+Get Now!

प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।
Showing posts with label पंक्तियाँ. Show all posts
Showing posts with label पंक्तियाँ. Show all posts

28 April 2020

हिन्मुश्चियन (Hinmustian) हूँ मैं

कौन हूँ मैं
अक्सर लोग पूछते हैं
मेरी जाति, मेरा धर्म बूझते हैं
जैसे यह कोई पहेली हो
जैसे यह जानना बहुत जरूरी हो
ताकि वो सहज हो सकें
मेरे इंसानी चेहरे-मोहरे
रंग-रूप और नस्ल से
या मुझे ही सहज कर सकें
अपने पूर्वाग्रही
अक्स से।

मैं खुद भी
दीवार पर लगे आईने में
खुद को देखकर भी
यही पूछता हूँ
कि इस देह
और मन के सिवा
क्या कुछ और भी हूँ मैं ?
आखिर कौन हूँ मैं ?

आत्ममंथन के कई दिनों
और रातों के बाद
स्वप्नों में खुद से कही बातों के बाद
निष्कर्ष निकला यही
कि सब कुछ हूँ -
हिन्दू हूँ-
मुस्लिम-सिख और
क्रिश्चियन भी हूँ मैं
हिन्मुश्चियन (Hinmustian) हूँ मैं ।

-यशवन्त माथुर ©
28/04/2020

27 April 2020

मानता हूँ

मानता हूँ 
कि मेरे शब्द 
बहुत साधारण हैं 
ये साहित्यिक नहीं 
न ही इनमें दिखता है 
काव्य का सौन्दर्य और 
व्याकरण। 

ये शब्द 
सिर्फ आकार हैं 
उन विचारों और 
बातों के 
जो मन में उमड़ती रहती हैं 
कुछ-कुछ कहती रहती हैं 
और मैं 
घूम-फिर कर 
अपनी सीमित शब्दावली को 
उलट-पुलट कर 
सिर्फ दोहराता ही रहता हूँ। 

यह गद्य है या पद्य 
मैं खुद नहीं जानता हूँ 
स्वाभाविक है 
प्रश्न चिह्नों का लगना 
यह मानता हूँ।  

-यशवन्त माथुर ©
27/04/2020

26 April 2020

अच्छा नहीं लगता

अच्छा नहीं लगता
जब देखता-सुनता हूँ खबरें
कि कहीं
दुनिया के किसी कोने में
भूख और प्यास से तड़प कर
मर जाता है कोई।

अच्छा नहीं लगता
जब तस्वीरें दिखाती हैं
कहीं कूड़े की तरह
बिखरा हुआ अनाज और
किसी पंप से
यूं ही बहता हुआ पानी।

अच्छा नहीं लगता
जब खुद को
घर में कैद पाता हूँ
दो वक्त या उससे ज्यादा
जितना मन हो खाता हूँ ।

अच्छा नहीं लगता
कि इतना सब कुछ भी
कुछ नहीं के जैसा है
किसी को नसीब हैं
महल और महफिलें
और कोई
अपनी भूख को खाता
पसीने को पीता है।

-यशवन्त माथुर©
26/04/2020

25 April 2020

कभी मजदूर न बनो

कुछ भी बनो इंसानों !
ऐसे मजबूर न बनो
ये आलम ऐसा है कि
कभी मजदूर न बनो।

न चलना पड़े पैदल
मीलों को नापते -नापते
न होना पड़े रुखसत
कहीं हांफते-हांफते।

कुछ भी बनो इंसानों !
बस कोई गुरूर न बनो
बेकदरी ही मिलेगी यहाँ
कभी मजदूर न बनो।

-यशवन्त माथुर©
25/04/2020

24 April 2020

नहीं चलना धारा के साथ

हाँ माना
कि बहती धारा
सबको भाती  है
वह ले चलती है
अपने भीतर
कई सुनहरे पल
अपनी यात्रा में
सबके साथ
उसकी मंजिल
भले ही
आसान
और पास होती जाती है
लेकिन खोती जाती है
अपनी पहचान
हर अगले पड़ाव पर।

मेरे अंदर की महत्त्वाकांक्षा
मुझे रोक देती है
बहने से
अपना मूल
अपना अस्तित्व
जल्द ही खोने से
शायद मेरा वर्तमान
या भविष्य
यहीं थाम देना चाहता है
मन के भीतर उमड़ती
अजीब सी हलचल को
वजह जो भी हो
मुझे पसंद है
मेरे  'मैं' का हाथ
इसलिए न चला  हूँ
न ही चलूँगा
धारा के साथ ।

-यशवन्त माथुर ©
24/04/2020

23 April 2020

हम नहीं समझ सकते.....

