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21 November 2020

क्या दुनिया से लोकतन्त्र खत्म होने जा रहा है? .. रति सक्सेना


भूतपूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने बहुत पहले ही लिख दिया था कि 'हम लोकतंत्र के भ्रमजाल में जी रहे हैं'। ऐसे में यदि देश और दुनिया के वर्तमान परिदृश्य को देखें तो लोकतंत्र के अस्तित्व पर प्रश्न उठना स्वाभाविक ही लगता है।  प्रख्यात लेखिका  रति सक्सेना जी ने अपनी फ़ेसबुक पोस्ट में इसी ज्वलंत सामयिक मुद्दे पर अपनी महत्त्वपूर्ण टिप्पणी दर्ज़  की है, जिसे साभार यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। 

दुनिया की हलचल अब हमारे पास ज्यादा आसानी से आ रही है, फिर भी काफी कुछ  जो  दिखाई देता है, वह अपने आसपास एक मिथक गढ़ लेता है। जब हम करीब जाते हैं , यहां वहां की भीतरी नस को पकड़ते हैं तब असलियत सामने आती है। लोकतन्त्र भी एक मिथक रहा, जिसके वाहक दो बड़े देश रहे, अमेरिका और भारत। अमेरिका में लोकतन्त्र की वजह भी लगभग वही रही जो भारत में थी, अमेरिकन क्रान्ति के बाद अमेरिका को एक जुट रखने के लिए यह जरूरी था कि यहां पर एक ऐसा तन्त्र यानी कि शासन हो, जो अमेरिकन कहलाने वाले नागरिकों को समान सुविधाएं देता हो, हालांकि इसके अन्तर्गत बहुत से लूप होल थे? कौन हैं अमेरिकन नागरिक, क्यों कि अमेरिका में पूरा यूरोप पहुंचा था, और मूल वासी तो वहां थे ही। अब फ्रान्स, स्पेन , ब्रिटेन के नागरिक कैसे साथ रहे़?

तो एक भाषा , एक नियम लागू हुआ, लेकिन प्रान्तों को लगभग स्वायत्तता दे दी गई। मूल वासियों को और दास कहलाने वर्ग को दबाने के लिए समाज और सरकार में अलग से तरीके थे।और इस एक भाषा नियम ने तो मूलवासियों को गुलाम सा बना दिया। जैसा की जाय हर्जारो ने अपने मेमोर में लिखा है कि मूल वासियों की अपनी भाषाएँ थीं, अंग्रेजी उन पर लाद दी गई, और उनके आचारों को अवैद्य मान लिया गया। जिससे उनके समाज के लोग एक झटके में ही गुलाम हो गए। अभी तो पीढ़ियां बीत रही हैं, लेकिन जाय हर्जारों के पूर्व की पीढ़ी के लिए अंग्रेजी मुश्किल भाषा थी, साथ ही उन पर लादा गया ईसाई धर्म भी उनके अपनी संस्कृति के बहुत खिलाफ था। लेकिन चर्चों की मदद से मूल वासियों के बच्चों को स्कूलों में डाला गया, जिससे एक खास कामगार वर्ग पैदा हो सके। 

श्याम वर्ग के जनों के साथ बहुत अलग ही व्यवहार किया था, क्यों कि दुनिया की सबसे पहले सभ्य होने वाली अफ्रीकी कौम सबसे पहले दास प्रथा में झौंक दी गई, सिर्फ इसलिये कि उनकी शारीरिक ताकत अकूत थी। मैंने एक अफ्रीकी फिल्म देखी थी, जिसमें फिल्म के आरम्भ में एक वाक्य आता है, "जब तुम लड़ रहे थे, हम गणित सीख रहे थे, जब तुम मारकाट कर रहे थे, हम वाणिज्य सीख रहे थे, जब तुम गला काट रहे थे हम नृत्य कर रहे थे"  मुझे ना फिल्म का नाम याद है, ना ही सही वाक्य, लेकिन अर्थ यही था। शायद मकड़ी को लेकर फिल्म थी यह, जो उस काल में उनकी इष्ट देवी थी।"

