अपना मूल
अपना अस्तित्व
जल्द ही खोने से
शायद मेरा वर्तमान
या भविष्य
यहीं थाम देना चाहता है
मन के भीतर उमड़ती
अजीब सी हलचल को
वजह जो भी हो
मुझे पसंद है
मेरे  'मैं' का हाथ
इसलिए न चला  हूँ
न ही चलूँगा
धारा के साथ ।

-यशवन्त माथुर ©
24/04/2020

23 April 2020

हम नहीं समझ सकते.....

हम नहीं समझ सकते
उन भारी आँखों के पीछे की दास्तां
जो कुलबुलाती आंतों की आपस में रगड़
और तीखे पेट दर्द को ढोते हुए
हर पल इस इंतजार में हैं
कि यह दौर बीते और पूरी हो
बिना अपराध मिली
काला-पानी की सजा।

हम नहीं समझ सकते
उखड़ती साँसों को देखते
गवाहों के भीतर की तड़प
और कुछ न कर पाने की कसक
क्योंकि हमें आदत है
अपनी चारदीवारी में सिमटे रहकर
उपदेश देने और अंतर्जाल के हर कोने पर
अपनी विकृतियों के
बेपरवाह प्रदर्शन की।

-यशवन्त माथुर ©
23/04/2020

22 April 2020

अच्छा है कि ......

अच्छा है कि
उनको मुझसे नफरत है
अच्छा है कि
उनको जीत की गफलत है
मुझे कोई गम नहीं
हार खुद की मानने में
ये तो कल बताएगा कि
किसकी कौन सी फितरत है।

-यशवन्त माथुर ©
22/04/2020 

21 April 2020

कुछ लोग-49

अच्छे-बुरे
कई तरह के लोग
बात-बेबात
बताने लगते हैं
समझाने लगते हैं-
ये लिखो
वो न लिखो
ऐसे लिखो
वैसे न लिखो
ये चित्र या ये पंक्ति
साझा करो
या न करो
लेकिन खुद
अपने चेहरे की
कुटिल मुस्कुराहट के
पीछे रखते हैं
अपना वो सच
जो
कहलवाना चाहते हैं मुझसे
लेकिन नाकाम रहते हैं
क्योंकि
यह जो कुछ है
मेरा है
यह मेरी अभिव्यक्ति है
जो खराब और अच्छी होती है
लेकिन करीब होती है
मेरे दिल और दिमाग के
इसलिए
अब पाता हूँ
खुद को उस मुकाम पर
जब बे लगाम
कह सकता हूँ
ढाल सकता हूँ
अपने शब्दों को
अपने मन के
इस धरातल पर।

-यशवन्त माथुर ©
21/04/2020

20 April 2020

चिंगारी क्यूँ सुलगती है ?

इंसानों की नहीं जाहिलों की यह बस्ती लगती है।
बनी जो नफ़रतों की वह इमारत यहाँ बसती है।

कहीं पूजा--इबादत या अरदास और प्रार्थना में।
बात एक ही सबकी है अमन की हर कामना में।

फिर चाहो तो देख लो खूँ तो हरेक का एक ही है।
फर्क तो जिस्मों का है नस्लों का सिर्फ भेद ही है।

मन के जंगलों में क्यूँ अब भी यह आग दहकती है?
बड़े आलिम-फ़ाज़िल* हैं तो चिंगारी क्यूँ सुलगती है?

अरे! मिल जाओ गले कि गिले तो फिर होते रहेंगे।
गर अब भी न हुए एक तो फिर सब रोते ही रहेंगे।

-यशवन्त माथुर ©
19/04/2020

*आलिम-फ़ाज़िल=पढे-लिखे 

19 April 2020

कुछ भी तो नहीं .....

ये धूल भरे गुबार
कुछ भी तो नहीं
उस धुंध के आगे
जिसके  पार
हम जाना ही नहीं चाहते
हमने थाम रखा है खुद को
बंधनों में जकड़ रखा है
अपनी ही बनाई रूढ़ियों के
चारों के तरफ
घूमते रहकर
सिकुड़ती जाती
स्वार्थी होती जाती
हमारी सोच का अंत
सिर्फ उसी देहरी पर है
जिसके पार
एकांतवास में लीन हैं
धारा के विपरीत
चलने वाले लोग।

