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04 September 2020

निजीकरण : दूर के ढोल सुहावने --- राकेश श्रीवास्तव

आज कल निजीकरण एक विमर्श का विषय बना हुआ है। वर्तमान सरकार का सारा ध्यान येन केन प्रकारेण सरकारी संस्थानों का निजीकरण करके अप्रत्यक्ष रूप से आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था को समाप्त करने पर लगा हुआ है। रेलवे से लेकर बैंक तक सभी जगह या तो विलय की बात चल रही है या इन संस्थानों का  निजीकरण करने के प्रयास किये जा रहे हैं और आश्चर्य की बात तो यह है कि समाज के एक बड़े वर्ग द्वारा इन प्रयासों का खुलकर समर्थन किया जा रहा है। निजीकरण वास्तव में दूर के ढोल सुहावने लगने जैसा ही है। इसकी अव्यावहारिकता पर प्रकाश डालते हुए सेवनिवृत्त बैंकर श्री राकेश श्रीवास्तव जी ने एक फ़ेसबुक पोस्ट लिखी है जो साभार यहाँ प्रस्तुत है -

" निजीकरण के लाभ दूर से ही अच्छे लगते हैं।  पहले निजी बैंकों को ही ले।  ग्लोबल ट्रस्ट बैंक को बदहाल होने पर ओबीसी में मर्ज किया गया। यस बैंक की शिखा शर्मा ने नोट बंदी में क्या किया सबको पता है।  वीडियोकॉन और आईसीआईसीआई बैंक दोनों प्राइवेट हैं । चंदा कोचर मैडम के कारनामे सबके सामने हैं। उन पर मेहरबानी के लिए बीमार होने के बावजूद जेटली साहब का लिखा ब्लॉग शायद याद हो। यस बैंक की हालत भी किसी से छुपी नहीं है। एनबीएफसी को भी शामिल करेंगे तो यह बढ़ता ही जाएगा। 

रही बात निजीकरण के अच्छी होने की तो इसमें यह नही भूलना चाहिए कि अपने देश की कंपनियो की लाभ की ललक इतनी बढ़ जाती है कि वो कंपनी को ही खाने लगती है।  जेट एयरवेज का उदाहरण सामने है। एसबीआई को उसको बेल आउट करने के प्रयास के लिए सरकार के निर्देश पर पैसा देना पड़ा।  इसके अतिरिक्त तमाम निजी कंपनियों का पैसा आखिरकार बैंकों को राइट ऑफ करना पड़ता है। 

आपने स्कूल और अस्पताल की बात की है।  अब भी भारत की अधिकांश जनता सरकारी स्कूल और अस्पताल पर ही निर्भर है।  यदि यह न हो तो करोड़ों बच्चे बेसिक शिक्षा से भी वंचित रह जाएंगे।  इसी प्रकार इलाज के लिए अभी भी बहुसंख्यक आबादी या तो सरकारी अस्पतालों पर निर्भर है या फिर झोला छाप डॉक्टरों पर।  उनके पास भरपेट भोजन के पैसे तो है नहीं। प्राइवेट स्कूल व प्राइवेट डॉक्टर की फीस तो एक सपना है।  शिक्षा व चिकित्सा दोनो ही आजकल सबसे अच्छे धंधे हैं। 

इसमें कोई शक नहीं कि गैर सरकारी उपक्रमों मे हमारे भाई ही काम करते है। पर उनका भी किस तरह से शोषण हो रहा है।  ठेके पर रखे जाने वाले किसी भी कर्मचारी को देख लीजिए चाहे वो गार्ड, सफाई कर्मचारी, अस्पतालों में कार्यरत कर्मचारी, कंप्युटर ऑपरेटर, टेक्नीशियन हो उनकी तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा ठेकेदार की ही जेब में जाता है।" 

राकेश श्रीवास्तव
एक रिटायर्ड बैंकर 

28 June 2020

China cash that BJP cannot see..............