दुख की बात यह कि यह सामाजिक भिन्नता नहीं, बल्कि मानवीय साजिश थी, काफी कुछ वैसे ही , जैसे आज महानगरों में गांव दराज की लड़कियों को घरेलू सहायिका के नाम पर गुलामी का रूप भुगतना पड़ता है़। 

यानी कि अमेरिका लोक तन्त्र की चादर ओढ़े ऐसा राज्य था, जिसकी भिन्नता पर आवरण पड़ा था। 

लेकिन पूरी दुनिया पूरे महिने से जो ड्रामा देख रही है, जिस तरह से लोकतन्त्र को भस्म करने की कोशिश चल रही हैं, उसका प्रभाव संभवतया पूरी दुनिया को उठाना पड़े। क्यों कि तानाशाह एक देश नहीं होता, बल्कि अपने लपेटे में बहुत से देशों को ले लेता है। अमेरिका का जो चेहरा निकल कर आ रहा है, वह छिपा हुआ था, लेकिन बहुत वीभत्स है, यह फिर से दुनिया को पीछे ढ़केल देगा। 

चीन इसका अच्छा उदाहरण हैं, समाजवाद के नाम पर राजकीय तानाशाही से जूझने वाले देश ने किस तरह से अपने खाल के भीतर छिपी तानाशाही को उजागर कर दिया है, सोचने लायक है। 

यानी साम्यवाद का मुलम्मा उतरते ही चीन की तानाशाही दुनिया के नाक में दम कर रही है। और हम कुछ कर भी नहीं कर पा रहे हैं। 

चीन के बारे में वहां के लेखकों कवियों , जिन्होंने कल्चर  रिव्यूलेशन को भुगता है, जिससे साम्यवाद की खाल में तानाशाही के आगमन की कथा थी,लेकिन आर्थिक सुख के नाम पर उसकी जो दादागिरी बढ़ रही है, वह खतरा दिखाती है, खास तौर से उन देशों को, जिसकी सीमाएं जुड़ती हैं। 

चीन ना केवल सीमाओं पर लड़ता हैं,बल्कि समाज, संस्कृति और कला विज्ञान के नाम पर भी घुसपैठ करता है, जिसके कई उदाहरण हैं, जो शायद बहुत बाद में समझ में आयेंगे। 

अब तीसरी बड़ी लोकतन्त्र शक्ति भारत है, जिसके भी घुन लग रही है, भारत को लोकतन्त्र बनाने में जो मेहनत लगी थी, उससे कम मेहनत पटेल को नहीं लगी थी, जब उन्होंने विविध भाषा और आचार विचार वाले राजघरानों को भारत गणतन्त्र में शामिल करने को राजी किया। शायद लोगो को मालूम ही नहीं कि ट्रावनकोर की राजकुमारी ने सोच विचार में दस साल लगाये, केरल राज्य 1 November 1956 में बना, अन्यथा ये भी अलग अलग रियासते थीं। 

यदि पटेल की दृष्टि लिए बिना पूरे देश को एक चाबुक से हांका गया तो लोकतन्त्र को झटका पहुंच सकता है, जातीय और धार्मिक विविधता के होने पर भी भारत में एक सार्वभौमिकता थी, लेकिन जो अनभिज्ञता दिखाई दे रही है, वह दुनिया को एक खतरे से आगाह करवाती है। 

हम अब भी आशा करते हैं कि लोकतन्त्र बचा रहे, बची रहे आदमी की अस्मिता!


नोट-यहाँ क्लिक करके इस पोस्ट को फ़ेसबुक पर पढ़ सकते हैं। 

1 comment:

सुशील कुमार जोशी said...

है क्या? है तो कहां है? खत्म वो होता है जो होता है :) अमर रहे।