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23 April 2020

हम नहीं समझ सकते.....

हम नहीं समझ सकते
उन भारी आँखों के पीछे की दास्तां
जो कुलबुलाती आंतों की आपस में रगड़
और तीखे पेट दर्द को ढोते हुए
हर पल इस इंतजार में हैं
कि यह दौर बीते और पूरी हो
बिना अपराध मिली
काला-पानी की सजा।

हम नहीं समझ सकते
उखड़ती साँसों को देखते
गवाहों के भीतर की तड़प
और कुछ न कर पाने की कसक
क्योंकि हमें आदत है
अपनी चारदीवारी में सिमटे रहकर
उपदेश देने और अंतर्जाल के हर कोने पर
अपनी विकृतियों के
बेपरवाह प्रदर्शन की।

-यशवन्त माथुर ©
23/04/2020

1 comment:

Onkar said...

बहुत सुन्दर

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