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14 October 2020

कुछ ऐसा भी होता है .....

समय के साथ 
चेहरे बदलते हैं
कभी-कभी 
बदलती हैं तकदीरें भी 
हाथों की लकीरें भी 
लेकिन कुछ 
ऐसा भी होता है 
जो अक्षुण्ण रहता है 
जिसके भीतर का शून्य 
शुरू से अंत तक
तमाम विरोधाभासों 
और बदलावों के बाद भी 
बिल्कुल निर्विकार 
और अचेतन होता है 
शायद उसी परिकल्पना की तरह 
जो रची गई होती है 
किसी साँचे में 
उसे ढालने से पहले। 

-यशवन्त माथुर ©
14102020 

04 October 2020

कुछ लोग -52

कुछ लोग 
जो उड़ रहे हैं आज
समय की हवा में 
शायद नहीं जानते 
कि हवा के ये तेज़ झोंके 
वेग कम होने पर 
जब ला पटकते हैं धरती पर 
तब कोई
नहीं रह पाता काबिल 
फिर से सिर उठाकर 
धारा के साथ 
चलते जाने के।
 
इसलिए 
संभल जाओ 
समझ जाओ 
मैं चाहता हूँ 
कि जान पाओ 
और कह पाओ 
सही को सही 
गलत को गलत 
क्योंकि 
यह चिर स्थायी गति 
शून्य से शुरू हो कर 
शून्य पर ही पहुँच कर 
देश और काल की 
हर सीमा से परे 
कुछ लोगों के 
आडंबरों का विध्वंस कर 
सब कुछ बदल देती है।  

-यशवन्त माथुर ©
04102020

'कुछ लोग' शृंखला की अन्य पोस्ट्स यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं। 

30 September 2020

अब नहीं निकलेंगे.....

अब नहीं निकलेंगे लोग 
मोमबत्तियाँ लेकर सड़कों पर 
नहीं निकलेंगे जुलूस 
#JusticeforManisha
और पैदल मार्च 
नहीं देंगे श्रद्धांजलि 
गगन भेदी नारों से 
नहीं करेंगे 
दिन-रात टेलीविज़न पर 
न्याय की माँग 
नहीं चमकाएंगे 
कैमरों के आगे अपने चेहरे 
नहीं करेंगे धरने और प्रदर्शन 
क्योंकि सत्यकथा पढ़ने के अभ्यस्त 
कई टुकड़ों में बँटे हुए 
हम संवेदनहीन लोग 
अभी व्यस्त हैं 
चरस-गाँजा, हत्या और आत्महत्या की 
गुत्थियाँ सुलझाने में। 

हम 
अपनी विचारशून्यता के साथ  
दिन के भ्रम में 
उतराते जा रहे हैं 
काली घनी रात के बहुत भीतर 
इतने भीतर 
कि जहाँ से बाहर 
अगर कभी निकल भी पाए 
तो भी लगा रहेगा 
एक बड़ा प्रश्नचिह्न 
हमारे बदलाव 
और हमारी विश्वसनीयता पर 
वर्तमान की तरह। 

-यशवन्त माथुर ©
30092020 

17 September 2020

चाहिए

जो बैठे हैं बेकार उनको रोज़गार चाहिए।
जो सुने सबकी पुकार ऐसी सरकार चाहिए।

खुशहाल मजदूर-किसान-नौ जवान चाहिए।
दो जून की रोटी, कपड़ा और मकान चाहिए।

संविधान की प्रस्तावना का स्वीकार चाहिए।
शोषण मुक्त समाज का स्वप्न साकार चाहिए।

जागृति के गीतों का अब आह्वान चाहिए।  
प्रगति की राह पर नया अभियान चाहिए।

-यशवन्त माथुर ©
17092020
#बेरोजगार दिवस

02 September 2020

मन का एक कोना है और मैं हूँ

नहीं चाहता बताना
नहीं चाहता समझाना
कि इस दौर में
आखिर इतना उलझा हुआ
क्यूँ हूँ
बस मन का एक कोना है
और मैं हूँ

