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09 August 2020

चाहता हूँ अब प्रलय आए

कुछ ऐसा हो
जो दिल दहलाए
धरती गगन समंदर
सब हिल जाए
 चाहता हूँ
अब प्रलय आए।

ठौर बदलते इस
बुरे दौर का
जलता दीपक
अब बुझ जाए
 चाहता हूँ
अब प्रलय आए।

कोई नहीं
भरोसे जैसा
धोखे का
निशाँ  मिट जाए
चाहता हूँ
अब प्रलय आए।

-यशवन्त माथुर ©

25 July 2020

दोहरापन

एक दिन एक पुरानी डायरी के पन्ने पलटते हुए 18 वर्ष पहले लिखी गई इन पंक्तियों पर निगाह रुक गई।
संभवतः  कक्षा 12 की परीक्षा का परिणाम तब तक नहीं आया था और उस समय खाली समय बिताने का अपने पास यही एक माध्यम था।

दहेज प्रथा की  विषयवस्तु पर आधारित ये पंक्तियाँ आगरा की एक वरिष्ठ नेत्री के बारे में पापा द्वारा बताई गई बातों और उस पर मेरी कल्पना के नमक-मिर्च का परिणाम थीं। इनमें कुछ नाम-मात्र के सम्पादन के साथ आज डिजिटाइज़ कर दे रहा हूँ।
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सजा था भव्य मंच, इत्र सुगंध थी चहुं दिशि छाई हुई।
नारी कल्याण समिति की अध्यक्षा थीं,सभा में आई हुईं।
गा रही थीं स्वागत गान उनका, संचालिका कोकिल कंठ से।
और निकल रहे थे उदगार दहेज विरोधी, समवेत स्वर से।
सुन स्तुति अपनी, अध्यक्षा थीं बड़ी प्रफुल्लित हुईं।
फिर आग्रह पर, बन ठन कर,जा माइक पर खड़ी हुईं।
निकृष्ट पुरुष समाज का,निंदा गान उन्होंने कर दिया।
इस तरह दहेज विरोध में,लंबा व्याख्यान उन्होंने दे दिया।
सभा थी चल रही, किन्तु बीच में, मोबाइल की घंटी बजी।
सुनकर संदेश, तुरंत ही वह अपने घर को निकल पड़ीं।
बात पुत्र के विवाह की, थी उनके घर पर चल रही।
कार, टीवी, फ्रिज, स्कूटर की मांग पर वह अड़ी रहीं।
किन्तु तभी किसी ने, उनका टीवी चालू कर दिया।
होने वाली पुत्रवधू ने, उनका भाषण देख लिया।
थी उठ खड़ी वह तुरंत ही, माता-पिता चकित हुए।
बोल उठी वह कन्या अपना संकोच त्यागते हुए।
मैं नहीं करूंगी विवाह, इस दो रंगे परिवार में।
दहेज विरोधी सास भी, है फँसी इसी व्यापार में।
धीरे-धीरे बात यह, जब औरों को मालूम हुई।
शहर की जनता को भी जब उनकी असलियत मालूम हुई।
कालिख पोत के चेहरे पर, उन्हें नगर में घुमाया गया।
इसके बाद किसी सभा में, उनको नहीं पाया गया।
कैसे करें उपचार दहेज का, इसे विचारें हम और आप।
लेना-देना ऐसे दान का, है समाज पर यह अभिशाप।

-यशवन्त माथुर ©

04 July 2020

बेमानी ही है

कुछ सवाल
अब तक
सिर्फ सवाल ही बने हुए हैं
और मैं
नहीं समझता देना
जवाब
हर उस बात का
जिसका होना
या न होना
बेमानी ही है।

-यशवन्त माथुर ©
04072020 

02 July 2020

मौसमों की तरह गुजरता रहा..

वक़्त आकर गुजरता रहा
मैं टकटकी लगाए बस देखता रहा
कोई छू कर गुज़रा था अभी - अभी जैसे
मैं सोया था, दिन में तारे गिनता रहा।

और जब होश आया -
तो कितनी ही शामें गुज़र चुकी थीं
शमा कितनी ही जली थीं,
और बुझ चुकी थीं।

ये दौर तन्हाइयों का है,
तुम क्या समझोगे साहिब!

एक नश्तर चुभता रहा
और मैं जीता रहा
वक़्त आ-आकर
मौसमों की तरह गुजरता रहा।

-यशवन्त माथुर ©
02072020

01 July 2020

जो हो रहा है, होने दो

अंधेरे हैं, अंधेरे ही रहने दो। मुखौटों के पीछे, मुखौटे ही रहने दो।
डर लगता है, सच के बाहर आने से। जो दबा है भीतर, भीतर ही रहने दो।
हो गया उजास, तो नाकाबिल हो जाऊंगा मैं। मुकाबिल होके जमाने का, खो जाऊंगा मैं।
हैं हरे अब भी ज़ख्म, उन बीत चुकी बातों के। फिर सींच दिया, तो सूख कर बिखर जाऊंगा मैं।
इसलिए अच्छा है कि जो हो रहा है, होने दो।
वक़्त गर्द में कहीं खो रहा है, खोने दो।
-यशवन्त माथुर ©
01072020

29 June 2020

हार कबूल है

न जाने कौन से जश्न में जीत मशगूल है।  
मैं मानता हूँ, हाँ! मुझे अपनी हार कबूल है।