Time was when accepting donations from Chinese institutions was as proper and acceptable as sharing space on a swing Yet, the BJP, in its haste to divert attention from the Galwan blunder, has forgotten the adage that when you point a finger at someone, you are pointing three at yourself. In this case, at least two fingers are pointing at the BJP ecosystem The Observer Research Foundation, a foreign policy think tank associated with foreign minister S. Jaishankar's son, received funding from the Chinese consulate, including that in Calcutta, in 2016. The ORF is supported by Reliance Industries Another think tank, the Vivekananda International Foundation, has declared on its website that it has working relationships with nine Chinese institutions on matters of foreign and strategic policy National security adviser Ajit Doval is founding director of the Vivekananda International Foundation (VIF), which shares close ties with BJP leaders and the RSS The think thanks themselves put up this information in the public domain long ago.
The identity of the donors would not have drawn attention had not the BJP made a non-issue into a national security issue by accusing the Congress of Chinese links based on money received in 2005-06. It's common for organisations worldwide to receive foreign funding Dhruva Jaishankar, son of the foreign minister, became director of the US Initiative at the Observer Research Foundation (ORF) last year. The foreign minister, also a former ambassador to China, is a regular visitor to the ORF where he delivers talks on various foreign policy-related topics The ORF website carries a list of foreign donors and the amounts received from them It shows the think tank received three grants, together worth over Rs 1.25 crore, from the Chinese consulate-general in 2016 and another Rs 50 lakh the following year The foundation received Rs 7.7 lakh on April 29, 2016; another Rs 11.55 lakh on November 4 that year --- both from the Chinese consulategeneral in Calcutta --- and Rs 1.068 crore from the "Consulate General of People's Republic of China" on December 31 that year A grant of Rs 50 lakh came from the "Consulate General of People Republic of China" on December 1, 2017. The Vivekananda Interna- tional Foundation's website lists its association with the China Institute of International Strategic Studies (Beijing); China Institute of International Studies (Beijing); Centre for South Asian Studies, Peking University (Beijing); Research Institute for Indian Ocean Economies, Yunnan University of Finance and Economics, Kunming; National Institute of International Strategy of Chinese Academy of Social Sciences, Beijing; Centre for South Asia & West China Cooperation & Development University, Chengdu; Institute of South Asian Studies, Sichuan University, Chengdu; Silk Road Think Tank Network Development Research Council, Beijing; and the Centre for Indian Studies, Shenzhen Sources in the security establishment said members of the two think tanks had ample access to North Block and South Block, the seats of governance An email sent by this newspaper to the ORF on Saturday night elicited the reply: "Your message has been received and we will get back to you at the earliest." This newspaper also sent a message to ORF president Samir Saran on his Twitter account and was awaiting a reply at the time of going to press However, this report has not made any suggestion that any of the donations are not legal.

Curtsy:The Telegraph
(IMRANAHMED SIDDIQUI)
(The Telegraph-28 Jun 2020)

22 May 2020

हसरत पूरी हो उसे पा जाने की.....(राहुल श्रीवास्तव)

ऐसा नही है कि मुझमें ताक़त नही थी, 
किस्मत बदल पाने की। 
हौसले के साथ आसमानों से, 
आगे उड़ जाने  की। 

समझ न पाया मंजिलें 
या समझ  न थी समझाने  की। 
कुछ ग़लतियाँ मेरी ही थीं, 
कुछ दूसरों के बदल जाने की। 

मुकद्दर  मेरा ठहरा हुआ है अभी, 
वो आ जाए शायद एक दिन....
और हसरत पूरी हो उसे पा जाने की। 

-राहुल श्रीवास्तव ©
लखनऊ । 

(रचनाकार एक प्रतिष्ठित कंपनी में वरिष्ठ अधिकारी हैं)

24 April 2020

माथुर नई सड़क वाले- साभार नवभारत टाइम्स

माथुर नई सड़क वाले
साड्डी दिल्ली
विवेक शुक्ला

च में लॉकडाउन के कारण घरों में बंद दिल्ली के माथुर परिवारों का भी धैर्य जवाब देने लगा है। अब देखिए कि वे ना तो अपने रोशनपुरा के चित्रगुप्त मंदिर में जा पा रहे हैं और ना ही कालकाजी मंदिर या महरौली के योगमाया मंदिर में। नई सड़क से बस चंदेक मिनटों में आप रोशनपुरा के चित्रगुप्त मंदिर में पहुंच जाते हैं। इधर कायस्थों के आराध्य चित्रगुप्त जी की मूर्ति है। एक बडा सा शिवाला भी है। इन सब मंदिरों में माथुर परिवार बीच-बीच में आना पसंद करते हैं।

हां, नई सड़क, किनारी बाजार, चहलपुरी, अनार की गली, चौक रायजी, चीराखाना, बीवी गौहर का कूचा वगैरह से बहुत सारे माथुर परिवार दिल्ली-एनसीआर के अलग-अलग एरिया में शिफ्ट कर गए हैं। आई.पी. एक्सटेंशन की श्रीगणेश सोसायटी में दर्जनों माथुर परिवार रहते हैं। लेकिन अपने पुरखों के मोहल्लों-हवेलियों से नाता टूटता थोड़े ही है। वह रिश्ता चित्रगुप्त मंदिर के जरिए बना हुआ है। पर इस सत्यानाशी कोरोना वायरस ने इन्हें अपने तीर्थस्थलों से ही दूर कर दिया है। कालकाजी मंदिर में साल में तीन बार दिल्ली के माथुर रसोई, फिर कढ़ाई और अंत में सावन की खीर के आयोजनों में मिलते हैं। ये सब सौ साल पुरानी परंपराएं हैं।