ये जो संगीत की लहरें
गुजर रही हैं
कानों से मन के भीतर
साथ हैं मेरे फिर भी तन्हा सा
क्यूँ हूँ
बस मन का एक कोना है
और मैं हूँ

यूं लिखते-लिखते
पढ़ते-पढ़ते
सब समझते-बूझते
आखिर ना-समझ इतना
बनता क्यूँ हूँ
बस मन का एक कोना है
और मैं हूँ

दिखते हैं सब अपने
लेकिन पराए ही हैं
बेमतलब के रिश्तों में
फँसता ही क्यूँ हूँ
बस मन का एक कोना है
और मैं हूँ

-यशवन्त माथुर ©
02092020

27 August 2020

बहुत हैं....

प्रश्न भी बहुत हैं
उत्तर भी बहुत हैं
फिर भी
उलझनों की राह पर
वक़्त चलता जा रहा है
जाने क्या होता जा रहा है?

सोचा तो नहीं था
कि ऐसा भी होगा
जिन्हें अपना समझता रहा
उनकी नज़रों में
धोखा ही होगा।

कल्पना के हर उजाले में
अब अंधेरे बहुत हैं
कोरे स्याह इन पन्नों को
कुरेदने वाले बहुत हैं।

-यशवन्त माथुर ©
27082020 

23 August 2020

आज की शाम (2 शब्द 3 चित्र)


हम सिर्फ सोचते रह जाते हैं
ख्यालों के बादल
आ कर चले जाते हैं

Shot by Samsung M30s-Copyright-Yashwant Mathur©
 मैं चाहता हूँ
बरस जाएं लेकिन
थोड़ा गरज कर ही
मंजिल पा जाते हैं

Shot by Samsung M30s-Copyright-Yashwant Mathur©
 ये आज की शाम है
मगर किस्सा हर रोज का है
कुछ शब्द लिखते हैं 
कुछ मिटा दिये जाते हैं। 

Shot by Samsung M30s-Copyright-Yashwant Mathur©

-यशवन्त माथुर ©
23082020 



22 August 2020

छोटी बात

जो सक्षम हो कर भी
असमर्थ हों
उन तथाकथित
अपनों से दूर होने की
गर आ जाए सामर्थ्य
तो धन्य हो कर
कूच कर जाऊँ
एक नयी दुनिया की ओर।

-यशवन्त माथुर ©
22082020

21 August 2020

कुछ तो होना ही है

विध्वंस या निर्माण
जन्म या मरण
प्रश्न या उत्तर
उत्तर या प्रश्न
जो आज यक्ष है
कल उसे
प्रत्यक्ष होना ही है
समय का परिवर्तन
सुनिश्चित ही है
पाना है कुछ
और कुछ तो
खोना ही है।

-यशवन्त माथुर
20082020

16 August 2020

मैं लोकतंत्र हूँ

मैं
समय के पहियों पर
जीता-जागता
चलता-फिरता
उलझता-सुलझता
अक्सर दिखता रहता हूँ
सबको
आकर्षित करता रहता हूँ
अपनी
खोखली देह के ऊपर
रचे-बसे
मांसल
हुष्ट- पुष्ट
आवरण से।

यह आवरण
जो सिर्फ छद्म
क्षणिक ही है
अपनी अपार शक्ति
और गुरुत्वाकर्षण से
अपने आगे
कर देता है
नतमस्तक
समूचे ब्रह्माण्ड को।

फिर भी
सच तो यही है
कि
आज के इस दौर में
संभव नहीं उपचार
मेरे भीतर को चीरती
दीमक का
मृगमरीचिका जैसे
प्रत्यक्ष भ्रमजाल का
अस्तित्व की कड़ी परीक्षा के
इस विपरीत काल का।

..और तब भी
कागजों पर यह कहा जाता है
कि मैं अमर हूँ ....
स्वतंत्र हूँ ..

