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15 April 2020

हम सब सो रहे हैं....

नहीं
कोई मतलब नहीं
जंजीरों में कैद
बेहिसाब भूख से।

नहीं
कोई मतलब नहीं
अपनों से मिलने की
बेहिसाब तड़प से। 

नहीं
कोई मतलब नहीं
गरीबी से
बेकारी से
लाचारी से
बस मतलब है
तो सिर्फ
अपने आस-पास की
मृग मरीचिका से
जिसे  वास्तविकता मान कर 
तबाही के इंतजार में
चादर तान
सपनों में खो रहे हैं
क्योंकि
हम सब सो रहे हैं।

-यशवन्त माथुर ©
15/04/2020

1 comment:

Anita said...

कटु यथार्थ

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