-यशवन्त माथुर ©
19/04/2020

18 April 2020

कोरोना से कांप रहे शब्दकोश--साभार नवभारत टाइम्स

कोरोना से कांप रहे शब्दकोश
बालेन्दु दाधीच

दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित शब्दकोशों को अपनी शब्दावली में विशेष अपडेट के लिए बाध्य होना पड़ा है। वजह है- कोरोना वायरस से पैदा हुआ मौजूदा संकट। महामारी ने बहुत सारे नए शब्द पैदा किए हैं। ऐसे ही शब्द जब करीब-करीब हर इंसान के दैनिक जीवन में जगह बना लें तो उन तक पहुंचना शब्दकोशों की पहली जिम्मेदारी बन जाती है। नतीजतन मरियम वेब्स्टर शब्दकोश ने अपने इतिहास का सबसे तेज अपडेट किया है जबकि ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने भी तिमाही अपडेट का इंतजार किए बिना कोरोना वायरस से जुड़े 14 नए शब्द जोड़े हैं।

दिलचस्प यह है कि दोनों के बीच बहुत कम शब्द साझा हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि हिंदी शब्दकोश निर्माता भी जल्दी ही इन हालात की सुध लेंगे। मरियम वेब्स्टर शब्दकोश में शब्दों को तेजी से शामिल किए जाने का यह दूसरा मामला है। पिछली बार ऐसा 1984 में हुआ था जब एड्स की बीमारी ने दुनिया को भयभीत कर दिया था। हालांकि किसी नए शब्द को इस डिक्शनरी में शामिल होने के लिए एक कड़े मापदंड से गुजरना पड़ता है। वह मापदंड है- उस शब्द का करीब एक दशक तक चलन में रहना। लेकिन जब एड्स की महामारी आई तो पूरी दुनिया में उसका बहुत ज्यादा खौफ था और इस सूचना को विश्व स्तर पर फैलाना भी बहुत ज्यादा जरूरी था।

तब पहली बार एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए इस शब्दकोश में एड्स शब्द जोड़ा गया। एड्स यानी एक्वायर्ड इम्यूनो डेफीसियंसी सिंड्रोम। तब तक इस लफ्ज को इस्तेमाल होते हुए दो साल बीत चुके थे। बहरहाल, अब मरियम वेब्स्टर डिक्शनरी ने अपना स्पेशल अपडेट जारी किया है जिसमें कोरोना वायरस की महामारी से जुड़े हुए करीब एक दर्जन शब्द शामिल किए गए हैं। ये शब्द महज 34 दिन के भीतर यहां आ पहुंचे हैं तो जाहिर है कि इनके पीछे छिपी अवधारणाओं की अहमियत को इस शब्दकोश ने मान्यता दी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 11 फरवरी को जिनेवा में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऐसे कुछ शब्दों का जिक्र किया था। इसके अलावा पहले से मौजूद कुछ शब्दों को भी नए संदर्भों और अर्थों के साथ अपडेट किया गया।


नई एन्ट्रीज हैं- कोरोनावायरस डिजीज 2019, कोविड-19, कम्यूनिटी स्प्रेड (सामुदायिक प्रसार), कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग (संपर्क खोज), सोशल डिस्टैंसिंग (सामाजिक अंतराल), सुपर स्प्रैडर (महा-प्रसारक), इंडेक्स केस (प्रथम प्रकरण), इंडेक्स पेशेंट (प्रथम रोगी), पेशेंट जीरो (मूल रोगी) और सेल्फ क्वैरंटीन (निजेकांतवास)। ऑक्सफोर्ड अंग्रेजी शब्दकोश ने मरियम वेब्स्टर के अपनाए शब्दों में से सिर्फ तीन चुने हैं- कोविड 19, सोशल डिस्टैंसिंग और सेल्फ-क्वैरंटीन। बाकी 11 शब्द ये हैं- एल्बो बंप (कोहनी उभार), टु फ्लैटन द कर्व (प्रसार समतलन), इन्फोडेमिक (सूचना-महामारी), पीपीई (निजी सुरक्षा उपकरण), आर0 या आरनॉट (किसी एक संक्रमित से संक्रमण पाने वाले लोगों की औसत संख्या), सेल्फ-आइसोलेट (स्व-पृथकवास या स्वेकांत), शेल्टर इन प्लेस (अपने स्थान में सीमित), सोशल आइसोलेशन (सामाजिक अलगाव) और डब्लूएफएच (वर्क फ्रॉम होम यानी घर से काम)।