इक दास्तां लिखी थी स्याही से, जो मिट गई।  
वक्त के दायरे में, और धूल में सिमट गई।

बचे-खुचे अल्फ़ाज़ भी बारिशों में बह गए।  
फिर भी कुछ कतरे हैं जो बुहरने से रह गए।

है मालूम कि बेशक ना-मालूम बना फिरता हूँ।  
उठता हूँ जब भी मगर अक्सर गिरा करता हूँ।

न जाने इस माहौल में ये कैसा क्या फितूर है। 
हार है कुबूल क्योंकि जीत कोसों दूर है।  

-यशवन्त माथुर ©
26062020

27 June 2020

हार

कभी-कभी
हारना अच्छा होता है
जीतने की
उम्मीद बनाए रखने के लिए
और मन के भीतर
नए कल के
दिए जलाए रखने के लिए।

-यशवन्त माथुर ©
27062020

25 June 2020

चाहत

चाहत पहचाने जाने की नहीं
चाहत सिर्फ इतनी है कि
पहचानता रहूँ सबको।

-यशवन्त माथुर ©
25062020

24 June 2020

कहानियाँ हैं.....

कई किस्से हैं यहाँ
कई कहानियाँ हैं
कहीं मजबूरियां हैं
कहीं मेहरबानियाँ हैं
उलझनें भी उलझने लगीं हैं
अब अपने ही जाल में
कहीं रोता है बचपन
कहीं उजड़ती जवानियाँ हैं।

-यशवन्त माथुर ©
24062020

23 June 2020

कुछ नहीं होगा

सिर्फ किताबें हैं यहाँ
और किताबी ज्ञान है
धरातल पर
न कुछ है
न ही होगा
सब व्यर्थ है यहाँ
कुछ नहीं होगा।

-यशवन्त माथुर ©
23062020 

22 June 2020

कल देखना फिर

कुछ यायावर हैं यहाँ
कुछ तमाशाई हैं
फ़ितरतें तो खैर
सभी की समझ आई हैं
वक्त अपना भी होगा
कल देखना फिर
है खुदा एक और
एक उसकी खुदाई है।

-यशवन्त माथुर ©
22062020

21 June 2020

ग्रहण

बदल यूं आसमान में
उमड़ते रहेंगे
कुछ गरजते रहेंगे
कुछ बरसते रहेंगे
लोग कुछ भी कहें
कहते रहें
ग्रहण तो ग्रहण हैं
लगते रहेंगे।
-यशवन्त माथुर ©
21062020 

20 June 2020

रास्ते

हम चलते जाएंगे
और
ये लंबे लंबे रास्ते
यूं ही बीतते जाएंगे
बहुत तेजी से
आखिरी पड़ाव पर आकर
कुछ बातें कह जाएंगे
कुछ अधूरी छोड़ जाएंगे।
-यशवन्त माथुर ©
20062020

19 June 2020

फर्क नहीं पड़ता

ये ठौर
मेरा है जनाब
आप आएं
न आएं
फर्क नहीं पड़ता।

-यशवन्त माथुर ©
19062020

18 June 2020

ज़िंदगी

कोई गैर
अपना बन कर
कभी दुआएं ले जाता है
और कोई अपना
गैर बन कर
सब कुछ खतम कर जाता है
यही ज़िंदगी है
यही रिश्ता-नाता है।

-यशवन्त माथुर ©
18062020

आत्महत्या

आत्महत्या
कायरता नहीं
उस स्थिति का
चरम बिन्दु होता है
जहाँ व्यर्थ लगने लगती हैं
इस विद्रूप दुनिया की
मायावी फ़ितरतें।

-यशवन्त माथुर ©
17062020

17 June 2020

एहसास है मुझको

है एहसास मुझको
कि आने वाले हैं
लौट कर
संघर्ष के बीते दिन
क्योंकि
समय का घूमता पहिया
अक्सर मुझे
ला खड़ा करता है वहीं पर
जहाँ से शुरू किया था
दो कदम आगे बढ़ना।

-यशवन्त माथुर ©
17062020

सही

जरूरी नहीं
जो उनको सही लगे
सही वही हो
सही वह भी हो सकता है
जो सबकी नज़रों में
सही नहीं हो।

-यशवन्त माथुर ©
17062020

16 June 2020

वो कायर नहीं था

हमें नहीं मिलेंगे
उन सवालों के जवाब
जिनकी कालिख
वो हमारे मुँह पर पोत गया

हम यही कहेंगे
कि वो एक कायर था
जो हार मन कर चला गया

लेकिन सुन लो नहीं
नहीं..  वो कायर नहीं
बहादुर था
हिम्मती था
कायर तो हम सब थे..
हैं... और रहेंगे
यूं ही
मौत से डरते रहेंगे

ये एक ऐसा आज है
जिसका समानार्थी
सबके भीतर
परत दर परत
जमा हुआ
ऐसा अवसाद है
जिससे पार पाने से
कहीं ज्यादा आसान
आसमान से लाना है
तोड़ कर चाँद-तारे।

-यशवन्त माथुर ©
16062020

15 June 2020

मुक्ति

जब सामने हो अंधेरा
और कोई रास्ता न हो
किसी का किसी से
जब कोई वास्ता न हो ..
तब होती है जायज ही
मुक्त हो जाने की
मुखर और
अपरिहार्य सोच।

-यशवन्त माथुर ©
15062020