मैं  लोकतंत्र हूँ !

-यशवन्त माथुर ©
16082020

15 August 2020

राग देश का ऐसा गाओ


गूंज उठे नभ जयकारों से
राग देश का ऐसा गाओ
भारत के इस मंगल पर्व पर
संकल्प समरसता का दोहराओ।

बांटने वाले हर विकार को
मन से अपने दूर हटाओ
एक ज़मीं पर एक हमीं हैं
एक सूत्र से सब बंध जाओ।

संस्कृतियों के समवेत स्वर से
अखिल शांति का गीत बनाओ
विश्व सुने सिर्फ अपनी गाथा
राग देश का ऐसा गाओ।

-यशवन्त माथुर ©

14 August 2020

देहरी के उस पार

बरसाती रात के
गहरे सन्नाटे में
मौन के आवरण के भीतर
मेरे मैं को खोजते हुए
चलता चला जा रहा हूँ
हर पहर
बढ़ता जा रहा हूँ।

एक अजीब सी दुविधा
एक अजीब सी आशंका
हर कदम पर
हाथ पकड़ कर
खींच ले रही है
अपनी ओर
जाने नहीं देना चाहती
उस ओर
जहाँ
मन की देहरी के उस पार
मुक्ति
कर रही है
बेसब्री से
मेरा इंतजार।

-यशवन्त माथुर ©
14/08/2020 

09 August 2020

चाहता हूँ अब प्रलय आए

कुछ ऐसा हो
जो दिल दहलाए
धरती गगन समंदर
सब हिल जाए
 चाहता हूँ
अब प्रलय आए।

ठौर बदलते इस
बुरे दौर का
जलता दीपक
अब बुझ जाए
 चाहता हूँ
अब प्रलय आए।

कोई नहीं
भरोसे जैसा
धोखे का
निशाँ  मिट जाए
चाहता हूँ
अब प्रलय आए।

-यशवन्त माथुर ©

25 July 2020

दोहरापन

एक दिन एक पुरानी डायरी के पन्ने पलटते हुए 18 वर्ष पहले लिखी गई इन पंक्तियों पर निगाह रुक गई।
संभवतः  कक्षा 12 की परीक्षा का परिणाम तब तक नहीं आया था और उस समय खाली समय बिताने का अपने पास यही एक माध्यम था।

दहेज प्रथा की  विषयवस्तु पर आधारित ये पंक्तियाँ आगरा की एक वरिष्ठ नेत्री के बारे में पापा द्वारा बताई गई बातों और उस पर मेरी कल्पना के नमक-मिर्च का परिणाम थीं। इनमें कुछ नाम-मात्र के सम्पादन के साथ आज डिजिटाइज़ कर दे रहा हूँ।
______________________________________________________________________

सजा था भव्य मंच, इत्र सुगंध थी चहुं दिशि छाई हुई।
नारी कल्याण समिति की अध्यक्षा थीं,सभा में आई हुईं।
गा रही थीं स्वागत गान उनका, संचालिका कोकिल कंठ से।
और निकल रहे थे उदगार दहेज विरोधी, समवेत स्वर से।
सुन स्तुति अपनी, अध्यक्षा थीं बड़ी प्रफुल्लित हुईं।
फिर आग्रह पर, बन ठन कर,जा माइक पर खड़ी हुईं।
निकृष्ट पुरुष समाज का,निंदा गान उन्होंने कर दिया।
इस तरह दहेज विरोध में,लंबा व्याख्यान उन्होंने दे दिया।
सभा थी चल रही, किन्तु बीच में, मोबाइल की घंटी बजी।
सुनकर संदेश, तुरंत ही वह अपने घर को निकल पड़ीं।
बात पुत्र के विवाह की, थी उनके घर पर चल रही।
कार, टीवी, फ्रिज, स्कूटर की मांग पर वह अड़ी रहीं।
किन्तु तभी किसी ने, उनका टीवी चालू कर दिया।
होने वाली पुत्रवधू ने, उनका भाषण देख लिया।
थी उठ खड़ी वह तुरंत ही, माता-पिता चकित हुए।
बोल उठी वह कन्या अपना संकोच त्यागते हुए।
मैं नहीं करूंगी विवाह, इस दो रंगे परिवार में।
दहेज विरोधी सास भी, है फँसी इसी व्यापार में।
धीरे-धीरे बात यह, जब औरों को मालूम हुई।
शहर की जनता को भी जब उनकी असलियत मालूम हुई।
कालिख पोत के चेहरे पर, उन्हें नगर में घुमाया गया।
इसके बाद किसी सभा में, उनको नहीं पाया गया।
कैसे करें उपचार दहेज का, इसे विचारें हम और आप।
लेना-देना ऐसे दान का, है समाज पर यह अभिशाप।

