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25 July 2020

दोहरापन

एक दिन एक पुरानी डायरी के पन्ने पलटते हुए 18 वर्ष पहले लिखी गई इन पंक्तियों पर निगाह रुक गई।
संभवतः  कक्षा 12 की परीक्षा का परिणाम तब तक नहीं आया था और उस समय खाली समय बिताने का अपने पास यही एक माध्यम था।

दहेज प्रथा की  विषयवस्तु पर आधारित ये पंक्तियाँ आगरा की एक वरिष्ठ नेत्री के बारे में पापा द्वारा बताई गई बातों और उस पर मेरी कल्पना के नमक-मिर्च का परिणाम थीं। इनमें कुछ नाम-मात्र के सम्पादन के साथ आज डिजिटाइज़ कर दे रहा हूँ।
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सजा था भव्य मंच, इत्र सुगंध थी चहुं दिशि छाई हुई।
नारी कल्याण समिति की अध्यक्षा थीं,सभा में आई हुईं।
गा रही थीं स्वागत गान उनका, संचालिका कोकिल कंठ से।
और निकल रहे थे उदगार दहेज विरोधी, समवेत स्वर से।
सुन स्तुति अपनी, अध्यक्षा थीं बड़ी प्रफुल्लित हुईं।
फिर आग्रह पर, बन ठन कर,जा माइक पर खड़ी हुईं।
निकृष्ट पुरुष समाज का,निंदा गान उन्होंने कर दिया।
इस तरह दहेज विरोध में,लंबा व्याख्यान उन्होंने दे दिया।
सभा थी चल रही, किन्तु बीच में, मोबाइल की घंटी बजी।
सुनकर संदेश, तुरंत ही वह अपने घर को निकल पड़ीं।
बात पुत्र के विवाह की, थी उनके घर पर चल रही।
कार, टीवी, फ्रिज, स्कूटर की मांग पर वह अड़ी रहीं।
किन्तु तभी किसी ने, उनका टीवी चालू कर दिया।
होने वाली पुत्रवधू ने, उनका भाषण देख लिया।
थी उठ खड़ी वह तुरंत ही, माता-पिता चकित हुए।
बोल उठी वह कन्या अपना संकोच त्यागते हुए।
मैं नहीं करूंगी विवाह, इस दो रंगे परिवार में।
दहेज विरोधी सास भी, है फँसी इसी व्यापार में।
धीरे-धीरे बात यह, जब औरों को मालूम हुई।
शहर की जनता को भी जब उनकी असलियत मालूम हुई।
कालिख पोत के चेहरे पर, उन्हें नगर में घुमाया गया।
इसके बाद किसी सभा में, उनको नहीं पाया गया।
कैसे करें उपचार दहेज का, इसे विचारें हम और आप।
लेना-देना ऐसे दान का, है समाज पर यह अभिशाप।

-यशवन्त माथुर ©

04 July 2020

बेमानी ही है

कुछ सवाल
अब तक
सिर्फ सवाल ही बने हुए हैं
और मैं
नहीं समझता देना
जवाब
हर उस बात का
जिसका होना
या न होना
बेमानी ही है।

-यशवन्त माथुर ©
04072020 

02 July 2020

मौसमों की तरह गुजरता रहा..

वक़्त आकर गुजरता रहा
मैं टकटकी लगाए बस देखता रहा
कोई छू कर गुज़रा था अभी - अभी जैसे
मैं सोया था, दिन में तारे गिनता रहा।

और जब होश आया -
तो कितनी ही शामें गुज़र चुकी थीं
शमा कितनी ही जली थीं,
और बुझ चुकी थीं।

ये दौर तन्हाइयों का है,
तुम क्या समझोगे साहिब!

एक नश्तर चुभता रहा
और मैं जीता रहा
वक़्त आ-आकर
मौसमों की तरह गुजरता रहा।

-यशवन्त माथुर ©
02072020

01 July 2020

जो हो रहा है, होने दो

अंधेरे हैं, अंधेरे ही रहने दो। मुखौटों के पीछे, मुखौटे ही रहने दो।
डर लगता है, सच के बाहर आने से। जो दबा है भीतर, भीतर ही रहने दो।
हो गया उजास, तो नाकाबिल हो जाऊंगा मैं। मुकाबिल होके जमाने का, खो जाऊंगा मैं।
हैं हरे अब भी ज़ख्म, उन बीत चुकी बातों के। फिर सींच दिया, तो सूख कर बिखर जाऊंगा मैं।
इसलिए अच्छा है कि जो हो रहा है, होने दो।
वक़्त गर्द में कहीं खो रहा है, खोने दो।
-यशवन्त माथुर ©
01072020

Shravasti Trip Photographs (30/11/2019)-Part-II

































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