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17 September 2020

चाहिए

जो बैठे हैं बेकार उनको रोज़गार चाहिए।
जो सुने सबकी पुकार ऐसी सरकार चाहिए।

खुशहाल मजदूर-किसान-नौ जवान चाहिए।
दो जून की रोटी, कपड़ा और मकान चाहिए।

संविधान की प्रस्तावना का स्वीकार चाहिए।
शोषण मुक्त समाज का स्वप्न साकार चाहिए।

जागृति के गीतों का अब आह्वान चाहिए।  
प्रगति की राह पर नया अभियान चाहिए।

-यशवन्त माथुर ©
17092020
#बेरोजगार दिवस

10 September 2020

True Caller को मिलने वाली है Google से चुनौती

True Caller एक ऐसी एप्लीकेशन है जो लगभग सभी के एंड्रॉएड फोन में पाई जाती है। एक ऐसे समय में जब हर व्यक्ति व्यस्त है, सभी का प्रयास यथा संभव अनचाहे फोन कॉल्स से बचना होता है और ऐसे में True Caller जैसी एप्स जरूरी भी हो जाती हैं। 

तकनीकी विशेषज्ञ True Caller को डाटा चुराने वाली एप भी बताते रहे हैं और तमाम नकारात्मकता के बाद भी यह एप अपनी खसियतों की वजह से सबसे ज्यादा उपयोग  की जाने वाली एप बनी हुई है।   

गत मंगलवार (08 सितंबर) को गूगल ने सभी एंड्रॉएड आधारित फोन्स पर Verified Calls के एक नए  फीचर की घोषणा की है। अपने शुरुआती चरण में यह फीचर भारत, ब्राजील, मैक्सिको, स्पेन और अमेरिका में उपलब्ध कराया जाएगा और बाद में दुनिया के सभी एंड्रॉएड आधारित फोन्स में इसका अपडेट दिया जाएगा।
   

इससे पहले दिसंबर 2019 में Verified SMS नाम का फीचर गूगल द्वारा उपलब्ध कराया गया था और इसके सफल परिणामों और लोकप्रियता के बाद अब गूगल ने ट्रू कॉलर को चुनौती देने का पूरा मन बना लिया है। 

Verified Calls नाम का यह नया फीचर फोन में पहले से ही मौजूद गूगल एप के ही एक हिस्से के रूप में कार्य करेगा, यानी इस फीचर के उपयोग हेतु किसी अन्य एप को इन्स्टॉल करने की आवश्यकता नहीं होगी। 

इस फीचर के जरिए कॉलर का नाम , उसका लोगो, और व्यापारिक पहचान की जानकारी स्क्रीन पर ही मिल जाएगी जिससे निश्चित तौर पर स्पैम और फ्रॉड कॉल्स से बचा जा सकेगा। 

गूगल के आधिकारिक ब्लॉग पर उपलब्ध इस फीचर के बारे में अधिक जानकारी यहाँ क्लिक करके प्राप्त कर सकते हैं। 


-यशवन्त माथुर- 

04 September 2020

निजीकरण : दूर के ढोल सुहावने --- राकेश श्रीवास्तव

आज कल निजीकरण एक विमर्श का विषय बना हुआ है। वर्तमान सरकार का सारा ध्यान येन केन प्रकारेण सरकारी संस्थानों का निजीकरण करके अप्रत्यक्ष रूप से आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था को समाप्त करने पर लगा हुआ है। रेलवे से लेकर बैंक तक सभी जगह या तो विलय की बात चल रही है या इन संस्थानों का  निजीकरण करने के प्रयास किये जा रहे हैं और आश्चर्य की बात तो यह है कि समाज के एक बड़े वर्ग द्वारा इन प्रयासों का खुलकर समर्थन किया जा रहा है। निजीकरण वास्तव में दूर के ढोल सुहावने लगने जैसा ही है। इसकी अव्यावहारिकता पर प्रकाश डालते हुए सेवनिवृत्त बैंकर श्री राकेश श्रीवास्तव जी ने एक फ़ेसबुक पोस्ट लिखी है जो साभार यहाँ प्रस्तुत है -

