प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

वेब सर्च (Enter your keywords to search on web)

17 May 2020

वक्त के कत्लखाने में -19

सच से बेपरवाह 
सब चलते चले जा रहे हैं 
ख्यालों में उड़ते जा रहे हैं 
अपनी नींदों से उठकर 
कहीं भागते जा रहे हैं 
लेकिन यह एहसास नहीं है 
कि कहाँ जा रहे हैं।  

मजबूरियों के रास्तों पर 
फासले बढ़ते जा रहे हैं 
और हम में से कुछ हैं 
कि बस हँसते जा रहे हैं 
बेरहमी से अपने ही जाल में 
सब फँसते जा रहे हैं । 

ये वक्त का कत्लखाना है 
जान लो! 
यहाँ कुछ बीता नहीं होता 
दीवारों पर उकेरा हुआ 
कुछ मिटा हुआ नहीं होता 
यहाँ याद रखा जाता है 
हर उस पल का हिसाब 
जिस पल से सब सांसें 
लेते जा रहे हैं। 

-यशवन्त माथुर ©
17/05/2020

यहाँ क्लिक करके इस शृंखला की अन्य पोस्ट्स  देखी जा सकती हैं। 

1 comment:

  1. सशक्त लेखन, सच है यहां श्वास श्वास का हिसाब देना पड़ता है, हर कर्ज चुकाना होता है चाहे वह हँसी का कर्ज ही क्यों न हो

    ReplyDelete

कृपया किसी प्रकार का विज्ञापन कमेन्ट मे न दें।
कमेन्ट मोडरेशन सक्षम है। अतः आपकी टिप्पणी यहाँ दिखने मे थोड़ा समय लग सकता है।

Please do not advertise in comment box.
Comment Moderation is active.so it may take some time in appearing your comment here.