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08 May 2020

हम बात करेंगे

मिलें न मिलें मंज़िलें
हमराह चलेंगे।
मिलेगा मौका जब भी
हम बात करेंगे।

चौराहे हैं यहाँ कई
कभी तो पार करेंगे।
थक कर कहीं बैठे तो
हम बात करेंगे।

कल को भूल कर आज
ही इतिहास रचेंगे।
जब कुछ न लिख सकेंगे
तो हम बात करेंगे।

-यशवन्त माथुर ©
08/05/2020

3 comments:

Anita said...

संवाद चलता रहे
कारवां बढ़ता रहे
मंजिलें दूर नहीं
जज्बा यही खिलता रहे

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर और प्रेरक रचना

अनीता सैनी said...

वाह ! बेहतरीन सृजन आदरणीय सर

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