दिल्ली की माथुर बिरादरी की बात हो और पार्श्वगायक मुकेश और चीरखाना में जनमे गदर पार्टी के संस्थापक और अग्रणी क्रांतिकारी लाला हरदयाल का जिक्र ना हो, यह नहीं हो सकता। मुकेश का परिवार चहलपुरी में रहता था। वे मंदिर मार्ग के एमबी स्कूल में प़ढ़ते थे। वे बंबई जाने के भी बाद भी हर जन्माष्टमी पर दिल्ली में होते थे। यहां पर वे अपने इष्ट मित्रों के साथ नई सड़क में जन्माष्टमी पर लगने वाली झांकियों में जाकर भजन सुनाते थे। मुकेश के घर के बाहर कोई पत्थर वगैरह नहीं लगा हुआ ताकि उनके चाहने वाले कभी इधर आ सकें। लाला हरदयाल के नाम पर हरदयाल लाइब्रेयरी है।

इस बीच, आपने देखा होगा कि एक छोटी सी सड़क हरीशचंद्र माथुर लेन मिलती है कस्तूरबा गांधी मार्ग पर। दिलचस्प है कि इन माथुर साहब को अपने माथुर अपना नहीं मानते। वे तीसरी लोकसभा के राजस्थान से सदस्य थे।

बहरहाल, पुरानी दिल्ली से बहुत सारे माधुर परिवारों ने निकलकर दरियागंज में भी अपने आशियाने बनाए। इधर के सी.डी माथुर और के.एल. माथुर 50 और 60 के दशकों में दिल्ली क्रिकेट के आतिशी बल्लेबाज हुआ करते थे। ये दोनों दरियागंज जिमखाना से खेलते थे। इन दोनों की वजह से ही हिंदू कॉलेज दिल्ली यूनिवर्सिटी की क्रिकेट में सेंट स्टीफंस कॉलेज के अभेद्य किले में सेंध लगा सका। इसी तरह दिल्ली किकेट को दशकों राम प्रकाश मेहरा उर्फ लाटू शाह के साथ एमबीएल माथुर चलाते रहे। गौर करें कि दिल्ली के बहुत से माथुर अपना सरनेम एंडले भी लगाते हैं। इसलिए आपको हर माथुर कुनबे में कुछ एंडले भी मिलेंगे। वैसे माथुर और एंडले दिल्ली की अदालतों में छाए हुए हैं।

18 April 2020

कोरोना से कांप रहे शब्दकोश--साभार नवभारत टाइम्स

कोरोना से कांप रहे शब्दकोश
बालेन्दु दाधीच

दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित शब्दकोशों को अपनी शब्दावली में विशेष अपडेट के लिए बाध्य होना पड़ा है। वजह है- कोरोना वायरस से पैदा हुआ मौजूदा संकट। महामारी ने बहुत सारे नए शब्द पैदा किए हैं। ऐसे ही शब्द जब करीब-करीब हर इंसान के दैनिक जीवन में जगह बना लें तो उन तक पहुंचना शब्दकोशों की पहली जिम्मेदारी बन जाती है। नतीजतन मरियम वेब्स्टर शब्दकोश ने अपने इतिहास का सबसे तेज अपडेट किया है जबकि ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने भी तिमाही अपडेट का इंतजार किए बिना कोरोना वायरस से जुड़े 14 नए शब्द जोड़े हैं।

दिलचस्प यह है कि दोनों के बीच बहुत कम शब्द साझा हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि हिंदी शब्दकोश निर्माता भी जल्दी ही इन हालात की सुध लेंगे। मरियम वेब्स्टर शब्दकोश में शब्दों को तेजी से शामिल किए जाने का यह दूसरा मामला है। पिछली बार ऐसा 1984 में हुआ था जब एड्स की बीमारी ने दुनिया को भयभीत कर दिया था। हालांकि किसी नए शब्द को इस डिक्शनरी में शामिल होने के लिए एक कड़े मापदंड से गुजरना पड़ता है। वह मापदंड है- उस शब्द का करीब एक दशक तक चलन में रहना। लेकिन जब एड्स की महामारी आई तो पूरी दुनिया में उसका बहुत ज्यादा खौफ था और इस सूचना को विश्व स्तर पर फैलाना भी बहुत ज्यादा जरूरी था।

तब पहली बार एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए इस शब्दकोश में एड्स शब्द जोड़ा गया। एड्स यानी एक्वायर्ड इम्यूनो डेफीसियंसी सिंड्रोम। तब तक इस लफ्ज को इस्तेमाल होते हुए दो साल बीत चुके थे। बहरहाल, अब मरियम वेब्स्टर डिक्शनरी ने अपना स्पेशल अपडेट जारी किया है जिसमें कोरोना वायरस की महामारी से जुड़े हुए करीब एक दर्जन शब्द शामिल किए गए हैं। ये शब्द महज 34 दिन के भीतर यहां आ पहुंचे हैं तो जाहिर है कि इनके पीछे छिपी अवधारणाओं की अहमियत को इस शब्दकोश ने मान्यता दी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 11 फरवरी को जिनेवा में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऐसे कुछ शब्दों का जिक्र किया था। इसके अलावा पहले से मौजूद कुछ शब्दों को भी नए संदर्भों और अर्थों के साथ अपडेट किया गया।