अभी कुछ शब्द इन डिक्शनरियों को प्रभावित नहीं कर सके हैं। शायद अगले किसी अपडेट में इनका भी नंबर लगे। ये शब्द हैं- कोवीडियट (कोरोअहमक), कोबीडियंट (कोज्ञापालक), लॉकडाउन (घरबंदी, तालाबंदी, गृहसीमितता या सर्वत्रशून्यता), पैंडेमिक (वैश्विक महामारी), हर्ड इम्यूनिटी (सामूहिक रोग-प्रतिरोधकता), कोरोनियल्स (कोरोपीढ़ी) आदि-आदि। दावेदार शब्द और भी हैं। मिसाल के तौर पर इस पर गौर फरमाइए- पेशेन्ट जीरो (मूल रोगी या शून्यरोगी) जूनोटिक (जंतु-प्रसारित) रोगों का सुपर-स्प्रैडर (महाप्रसारक) बन जाएगा, अगर वह सैनिटाइजेशन (शुद्धिकरण) में नहीं रहेगा और फेस मास्क (मुखपट्टी) का इस्तेमाल नहीं करेगा। ऐसे रोगी अमूमन वेंटिलेटर (सांसयंत्र या श्वसनयंत्र) तक अपनी पहुंच चाहते हैं। कोरो उपसर्ग का प्रयोग करके बने शब्द बड़े अनूठे हैं और अलग पहचान बनाते जा रहे हैं, जैसे- कोवीडियट और कोबीडियंट।

एक मिसाल देखिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से आग्रह किया कि वह कोरोना से लड़ रहे लोगों के प्रति कृतज्ञता जताने के लिए ताली-थाली, शंख वगैरह बजाएं लेकिन बहुत से कोरोअहमक (कोवीडियट) थालियां, शंख, ढोलक और मजीरे आदि लेकर भारी भीड़ के रूप में गलियों में निकल गए। उधर कोज्ञापालकों (कोबीडियंट) की भी कमी नहीं थी। जैसे कचरे से कागज, पॉलीथीन आदि इकट्ठा करने वाला गरीब इंसान, जो ठीक पांच बजे अकेला खड़ा होकर ताली बजा रहा था।

महामारी ने कुछ पुराने शब्दों और पहले से मौजूद शब्दों को भी नई जिंदगी के साथ-साथ नए अर्थ दे दिए हैं। मिसाल के तौर पर लॉकडाउन का इस्तेमाल हड़तालों आदि के दौरान ज्यादा सुनने में आता था। लेकिन आज वह सामाजिक संदर्भ में इस्तेमाल हो रहा है। सोशल डिस्टैंसिंग अब तक उन लोगों के संदर्भ में इस्तेमाल होता था जो समाज से अलग-थलग बने रहते हैं। यह उन लोगों के संदर्भ में भी इस्तेमाल होता था जिन्हें किसी कारण से समाज से अलग-थलग कर दिया गया है। हमारे यहाँ पर बुरी ही सही लेकिन गांव-बाहर, जात-बाहर या हुक्का पानी बंद करने जैसी अवधारणाएं प्रचलित हैं जो इसकी पारंपरिक परिभाषा के दायरे में आती थीं। लेकिन अब सोशल डिस्टैंसिंग एक सकारात्मक संदर्भ में सामने आया है। लोग खुद को सुरक्षित रखने के लिए एक-दूसरे से उचित दूरी बनाकर चल रहे हैं।


क्वारंटाइन शब्द भारतीयों के लिए कुछ हद तक अनसुना सा है। हमारे यहां यह अवधारणा तो प्रचलित रही है (कुष्ठ, चेचक, तपेदिक जैसे रोगों तथा मृत्यु-उपरांत एकांत जैसे संदर्भों में) लेकिन ऐसे शब्द मौजूदा प्रचुरता में शायद ही कभी इस्तेमाल हुए हों। इसी से जुड़ा शब्द है- आइसोलेशन (पृथकवास, अलगाव या पृथक्करण) जो पहले नकारात्मक संदर्भ में इस्तेमाल होता था। लेकिन अभी तो ऐसा लगता है कि कोई आइसोलेशन में है तो समाज पर कितना बड़ा उपकार कर रहा है।

कब मिटेगी भूख ?

कब मिलेगा उनको
उनके हिस्से का सुख?
कब मिटेगी उनकी
दो जून की भूख ?

