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27 August 2020

बहुत हैं....

प्रश्न भी बहुत हैं
उत्तर भी बहुत हैं
फिर भी
उलझनों की राह पर
वक़्त चलता जा रहा है
जाने क्या होता जा रहा है?

सोचा तो नहीं था
कि ऐसा भी होगा
जिन्हें अपना समझता रहा
उनकी नज़रों में
धोखा ही होगा।

कल्पना के हर उजाले में
अब अंधेरे बहुत हैं
कोरे स्याह इन पन्नों को
कुरेदने वाले बहुत हैं।

-यशवन्त माथुर ©
27082020 

7 comments:

  1. सोचा तो नहीं था
    कि ऐसा भी होगा
    जिन्हें अपना समझता रहा
    उनकी नज़रों में
    धोखा ही होगा।
    ऐसे कहाँ सोचते हैं जब धोखा होता है तब मुँह की खाते हैं
    बहि सुन्दर सृजन।

    ReplyDelete
  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार (२९-०८-२०२०) को 'कैक्टस जैसी होती हैं औरतें' (चर्चा अंक-३८०८) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

    ReplyDelete
  3. फिर भी आशा का दामन थाम कर रखना है, कोई करे न करे अपने आप पर व उस रब पर भरोसा रखना है

    ReplyDelete
  4. बहुत सुंदर

    ReplyDelete

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