नई एन्ट्रीज हैं- कोरोनावायरस डिजीज 2019, कोविड-19, कम्यूनिटी स्प्रेड (सामुदायिक प्रसार), कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग (संपर्क खोज), सोशल डिस्टैंसिंग (सामाजिक अंतराल), सुपर स्प्रैडर (महा-प्रसारक), इंडेक्स केस (प्रथम प्रकरण), इंडेक्स पेशेंट (प्रथम रोगी), पेशेंट जीरो (मूल रोगी) और सेल्फ क्वैरंटीन (निजेकांतवास)। ऑक्सफोर्ड अंग्रेजी शब्दकोश ने मरियम वेब्स्टर के अपनाए शब्दों में से सिर्फ तीन चुने हैं- कोविड 19, सोशल डिस्टैंसिंग और सेल्फ-क्वैरंटीन। बाकी 11 शब्द ये हैं- एल्बो बंप (कोहनी उभार), टु फ्लैटन द कर्व (प्रसार समतलन), इन्फोडेमिक (सूचना-महामारी), पीपीई (निजी सुरक्षा उपकरण), आर0 या आरनॉट (किसी एक संक्रमित से संक्रमण पाने वाले लोगों की औसत संख्या), सेल्फ-आइसोलेट (स्व-पृथकवास या स्वेकांत), शेल्टर इन प्लेस (अपने स्थान में सीमित), सोशल आइसोलेशन (सामाजिक अलगाव) और डब्लूएफएच (वर्क फ्रॉम होम यानी घर से काम)।

अभी कुछ शब्द इन डिक्शनरियों को प्रभावित नहीं कर सके हैं। शायद अगले किसी अपडेट में इनका भी नंबर लगे। ये शब्द हैं- कोवीडियट (कोरोअहमक), कोबीडियंट (कोज्ञापालक), लॉकडाउन (घरबंदी, तालाबंदी, गृहसीमितता या सर्वत्रशून्यता), पैंडेमिक (वैश्विक महामारी), हर्ड इम्यूनिटी (सामूहिक रोग-प्रतिरोधकता), कोरोनियल्स (कोरोपीढ़ी) आदि-आदि। दावेदार शब्द और भी हैं। मिसाल के तौर पर इस पर गौर फरमाइए- पेशेन्ट जीरो (मूल रोगी या शून्यरोगी) जूनोटिक (जंतु-प्रसारित) रोगों का सुपर-स्प्रैडर (महाप्रसारक) बन जाएगा, अगर वह सैनिटाइजेशन (शुद्धिकरण) में नहीं रहेगा और फेस मास्क (मुखपट्टी) का इस्तेमाल नहीं करेगा। ऐसे रोगी अमूमन वेंटिलेटर (सांसयंत्र या श्वसनयंत्र) तक अपनी पहुंच चाहते हैं। कोरो उपसर्ग का प्रयोग करके बने शब्द बड़े अनूठे हैं और अलग पहचान बनाते जा रहे हैं, जैसे- कोवीडियट और कोबीडियंट।

एक मिसाल देखिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से आग्रह किया कि वह कोरोना से लड़ रहे लोगों के प्रति कृतज्ञता जताने के लिए ताली-थाली, शंख वगैरह बजाएं लेकिन बहुत से कोरोअहमक (कोवीडियट) थालियां, शंख, ढोलक और मजीरे आदि लेकर भारी भीड़ के रूप में गलियों में निकल गए। उधर कोज्ञापालकों (कोबीडियंट) की भी कमी नहीं थी। जैसे कचरे से कागज, पॉलीथीन आदि इकट्ठा करने वाला गरीब इंसान, जो ठीक पांच बजे अकेला खड़ा होकर ताली बजा रहा था।

महामारी ने कुछ पुराने शब्दों और पहले से मौजूद शब्दों को भी नई जिंदगी के साथ-साथ नए अर्थ दे दिए हैं। मिसाल के तौर पर लॉकडाउन का इस्तेमाल हड़तालों आदि के दौरान ज्यादा सुनने में आता था। लेकिन आज वह सामाजिक संदर्भ में इस्तेमाल हो रहा है। सोशल डिस्टैंसिंग अब तक उन लोगों के संदर्भ में इस्तेमाल होता था जो समाज से अलग-थलग बने रहते हैं। यह उन लोगों के संदर्भ में भी इस्तेमाल होता था जिन्हें किसी कारण से समाज से अलग-थलग कर दिया गया है। हमारे यहाँ पर बुरी ही सही लेकिन गांव-बाहर, जात-बाहर या हुक्का पानी बंद करने जैसी अवधारणाएं प्रचलित हैं जो इसकी पारंपरिक परिभाषा के दायरे में आती थीं। लेकिन अब सोशल डिस्टैंसिंग एक सकारात्मक संदर्भ में सामने आया है। लोग खुद को सुरक्षित रखने के लिए एक-दूसरे से उचित दूरी बनाकर चल रहे हैं।