हम नहीं समझ सकते
उन भारी आँखों के पीछे की दास्तां
जो कुलबुलाती आंतों की आपस में रगड़
और तीखे पेट दर्द को ढोते हुए
हर पल इस इंतजार में हैं
कि यह दौर बीते और पूरी हो
बिना अपराध मिली
काला-पानी की सजा।

हम नहीं समझ सकते
उखड़ती साँसों को देखते
गवाहों के भीतर की तड़प
और कुछ न कर पाने की कसक
क्योंकि हमें आदत है
अपनी चारदीवारी में सिमटे रहकर
उपदेश देने और अंतर्जाल के हर कोने पर
अपनी विकृतियों के
बेपरवाह प्रदर्शन की।

-यशवन्त माथुर ©
23/04/2020

22 April 2020

अच्छा है कि ......

अच्छा है कि
उनको मुझसे नफरत है
अच्छा है कि
उनको जीत की गफलत है
मुझे कोई गम नहीं
हार खुद की मानने में
ये तो कल बताएगा कि
किसकी कौन सी फितरत है।

-यशवन्त माथुर ©
22/04/2020 

21 April 2020

कुछ लोग-49

अच्छे-बुरे
कई तरह के लोग
बात-बेबात
बताने लगते हैं
समझाने लगते हैं-
ये लिखो
वो न लिखो
ऐसे लिखो
वैसे न लिखो
ये चित्र या ये पंक्ति
साझा करो
या न करो
लेकिन खुद
अपने चेहरे की
कुटिल मुस्कुराहट के
पीछे रखते हैं
अपना वो सच
जो
कहलवाना चाहते हैं मुझसे
लेकिन नाकाम रहते हैं
क्योंकि
यह जो कुछ है
मेरा है
यह मेरी अभिव्यक्ति है
जो खराब और अच्छी होती है
लेकिन करीब होती है
मेरे दिल और दिमाग के
इसलिए
अब पाता हूँ
खुद को उस मुकाम पर
जब बे लगाम
कह सकता हूँ
ढाल सकता हूँ
अपने शब्दों को
अपने मन के
इस धरातल पर।

-यशवन्त माथुर ©
21/04/2020

20 April 2020

चिंगारी क्यूँ सुलगती है ?

इंसानों की नहीं जाहिलों की यह बस्ती लगती है।
बनी जो नफ़रतों की वह इमारत यहाँ बसती है।

कहीं पूजा--इबादत या अरदास और प्रार्थना में।
बात एक ही सबकी है अमन की हर कामना में।

फिर चाहो तो देख लो खूँ तो हरेक का एक ही है।
फर्क तो जिस्मों का है नस्लों का सिर्फ भेद ही है।

मन के जंगलों में क्यूँ अब भी यह आग दहकती है?
बड़े आलिम-फ़ाज़िल* हैं तो चिंगारी क्यूँ सुलगती है?

अरे! मिल जाओ गले कि गिले तो फिर होते रहेंगे।
गर अब भी न हुए एक तो फिर सब रोते ही रहेंगे।

-यशवन्त माथुर ©
19/04/2020

*आलिम-फ़ाज़िल=पढे-लिखे 

19 April 2020

कुछ भी तो नहीं .....

ये धूल भरे गुबार
कुछ भी तो नहीं
उस धुंध के आगे
जिसके  पार
हम जाना ही नहीं चाहते
हमने थाम रखा है खुद को
बंधनों में जकड़ रखा है
अपनी ही बनाई रूढ़ियों के
चारों के तरफ
घूमते रहकर
सिकुड़ती जाती
स्वार्थी होती जाती
हमारी सोच का अंत
सिर्फ उसी देहरी पर है
जिसके पार
एकांतवास में लीन हैं
धारा के विपरीत
चलने वाले लोग।

-यशवन्त माथुर ©
19/04/2020

18 April 2020

कब मिटेगी भूख ?