-यशवन्त माथुर ©

04 July 2020

बेमानी ही है

कुछ सवाल
अब तक
सिर्फ सवाल ही बने हुए हैं
और मैं
नहीं समझता देना
जवाब
हर उस बात का
जिसका होना
या न होना
बेमानी ही है।

-यशवन्त माथुर ©
04072020 

02 July 2020

मौसमों की तरह गुजरता रहा..

वक़्त आकर गुजरता रहा
मैं टकटकी लगाए बस देखता रहा
कोई छू कर गुज़रा था अभी - अभी जैसे
मैं सोया था, दिन में तारे गिनता रहा।

और जब होश आया -
तो कितनी ही शामें गुज़र चुकी थीं
शमा कितनी ही जली थीं,
और बुझ चुकी थीं।

ये दौर तन्हाइयों का है,
तुम क्या समझोगे साहिब!

एक नश्तर चुभता रहा
और मैं जीता रहा
वक़्त आ-आकर
मौसमों की तरह गुजरता रहा।

-यशवन्त माथुर ©
02072020

01 July 2020

जो हो रहा है, होने दो

अंधेरे हैं, अंधेरे ही रहने दो। मुखौटों के पीछे, मुखौटे ही रहने दो।
डर लगता है, सच के बाहर आने से। जो दबा है भीतर, भीतर ही रहने दो।
हो गया उजास, तो नाकाबिल हो जाऊंगा मैं। मुकाबिल होके जमाने का, खो जाऊंगा मैं।
हैं हरे अब भी ज़ख्म, उन बीत चुकी बातों के। फिर सींच दिया, तो सूख कर बिखर जाऊंगा मैं।
इसलिए अच्छा है कि जो हो रहा है, होने दो।
वक़्त गर्द में कहीं खो रहा है, खोने दो।
-यशवन्त माथुर ©
01072020

29 June 2020

हार कबूल है

न जाने कौन से जश्न में जीत मशगूल है।  
मैं मानता हूँ, हाँ! मुझे अपनी हार कबूल है।

इक दास्तां लिखी थी स्याही से, जो मिट गई।  
वक्त के दायरे में, और धूल में सिमट गई।

बचे-खुचे अल्फ़ाज़ भी बारिशों में बह गए।  
फिर भी कुछ कतरे हैं जो बुहरने से रह गए।

है मालूम कि बेशक ना-मालूम बना फिरता हूँ।  
उठता हूँ जब भी मगर अक्सर गिरा करता हूँ।

न जाने इस माहौल में ये कैसा क्या फितूर है। 
हार है कुबूल क्योंकि जीत कोसों दूर है।  

-यशवन्त माथुर ©
26062020

27 June 2020

हार

कभी-कभी
हारना अच्छा होता है
जीतने की
उम्मीद बनाए रखने के लिए
और मन के भीतर
नए कल के
दिए जलाए रखने के लिए।

-यशवन्त माथुर ©
27062020

25 June 2020

चाहत

चाहत पहचाने जाने की नहीं
चाहत सिर्फ इतनी है कि
पहचानता रहूँ सबको।

-यशवन्त माथुर ©
25062020