क्वारंटाइन शब्द भारतीयों के लिए कुछ हद तक अनसुना सा है। हमारे यहां यह अवधारणा तो प्रचलित रही है (कुष्ठ, चेचक, तपेदिक जैसे रोगों तथा मृत्यु-उपरांत एकांत जैसे संदर्भों में) लेकिन ऐसे शब्द मौजूदा प्रचुरता में शायद ही कभी इस्तेमाल हुए हों। इसी से जुड़ा शब्द है- आइसोलेशन (पृथकवास, अलगाव या पृथक्करण) जो पहले नकारात्मक संदर्भ में इस्तेमाल होता था। लेकिन अभी तो ऐसा लगता है कि कोई आइसोलेशन में है तो समाज पर कितना बड़ा उपकार कर रहा है।

17 April 2020

Pandemic not as deadly as initially projected: PIO doc (Curtsy:The Times of India)

Pandemic not as deadly as initially projected: PIO doc
Chidanand.Rajghatta@timesgroup.com
Washington:
An Indian-American Stanford University professor of medicine has said that the actual death rate from the coronavirus pandemic is “likely orders of magnitude lower than the initial estimates”, the observation coming amid widespread resentment in right-wing circles that matter was exaggerated by those intent on damaging the US economy and undermining the Trump presidency.

While not touching on the political or ideological aspects of the issue, Dr Jay Bhattacharya, who is also the director of the Program on Medical Outcomes at Stanford University, told Fox News on Tuesday that the coronavirus, albeit dangerous because of the speed of transmission and lack of vaccine, isn’t as deadly as was initially projected.

Curtsy:The Times of India,New Delhi-16/04/20,Page-09

“Per case, I don’t think it’s as deadly as people thought,” Bhattacharya told Fox News host Tucker Carlson. “The WHO put an estimate out that was, I think, initially 3.4%. It’s very unlikely it is anywhere near that. It’s much likely, much closer to the death rate that you see from the flu per case.”

Bhattacharya and his colleague Dr Eran Bendavid, who is also an associate professor of medicine at Stanford and a core faculty member in the Center for Health Policy, maintained in a Wall Street Journal op-ed that initial morality estimates from the coronavirus were “deeply flawed and the way to find the true death rate would be to look at fatalities as a percentage of people who have been infected with the new coronavirus — not just those who are tested and become confirmed cases. If the number of people infected with the virus is much larger than the number of confirmed cases, projections of fatalities would drop substantially.

The WHO, too, has acknowledged more recently that Covid-19 death rate is between 3% and 4% of reported cases, and if the death rate as a percentage of infections is considered (rather than just reported or confirmed cases), it would be lower.

Link of Full report on www.toi.in



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14 June 2019

आम व खास की खाई चौड़ी करती अर्बन प्लानिंग-माशा

हाल ही मुंबई में डॉ. पायल तड़वी की मौत के बाद किसी ने टिप्पणी की कि शहरों में दलित-आदिवासी बसते तो हैं, लेकिन उनके बाशिंदे नहीं बन पाते। वहां दलित-सवर्ण खाई साफ नजर आती है। वैसे, यह खाई अमीर-गरीब के बीच भी दिखती है। दुनिया के हर कोने में। अब अर्बन प्लानिंग ही इस तरह की जा रही है कि यह अलगाव अधिकाधिक स्पष्ट होता जाता है। पिछले महीने लंदन के ‘इंडिपेंडेंट’ अखबार में खबर थी कि लंदन में रियल एस्टेट डिवेलपर्स एक ही सोसायटी में अमीर और गरीब निवासियों के साथ भेदभाव करते हैं। हाउसिंग सोसायटी को दो खंडों में बनाया जाता है- लग्जरी होम्स और सोशल हाउसिंग। लग्जरी होम्स वाले सेक्शन में बगीचे और खेल के मैदान भी होते हैं। व्यवस्था यह होती है कि उनमें दूसरे सेक्शन वाले लोग नहीं जा सकते। सोशल हाउसिंग वाले सेक्शन के लिए अलग से छोटा गेट बनाया जाता है। 

ये खास तरह का सेग्रगेशन यानी अलगाव दुनिया के हर देश की सचाई है। सत्तर के दशक में अमेरिकी शहरों में गेटेड सोसायटी की शुरुआत हुई तो अमीर-गरीब वर्गों के बीच का फर्क दिखाई देने लगा। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के दौर में श्वेत-अश्वेत लोग अलग-अलग हिस्सों में रहते थे। ग्लासगो विश्वविद्यालय (यूके) में रिसर्च असोसिएट बिल्ज सेरिन का शोध बताता है कि शहरी स्पेस में अमीर-गरीब का और जातियों का विभाजन तेजी से बढ़ रहा है। सार्वजनिक सुविधाएं और सेवाएं भी अमीर-गरीब के हिसाब से तय की जा रही हैं। हमारा देश भी इस रवैये से अलग नहीं है। दिल्ली से सटे गुड़गांव की हाउसिंग सोसायटियों में काम करने वाली बाइयों को लिफ्ट वगैरह के इस्तेमाल की इजाजत नहीं है।