कब मिलेगा उनको
उनके हिस्से का सुख?
कब मिटेगी उनकी
दो जून की भूख ?

कब खोले जाएंगे बंधन
उनके पैरों के?
कब होंगे वो मुक्त
हर कदम पे पहरों से?

लौटेगी कब मुस्कुराहट
उनके बच्चों के चेहरे पर?
नन्हे कदम कब थिरकेंगे
अपने आँगन और देहरी पर?

कब आएगी हथेली पर
लौट कर वही दिहाड़ी?
कब लौटेगी पटरी पर
जीवन की रेल गाड़ी ?

कब तक तड़प-तड़प कर
यूं देह होती रहेगी मुक्त ?
कब मिटेगी उनकी
दो जून की भूख ?

-यशवन्त माथुर ©
18/04/20

17 April 2020

लॉकडाउन में.....

काश!
काले अध्यायों वाला
यह समय बीत जाए
तो देख लुंगा मैं भी
कुछ सपने
जो कैद हैं
कहीं किसी अंधेरे में
लॉकडाउन में।

-यशवन्त माथुर ©
17/04/2020

16 April 2020

सत्य से बहुत दूर ........

चलते-चलते
हम आ पहुंचे हैं
सत्य से बहुत दूर
अपनी कल्पनाओं में
भटकते हुए
यहाँ
हमें लगता है
कि हाँ
यही वो जगह है
यही वो मंजिल है
जिसे पाने के लिए
शुरू हुई थी
हमारी यात्रा।

यह सिर्फ भ्रम है
यह वास्तविकता नहीं है
क्योंकि यहाँ
दिखते हैं
सिर्फ फूल ही फूल
और कांटा एक भी नहीं
क्योंकि यहाँ
ठंडी हवाएं हैं
और अंगारा एक भी नहीं
क्योंकि यहाँ
सिर्फ कृत्रिम मुस्कुराहटें हैं
उनके पीछे छुपे आँसू नहीं।

तो आखिर क्यूँ ?
क्यूँ हमें पसंद है
यही छद्म आवरण
क्यूँ हम भागते आ रहे हैं
क्यूँ हमें नहीं हो रहा एहसास
कि जो हो रहा है
गलत है
शायद इसलिए
कि सोच की देहरी पर बनी
पूर्वाग्रह की लक्ष्मण रेखा
शिथिल कर देती है
हमारा साहस
और क्योंकि
वर्तमान में जीते हुए
हम भूल चुके हैं
अपना इतिहास।

-यशवन्त माथुर©
16/04/2020

15 April 2020

हम सब सो रहे हैं....

नहीं
कोई मतलब नहीं
जंजीरों में कैद
बेहिसाब भूख से।

नहीं
कोई मतलब नहीं
अपनों से मिलने की
बेहिसाब तड़प से। 

नहीं
कोई मतलब नहीं
गरीबी से
बेकारी से
लाचारी से
बस मतलब है
तो सिर्फ
अपने आस-पास की
मृग मरीचिका से
जिसे  वास्तविकता मान कर 
तबाही के इंतजार में
चादर तान
सपनों में खो रहे हैं
क्योंकि
हम सब सो रहे हैं।

-यशवन्त माथुर ©
15/04/2020

14 April 2020

जरूरी नहीं ....

जरूरी नहीं
कि हम जो कहें
उसमें कोई अर्थ हो
या निहित हो
कोई संदेश।

हम अक्सर
अपने उलझे
शब्दों के साथ
खुद भी उलझ जाते हैं
समझ नहीं पाते हैं
आधार
उन शब्दों का
जो अचानक ही
उमड़ पड़ते हैं
कागज और
कलम की जुगलबंदी से।

इसलिए बेहतर है
कि हम न ही समझें
बस कहते चलें
मन की बातें
क्योंकि कुछ बातें
सबके लिए नहीं
खुद के लिए ही होती हैं।

-यशवन्त माथुर ©
14/04/20

13 April 2020

क्या देख पा रहा हूं?

