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09 February 2011

इस बसंत के मौसम में क्यों ...

इस बसंत के मौसम में क्यों 
पतझड़ जैसा लगता है,
और मिलन की ख़ुशी मनाते,
हम को विरहा सा लगता है 

इस बसंत के मौसम में क्यों 
पतझड़ जैसा लगता है

किसी डाल पर कोयल गाती,
स्वप्नों के रंगीले गीत,
हम को भी सुन सुन कुछ होता,
पर कपोत न दीखता है 

इस बसंत के मौसम में क्यों 
पतझड़ जैसा लगता है

दूर हुआ मनमीत मगर,
क्यूँ न यादों से हटता है,
आँखों से झर झर झर आंसू,
सागर सूखा सा लगता है

इस बसंत के मौसम में क्यों 
पतझड़ जैसा लगता है.


[वैसे तो अपनी डायरी में लिखी सभी कविताओं को मैं इस ब्लॉग पर डाल चुका हूँ.13 दिसम्बर 2006 की लिखी इस कविता/गीत को भी आज यहाँ प्रस्तुत कर दिया है.]