दुनिया के हर देश के बड़े शहरों में ऐसी गेटेड सोसायटी मौजूद हैं। यहां दुनिया भर के ऐशो आराम हैं। बस, उनकी कीमत चुकानी होती है। वियतनाम की राजधानी हनोई में इलीट सोसायटी में रहवासियों के लिए शुद्ध हवा, टेनिस गार्डन, ब्यूटी सैलून, पोस्ट ऑफिस सब कुछ है। कनाडा के टोरंटो में विदेशी निवेशकों को आलीशान कॉन्डो मतलब फैंसी अपार्टमेंट खरीदने का मौका मिल रहा है। नाइजीरिया के लागोस में समुद्र को पाटकर प्राइवेट सिटी इको एटलांटिक प्रॉजेक्ट बनाया जा रहा है।

ऐसे लग्जरी अपार्टमेंट्स ने बुनियादी सुविधाओं को कमोडिटी बनाने का काम किया है। साफ हवा, शुद्ध पानी, साफ-सफाई आदि के लिए किसी को पैसे देने पड़ें तो जिनके पास पैसे नहीं हैं, उनका क्या होगा/ होगा यही कि वे बुनियादी सुविधाओं से वंचित होते जाएंगे। लग्जरी अपार्टमेंट्स और सोसायटी के ट्रेंड ने ऐसा ही किया है। इसने प्रशासन की जवाबदेही कम की है और लोगों के कहीं भी बसने के अधिकार का उल्लंघन किया है। हर इनसान को यह हक है कि वह अपने देश के किसी भी कोने में बस सकता है। उसकी बुनियादी जरूरतें पूरी करने की जिम्मेदारी प्रशासन की है। यह प्रवृत्ति उनका यह हक छीन रही है।

अस्सी के दशक में मुंबई की पत्रकार ओल्गा टेलिस ने बॉम्बे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (बीएमसी) के खिलाफ एक मामला दायर किया कि वह बारिश के मौसम में फुटपाथ पर रहने वालों को वहां से खदेड़ रही है। ओल्गा का कहना था कि लोग बड़े शहरों में रोजगार की तलाश में आते हैं। यह सरकार की आर्थिक नीतियों की विफलता है कि उन्हें अपने इलाकों में रोजगार उपलब्ध नहीं हो पाता और बड़े शहरों में आना पड़ता है। 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने ओल्गा की याचिका मंजूर की और कहा कि लोगों को वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराए बिना, उनके मौजूदा घरों को तोड़ने या उन्हें किसी इलाके से खदेड़ने का अधिकार प्रशासन को नहीं है।

सेग्रगेशन प्रक्रिया में हालांकि किसी को जबरन खदेड़ा नहीं जाता, लेकिन धीरे-धीरे बुनियादी सुविधाओं से बेदखल कर दिया जाता है। नतीजा वही होता है। शहर की आबादी के एक हिस्से की कीमत पर दूसरा हिस्सा चमकता है और उसे हम शहरी विकास का नाम देते हैं।

-साभार -नवभारत टाइम्स-13/जून/2019- 

01 June 2019

लाइन में रहते थे मगर साथ-साथ-विजय गोयल

कुछ लोग कहते हैं कि टाइम नहीं है, इसलिए ऑनलाइन सामान मंगवाते हैं। मैं कहता हूं, घर से बाहर ही नहीं निकलोगे तो समाज को क्या जानोगे! ऑनलाइन शॉपिंग ने आज लोगों को अपने तक सिमटाकर रख दिया है 

ऑनलाइन शॉपिंग बेहद सुविधाजनक है। बस आपको घर बैठे-बैठे फोन पर उंगलियां घुमानी हैं। अगले ही दिन सामान आ जाएगा। आपको सामान पसंद नहीं आए तो आप उसे बिना अपना नुकसान किए वापस भी कर सकते हैं। अब शायद ही ऐसी कोई चीज है, जिसे घर बैठे आप मंगवा न सकते हों। आप ऑर्डर करें और सामान आने के बाद उसके पैसे दें। इस व्यापार में कहीं कोई बड़ी धांधली भी नहीं है। ऑनलाइन शॉपिंग के जमाने में, यानी आजकल कपल्स के लिए ‘वी टाइम’ यानी दोनों को अकेले में बतियाने के लिए समय निकालना बहुत मुश्किल है। पूरा दिन काम में निकल जाता है। शाम को घर पहुंचकर हम टीवी देखते हैं और सो जाते हैं। ऐसे में अगर शॉपिंग भी लैपटॉप या मोबाइल से होगी तो आपस में जान-पहचान कब होगी/ 