कब खोले जाएंगे बंधन
उनके पैरों के?
कब होंगे वो मुक्त
हर कदम पे पहरों से?

लौटेगी कब मुस्कुराहट
उनके बच्चों के चेहरे पर?
नन्हे कदम कब थिरकेंगे
अपने आँगन और देहरी पर?

कब आएगी हथेली पर
लौट कर वही दिहाड़ी?
कब लौटेगी पटरी पर
जीवन की रेल गाड़ी ?

कब तक तड़प-तड़प कर
यूं देह होती रहेगी मुक्त ?
कब मिटेगी उनकी
दो जून की भूख ?

-यशवन्त माथुर ©
18/04/20

17 April 2020

Pandemic not as deadly as initially projected: PIO doc (Curtsy:The Times of India)

Pandemic not as deadly as initially projected: PIO doc
Chidanand.Rajghatta@timesgroup.com
Washington:
An Indian-American Stanford University professor of medicine has said that the actual death rate from the coronavirus pandemic is “likely orders of magnitude lower than the initial estimates”, the observation coming amid widespread resentment in right-wing circles that matter was exaggerated by those intent on damaging the US economy and undermining the Trump presidency.

While not touching on the political or ideological aspects of the issue, Dr Jay Bhattacharya, who is also the director of the Program on Medical Outcomes at Stanford University, told Fox News on Tuesday that the coronavirus, albeit dangerous because of the speed of transmission and lack of vaccine, isn’t as deadly as was initially projected.

Curtsy:The Times of India,New Delhi-16/04/20,Page-09

“Per case, I don’t think it’s as deadly as people thought,” Bhattacharya told Fox News host Tucker Carlson. “The WHO put an estimate out that was, I think, initially 3.4%. It’s very unlikely it is anywhere near that. It’s much likely, much closer to the death rate that you see from the flu per case.”

Bhattacharya and his colleague Dr Eran Bendavid, who is also an associate professor of medicine at Stanford and a core faculty member in the Center for Health Policy, maintained in a Wall Street Journal op-ed that initial morality estimates from the coronavirus were “deeply flawed and the way to find the true death rate would be to look at fatalities as a percentage of people who have been infected with the new coronavirus — not just those who are tested and become confirmed cases. If the number of people infected with the virus is much larger than the number of confirmed cases, projections of fatalities would drop substantially.

The WHO, too, has acknowledged more recently that Covid-19 death rate is between 3% and 4% of reported cases, and if the death rate as a percentage of infections is considered (rather than just reported or confirmed cases), it would be lower.

Link of Full report on www.toi.in



.

लॉकडाउन में.....

काश!
काले अध्यायों वाला
यह समय बीत जाए
तो देख लुंगा मैं भी
कुछ सपने
जो कैद हैं
कहीं किसी अंधेरे में
लॉकडाउन में।

-यशवन्त माथुर ©
17/04/2020

16 April 2020

सत्य से बहुत दूर ........

चलते-चलते
हम आ पहुंचे हैं
सत्य से बहुत दूर
अपनी कल्पनाओं में
भटकते हुए
यहाँ
हमें लगता है
कि हाँ
यही वो जगह है
यही वो मंजिल है
जिसे पाने के लिए
शुरू हुई थी
हमारी यात्रा।

यह सिर्फ भ्रम है
यह वास्तविकता नहीं है
क्योंकि यहाँ
दिखते हैं
सिर्फ फूल ही फूल
और कांटा एक भी नहीं
क्योंकि यहाँ
ठंडी हवाएं हैं
और अंगारा एक भी नहीं
क्योंकि यहाँ
सिर्फ कृत्रिम मुस्कुराहटें हैं
उनके पीछे छुपे आँसू नहीं।

तो आखिर क्यूँ ?
क्यूँ हमें पसंद है
यही छद्म आवरण
क्यूँ हम भागते आ रहे हैं
क्यूँ हमें नहीं हो रहा एहसास
कि जो हो रहा है
गलत है
शायद इसलिए
कि सोच की देहरी पर बनी
पूर्वाग्रह की लक्ष्मण रेखा
शिथिल कर देती है
हमारा साहस
और क्योंकि
वर्तमान में जीते हुए
हम भूल चुके हैं
अपना इतिहास।

-यशवन्त माथुर©
16/04/2020

15 April 2020

हम सब सो रहे हैं....