" निजीकरण के लाभ दूर से ही अच्छे लगते हैं।  पहले निजी बैंकों को ही ले।  ग्लोबल ट्रस्ट बैंक को बदहाल होने पर ओबीसी में मर्ज किया गया। यस बैंक की शिखा शर्मा ने नोट बंदी में क्या किया सबको पता है।  वीडियोकॉन और आईसीआईसीआई बैंक दोनों प्राइवेट हैं । चंदा कोचर मैडम के कारनामे सबके सामने हैं। उन पर मेहरबानी के लिए बीमार होने के बावजूद जेटली साहब का लिखा ब्लॉग शायद याद हो। यस बैंक की हालत भी किसी से छुपी नहीं है। एनबीएफसी को भी शामिल करेंगे तो यह बढ़ता ही जाएगा। 

रही बात निजीकरण के अच्छी होने की तो इसमें यह नही भूलना चाहिए कि अपने देश की कंपनियो की लाभ की ललक इतनी बढ़ जाती है कि वो कंपनी को ही खाने लगती है।  जेट एयरवेज का उदाहरण सामने है। एसबीआई को उसको बेल आउट करने के प्रयास के लिए सरकार के निर्देश पर पैसा देना पड़ा।  इसके अतिरिक्त तमाम निजी कंपनियों का पैसा आखिरकार बैंकों को राइट ऑफ करना पड़ता है। 

आपने स्कूल और अस्पताल की बात की है।  अब भी भारत की अधिकांश जनता सरकारी स्कूल और अस्पताल पर ही निर्भर है।  यदि यह न हो तो करोड़ों बच्चे बेसिक शिक्षा से भी वंचित रह जाएंगे।  इसी प्रकार इलाज के लिए अभी भी बहुसंख्यक आबादी या तो सरकारी अस्पतालों पर निर्भर है या फिर झोला छाप डॉक्टरों पर।  उनके पास भरपेट भोजन के पैसे तो है नहीं। प्राइवेट स्कूल व प्राइवेट डॉक्टर की फीस तो एक सपना है।  शिक्षा व चिकित्सा दोनो ही आजकल सबसे अच्छे धंधे हैं। 

इसमें कोई शक नहीं कि गैर सरकारी उपक्रमों मे हमारे भाई ही काम करते है। पर उनका भी किस तरह से शोषण हो रहा है।  ठेके पर रखे जाने वाले किसी भी कर्मचारी को देख लीजिए चाहे वो गार्ड, सफाई कर्मचारी, अस्पतालों में कार्यरत कर्मचारी, कंप्युटर ऑपरेटर, टेक्नीशियन हो उनकी तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा ठेकेदार की ही जेब में जाता है।" 

राकेश श्रीवास्तव
एक रिटायर्ड बैंकर 

02 September 2020

मन का एक कोना है और मैं हूँ

नहीं चाहता बताना
नहीं चाहता समझाना
कि इस दौर में
आखिर इतना उलझा हुआ
क्यूँ हूँ
बस मन का एक कोना है
और मैं हूँ

ये जो संगीत की लहरें
गुजर रही हैं
कानों से मन के भीतर
साथ हैं मेरे फिर भी तन्हा सा
क्यूँ हूँ
बस मन का एक कोना है
और मैं हूँ

यूं लिखते-लिखते
पढ़ते-पढ़ते
सब समझते-बूझते
आखिर ना-समझ इतना
बनता क्यूँ हूँ
बस मन का एक कोना है
और मैं हूँ

दिखते हैं सब अपने
लेकिन पराए ही हैं
बेमतलब के रिश्तों में
फँसता ही क्यूँ हूँ
बस मन का एक कोना है
और मैं हूँ

-यशवन्त माथुर ©
02092020