किसी जमाने में जरूरत की हर चीज लेने के लिए अलग-अलग लाइनें लगती थीं और आदमी घंटों कतार में खड़ा रहता था। मुझे याद है, जब दिल्ली मिल्क स्कीम की बोतलें आती थीं, तब हम उसे लेने के लिए सवेरे-सवेरे लाइनों में लगते ताकि स्कूल जाने के समय से पहले ही दूध घर में आ जाए। सभी भाइयों को अलग-अलग दिन लाइनों में लगना होता था। कई बार तो हम थैले में पत्थर रखकर लाइन में लगा आते थे। भैंस का दूध लेने के लिए भी लाइन लगती थी। हम हर समय अपनी आंखें बाल्टी में गड़ाए रहते थे क्योंकि देखना चाहते थे कि दूधवाला कब दूध में पानी मिलाता है। वह भैंस के थन धोता तो भी हमें लगता कि कहीं वह पानी तो नहीं मिला रहा। पर उसको हमारी इन हरकतों पर कभी गुस्सा नहीं आता था। 

मिट्टी के तेल की लाइन तो बहुत ही मशहूर थी। उस समय मिट्टी के तेल से स्टोव जलाया जाता था और मिट्टी का तेल तब राशन में मिला करता था। मिट्टी का तेल पा लेने का मतलब था बहुत बड़ी उपलब्धि प्राप्त करना। स्टोव से पहले अंगीठी पर खाना बना करता था तो घर में कोयला और लकड़ी दोनों आती थी। कोयले की भी लाइन हुआ करती थी। पुराने अखबार और कागजों को जला कर अंगीठी सवेरे-सवेरे जलाते थे। जब तक वह बुझ न जाए, तब तक मां की कोशिश रहती थी कि उस पर एक-एक भगोना नहाने के लिए पानी भी गर्म हो जाए और स्कूल जाने से पहले बच्चों के लिए खाना भी बन जाए। सारे घर में इस अंगीठी का धुआं ही धुआं हो जाता था।

राशन की दुकान पर तो सबसे ज्यादा लाइनें थी। हम पांच भाई-बहन थे। कोई एक लाइन में लगता तो कोई दूसरी लाइन में लगता। दिक्कत तो उनको थी, जिनके घर बच्चे नहीं थे। उन्हें चारों तरफ खुद भागना पड़ता था। उन दिनों नौकर भी नहीं हुआ करते थे और खर्चा भी बड़े संयम से किया जाता था। आजकल के बच्चों को यह जानकर बड़ा ताज्जुब होगा कि टेलीफोन, बिजली और पानी के बिल जमा करने के लिए भी लाइनें थीं। सुपर बाजार में सामान खरीदने के लिए भी लाइनें थीं और बसों के लिए भी। 

पिछले दिनों मैंने किसी से पूछा कि अब बस की लाइनें नहीं लगती हैं क्या, तो उसने तपाक से कहा, बसें ही अब कहां हैं जो लाइनें लगेंगी। आपको याद होगा कि घरों में गेहूं को खुद ही साफ करके चक्की पर पिसवाने ले जाया करते थे। हम खुद पीपा उठाकर चक्की तक जाते थे और वहां पर भी लाइन लगी होती थी। वहां देखते थे कि कहीं हमारे बढ़िया गेहूं से पिसते आटे में उसने अपना आटा तो नहीं मिला दिया, या आटा कम तो नहीं दिया/ 

तब लोग खूब मोल-भाव करके खरीदारी करते थे। महिलाएं सब्जी खरीदते हुए जब तक मुफ्त में धनिया और मिर्च न डलवा लें, तब तक उन्हें संतोष नहीं होता था। ये लाइनें बड़ा संयम सिखाती थीं। गर्मी-सर्दी का कोई असर न था। पता नहीं, अब लाइनों का वह समय कहां जा रहा है। ऐसा तो नहीं लगता कि इन लाइनों का समय बचा कर हम बहुत बड़े तीर मार रहे हों। बाहर की लाइनें तो खत्म हुई, पर मन के भीतर की लाइनें लंबी हैं। 

हमारी चाहतें बहुत बढ़ गई हैं लेकिन मन अशांत है। तब लंबी-लंबी कतारों के बावजूद तन और मन दोनों शांत थे। आज ऑनलाइन ने अड़ोस-पड़ोस तो खत्म कर ही दिया है, रिश्तेदारी भी खत्म कर दी। खुद वस्तुएं देखकर खरीदने का जो सुख था, वह भी खत्म हो गया। ऐसा लगता है कि लेने के लिए चीजें ली जा रही हैं, चाहे उनकी जरूरत भी न हो। मुझे याद है कि पहले पूरा परिवार मिलकर शॉपिंग करने जाता था। पर अब कोई भी अपने बंद कमरे में बैठकर किसी भी चीज का ऑनलाइन ऑर्डर कर देता है, घर में किसी दूसरे को पता भी नहीं चलता। आप मोबाइल पर ऑनलाइन काम कर रहे हैं। आपको कोई चीज दिखाई देती है, आपको जरूरत न हो तो भी आप बटन दबाकर उस चीज का ऑर्डर कर देते हैं। 