नहीं
कोई मतलब नहीं
जंजीरों में कैद
बेहिसाब भूख से।

नहीं
कोई मतलब नहीं
अपनों से मिलने की
बेहिसाब तड़प से। 

नहीं
कोई मतलब नहीं
गरीबी से
बेकारी से
लाचारी से
बस मतलब है
तो सिर्फ
अपने आस-पास की
मृग मरीचिका से
जिसे  वास्तविकता मान कर 
तबाही के इंतजार में
चादर तान
सपनों में खो रहे हैं
क्योंकि
हम सब सो रहे हैं।

-यशवन्त माथुर ©
15/04/2020

14 April 2020

जरूरी नहीं ....

जरूरी नहीं
कि हम जो कहें
उसमें कोई अर्थ हो
या निहित हो
कोई संदेश।

हम अक्सर
अपने उलझे
शब्दों के साथ
खुद भी उलझ जाते हैं
समझ नहीं पाते हैं
आधार
उन शब्दों का
जो अचानक ही
उमड़ पड़ते हैं
कागज और
कलम की जुगलबंदी से।

इसलिए बेहतर है
कि हम न ही समझें
बस कहते चलें
मन की बातें
क्योंकि कुछ बातें
सबके लिए नहीं
खुद के लिए ही होती हैं।

-यशवन्त माथुर ©
14/04/20

13 April 2020

क्या देख पा रहा हूं?

क्या देख पा रहा हूं भविष्य को?
या बस घूम रहा हूं
बेतरतीब ख्यालों की
अजीब सी दुनिया में
जहां शब्द महसूस तो होते हैं
लेकिन सुप्त रहते हैं
अचेतन मन के
किसी गुमनाम कोने में।
.
-यशवन्त माथुर ©
13/04/20

यह दौर भी बीत जाएगा

अंधेरी रात के बाद फिर,
एक नया सवेरा आएगा।
जागेगा जन-जन का मन,
और विजय के गीत गाएगा।

है आज का यह क्षणिक समय,
जो लंबा-लंबा सा लगता है।
बीत जाता था जो तेजी से,
अब तन्हा-तन्हा सा कटता है।

सुनसान-वीरान राहों पर,
साफ हवा की सुर-लहरी से।
ताल मिलाते पक्षी कहते,
'संभल जाओ ' इंसानों से।

है जो अब तक किया - धरा
वो कुछ तो रंग दिखलाएगा
प्रकृति का दण्ड भुगत कर
यह दौर भी बीत जाएगा।

-यशवन्त माथुर ©
12/04/2020


11 April 2020

कुछ लोग -48

खुद को ऊंचा
और सामने वाले को
नीचा समझने वाले कुछ लोग
अपने आस-पास के चाटुकारों से
घिरे रह कर
खुद को
कुछ भी समझ लेते हैं
कुछ ऐसा -
जो वो होते नहीं ।
उनको लगता है
कि यह जो चुप है
नतमस्तक है
उनके आगे
इसलिए किया जा सकता है
उसको मानसिक प्रताड़ित
दिया जा सकता है तनाव
क्रूर और बर्बर बातों से
लेकिन शायद
ऐसे लोग भूल जाते हैं
कि चुप या मौन रहने वाला इंसान
जब खोलने लगता है
अपनी जुबान
तो यह संकेत होता है
कि तूफान
अब दूर नहीं।

-यशवन्त माथुर ©
11/04/2020

09 April 2020

यह तो होना ही था .....

ये तो तय था पहले से ही
कि जो हुआ
या जो हो रहा है
होना ही था
अपने कर्मों का फल
इस तरह भोगना ही था।

तो आखिर क्यूँ
मचाया हुआ है
हाहाकार
क्यूँ कर रहे हैं
चीख-पुकार ?

उस समय
जब अवसर था
कि हम बदल सकते
अपने भावी वर्तमान को
हमारी तर्जनी उंगली
पूर्वाग्रह के रक्त प्रवाह के साथ
टिकती रही
उस धारा के तल पर
जिसकी कठोर सतह के भीतर का दल-दल
हमें आज भी
कर रहा है मजबूर
और भी धँसते जाने को
सहते जाने को
सुबह और शाम की भूख।

मगर अब
एक यक्ष प्रश्न यह भी है
कि क्या हमें पछतावा है ?
क्या हम कर रहे हैं
आत्म मंथन ?
क्या हम कर रहे हैं प्रयत्न ?
कि बाहर आकर देख सकें
वही चलती-फिरती
उजली दुनिया.. ..

