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14 October 2020

कुछ ऐसा भी होता है .....

समय के साथ 
चेहरे बदलते हैं
कभी-कभी 
बदलती हैं तकदीरें भी 
हाथों की लकीरें भी 
लेकिन कुछ 
ऐसा भी होता है 
जो अक्षुण्ण रहता है 
जिसके भीतर का शून्य 
शुरू से अंत तक
तमाम विरोधाभासों 
और बदलावों के बाद भी 
बिल्कुल निर्विकार 
और अचेतन होता है 
शायद उसी परिकल्पना की तरह 
जो रची गई होती है 
किसी साँचे में 
उसे ढालने से पहले। 

-यशवन्त माथुर ©
14102020 

5 comments:

Anita said...

भावपूर्ण रचना ..परिकल्पना भी शून्य नहीं रही, शून्य तो शायद उसके भी पूर्व है जब कोई कल्पना भी नहीं ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर रचना।

सुशील कुमार जोशी said...

सुन्दर

Onkar said...

बहुत सुन्दर

जितेन्द्र माथुर said...

बड़ी सारगर्भित बात कही है आपने यशवंत जी । हार्दिक अभिनंदन ।