क्या देख पा रहा हूं भविष्य को?
या बस घूम रहा हूं
बेतरतीब ख्यालों की
अजीब सी दुनिया में
जहां शब्द महसूस तो होते हैं
लेकिन सुप्त रहते हैं
अचेतन मन के
किसी गुमनाम कोने में।
.
-यशवन्त माथुर ©
13/04/20

यह दौर भी बीत जाएगा

अंधेरी रात के बाद फिर,
एक नया सवेरा आएगा।
जागेगा जन-जन का मन,
और विजय के गीत गाएगा।

है आज का यह क्षणिक समय,
जो लंबा-लंबा सा लगता है।
बीत जाता था जो तेजी से,
अब तन्हा-तन्हा सा कटता है।

सुनसान-वीरान राहों पर,
साफ हवा की सुर-लहरी से।
ताल मिलाते पक्षी कहते,
'संभल जाओ ' इंसानों से।

है जो अब तक किया - धरा
वो कुछ तो रंग दिखलाएगा
प्रकृति का दण्ड भुगत कर
यह दौर भी बीत जाएगा।

-यशवन्त माथुर ©
12/04/2020


11 April 2020

कुछ लोग -48

खुद को ऊंचा
और सामने वाले को
नीचा समझने वाले कुछ लोग
अपने आस-पास के चाटुकारों से
घिरे रह कर
खुद को
कुछ भी समझ लेते हैं
कुछ ऐसा -
जो वो होते नहीं ।
उनको लगता है
कि यह जो चुप है
नतमस्तक है
उनके आगे
इसलिए किया जा सकता है
उसको मानसिक प्रताड़ित
दिया जा सकता है तनाव
क्रूर और बर्बर बातों से
लेकिन शायद
ऐसे लोग भूल जाते हैं
कि चुप या मौन रहने वाला इंसान
जब खोलने लगता है
अपनी जुबान
तो यह संकेत होता है
कि तूफान
अब दूर नहीं।

-यशवन्त माथुर ©
11/04/2020

09 April 2020

यह तो होना ही था .....

ये तो तय था पहले से ही
कि जो हुआ
या जो हो रहा है
होना ही था
अपने कर्मों का फल
इस तरह भोगना ही था।

तो आखिर क्यूँ
मचाया हुआ है
हाहाकार
क्यूँ कर रहे हैं
चीख-पुकार ?

उस समय
जब अवसर था
कि हम बदल सकते
अपने भावी वर्तमान को
हमारी तर्जनी उंगली
पूर्वाग्रह के रक्त प्रवाह के साथ
टिकती रही
उस धारा के तल पर
जिसकी कठोर सतह के भीतर का दल-दल
हमें आज भी
कर रहा है मजबूर
और भी धँसते जाने को
सहते जाने को
सुबह और शाम की भूख।

मगर अब
एक यक्ष प्रश्न यह भी है
कि क्या हमें पछतावा है ?
क्या हम कर रहे हैं
आत्म मंथन ?
क्या हम कर रहे हैं प्रयत्न ?
कि बाहर आकर देख सकें
वही चलती-फिरती
उजली दुनिया.. ..

शायद नहीं
शायद इसलिए नहीं
क्योंकि हमें स्वीकार है
समय की अंधी सत्ता
और उसकी दासता
लेकिन अस्वीकार है
असत्य की रूढ़ियों को तोड़कर
तथाकथित
'प्रगतिशील' कहलाना।

-यशवन्त माथुर ©
09/04/2020

06 April 2020

कुछ तो लोग कहेंगे ही......

कुछ तो
लोग तो कहेंगे ही
जो उनको करना होगा
करेंगे ही
यह तो अपने ऊपर है
कि कैसे समझना है उनको
उनकी बातों को
बिना उनके आगे
नतमस्तक हुए
सुनते चलना है
अपने दिल की आवाज
और बहते रहना है
अपने विचारों की धारा के संग
भले ही
वह विपरीत हो
समकालीन दौर के
लेकिन
विध्वंस के हजारों दौरों के बाद भी
डिगना नहीं
बस अड़े रहना है
खड़े रहना है
इसी तरह
इसी राह पर।

-यशवन्त माथुर ©
06/04/2020