शायद नहीं
शायद इसलिए नहीं
क्योंकि हमें स्वीकार है
समय की अंधी सत्ता
और उसकी दासता
लेकिन अस्वीकार है
असत्य की रूढ़ियों को तोड़कर
तथाकथित
'प्रगतिशील' कहलाना।

-यशवन्त माथुर ©
09/04/2020

06 April 2020

कुछ तो लोग कहेंगे ही......

कुछ तो
लोग तो कहेंगे ही
जो उनको करना होगा
करेंगे ही
यह तो अपने ऊपर है
कि कैसे समझना है उनको
उनकी बातों को
बिना उनके आगे
नतमस्तक हुए
सुनते चलना है
अपने दिल की आवाज
और बहते रहना है
अपने विचारों की धारा के संग
भले ही
वह विपरीत हो
समकालीन दौर के
लेकिन
विध्वंस के हजारों दौरों के बाद भी
डिगना नहीं
बस अड़े रहना है
खड़े रहना है
इसी तरह
इसी राह पर।

-यशवन्त माथुर ©
06/04/2020

05 April 2020

क्या होने वाला है.....

सब कुछ काला ही बचा
सफेद नहीं दिखता यहाँ
न जाने कहाँ आ  पहुंचे हैं
न जाने अब जाना है कहाँ। 

पा लिया है कितना कुछ
और क्या कुछ खोने वाला है
अब कोई ठौर नहीं इस दौर का
न जाने क्या होने वाला है।

-यशवन्त माथुर ©
05/04/2020

04 April 2020

क्योंकि वो हम जैसे नहीं.....

हमें नहीं परवाह 
उन साथियों की 
उन अपनों की 
जिनके सपने 
भूख-लाचारी और 
बेकारी से 
हो रहे हैं चूर-चूर, 
क्योंकि 
यह उनकी समस्या है 
या 
उनकी किस्मत है 
कि उनके हालात 
हमारे जैसे 
विलासितापूर्ण नहीं 
कि वो हम जैसे 'खास' नहीं ,
वो सिर्फ 'आम' हैं 
जो बने हैं 
सिर्फ हमारी चाकरी के लिए 
इंसान के रूप में 
उनका सिर्फ 'इंसान' 
होना ही काफी नहीं 
क्योंकि वो जो हैं , वो हैं 
लेकिन हम जैसे नहीं। 

-यशवन्त माथुर ©
04/04/2020

03 April 2020

सिर्फ तमाशाई हैं हम

कहीं हो खुशी
या कहीं हो गम
सिर्फ तमाशाई हैं हम ।

हमने खड़े किये हैं
मुसीबतों के शहर
जहां पल-पल तोड़ता है
ये समय अपना दम।

सिर्फ तमाशाई हैं हम।

-यशवन्त माथुर ©
03/04/2020

02 April 2020

सब यूं ही चलता रहेगा......

सब यूं ही चलता रहेगा
समय के साथ
सब यूं ही बदलता रहेगा।
बदलाव की यह सोच
यह महत्त्वाकांक्षा
सिर्फ हमारा भ्रम है
क्योंकि हम
जा चुके हैं
अपने समय से
कई सदियों पीछे। 
हमारा मन
हमारी सोच
हमारा स्तर
सिकुड़ चुका है
और इसीलिए
हमारी आँखों को
सिर्फ वही दिखता है
जो हम देखना चाहते हैं
सत्य के चेहरे पर लगे
कई परतों वाले
द्विआयामी चश्मे से।

-यशवन्त माथुर©
02/04/2020 

01 April 2020

वक्त के कतलखाने में -18

एक अजीब सी बेबसी
जब दिखती है
कुछ लोगों के चेहरों पर
तो ऐसा लगता है
जैसे
सब कुछ होकर भी
कुछ नहीं होने का एहसास
भीतर से खोखला करता हुआ
काँटों भरे रास्तों पर चलता हुआ
अपने तीखेपन से
याद दिलाता है
जीवन के प्रेक्षागृह में
लगा हुआ
वही पुराना चलचित्र
जिसके घिसे हुए दृश्य
ले जाते हैं अपने साथ
धूल भरे उन्हीं गलियारों में
जो कभी
हुआ करते थे आबाद
वक्त के कतलखाने में।

-यशवन्त माथुर ©
01/04/2020