तब जिंदगी अच्छी-खासी लाइन में गुजर जाती थी, पर कतारों के भी बड़े फायदे थे। इसमें खड़े-खड़े दुनिया भर की बातें होती थीं। पता चल जाता था कि पास-पड़ोस में क्या चल रहा है। एक तरह से इन लाइनों के कारण समाज में सब जुड़े हुए थे। इन्हीं लाइनों में तकरारें, झगड़े भी हो जाते थे, पर उनमें भी एक मिठास थी। और इन्हीं लाइनों में प्रेम-मोहब्बत के किस्से भी हो जाते थे। आज सारा देश, खास तौर से नई पीढ़ी ऑनलाइन की लाइन में लग गई है। लेकिन ऑनलाइन शॉपिंग ने इंसान को इंसान से काट दिया है। कुछ लोग कहते हैं कि टाइम नहीं है, इसलिए ऑनलाइन सामान मंगवाते हैं। पर मैं कहता हूं कि घर से बाहर ही नहीं निकलोगे तो समाज को क्या जानोगे, देश की समस्याओं को क्या पहचानोगे! 

(लेखकराज्यसभा सांसद हैं)

साभार -नवभारत टाइम्स-01/06/2019 

23 March 2019

मैं नास्तिक क्यों हूँ?............भगत सिंह

यह लेख भगत सिंह ने जेल में रहते हुए लिखा था और यह 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार “ द पीपल “ में प्रकाशित हुआ । इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण , मनुष्य के जन्म , मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ साथ संसार में मनुष्य की दीनता , उसके शोषण , दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है । यह भगत सिंह के लेखन के सबसे चर्चित हिस्सों में रहा है।
स्वतन्त्रता सेनानी बाबा रणधीर सिंह 1930-31के बीच लाहौर के सेन्ट्रल जेल में कैद थे। वे एक धार्मिक व्यक्ति थे जिन्हें यह जान कर बहुत कष्ट हुआ कि भगतसिंह का ईश्वर पर विश्वास नहीं है। वे किसी तरह भगत सिंह की कालकोठरी में पहुँचने में सफल हुए और उन्हें ईश्वर के अस्तित्व पर यकीन दिलाने की कोशिश की। असफल होने पर बाबा ने नाराज होकर कहा, “प्रसिद्धि से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है और तुम अहंकारी बन गए हो जो कि एक काले पर्दे के तरह तुम्हारे और ईश्वर के बीच खड़ी है। इस टिप्पणी के जवाब में ही भगतसिंह ने यह लेख लिखा।

एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। क्या मैं किसी अहंकार के कारण सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी तथा सर्वज्ञानी ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करता हूँ? मेरे कुछ दोस्त – शायद ऐसा कहकर मैं उन पर बहुत अधिकार नहीं जमा रहा हूँ – मेरे साथ अपने थोड़े से सम्पर्क में इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये उत्सुक हैं कि मैं ईश्वर के अस्तित्व को नकार कर कुछ ज़रूरत से ज़्यादा आगे जा रहा हूँ और मेरे घमण्ड ने कुछ हद तक मुझे इस अविश्वास के लिये उकसाया है। मैं ऐसी कोई शेखी नहीं बघारता कि मैं मानवीय कमज़ोरियों से बहुत ऊपर हूँ। मैं एक मनुष्य हूँ, और इससे अधिक कुछ नहीं। कोई भी इससे अधिक होने का दावा नहीं कर सकता। यह कमज़ोरी मेरे अन्दर भी है। अहंकार भी मेरे स्वभाव का अंग है। अपने कामरेडो के बीच मुझे निरंकुश कहा जाता था। यहाँ तक कि मेरे दोस्त श्री बटुकेश्वर कुमार दत्त भी मुझे कभी-कभी ऐसा कहते थे। कई मौकों पर स्वेच्छाचारी कह मेरी निन्दा भी की गयी। कुछ दोस्तों को शिकायत है, और गम्भीर रूप से है कि मैं अनचाहे ही अपने विचार, उन पर थोपता हूँ और अपने प्रस्तावों को मनवा लेता हूँ। यह बात कुछ हद तक सही है। इससे मैं इनकार नहीं करता। इसे अहंकार कहा जा सकता है। जहाँ तक अन्य प्रचलित मतों के मुकाबले हमारे अपने मत का सवाल है। मुझे निश्चय ही अपने मत पर गर्व है। लेकिन यह व्यक्तिगत नहीं है। ऐसा हो सकता है कि यह केवल अपने विश्वास के प्रति न्यायोचित गर्व हो और इसको घमण्ड नहीं कहा जा सकता। घमण्ड तो स्वयं के प्रति अनुचित गर्व की अधिकता है। क्या यह अनुचित गर्व है, जो मुझे नास्तिकता की ओर ले गया? अथवा इस विषय का खूब सावधानी से अध्ययन करने और उस पर खूब विचार करने के बाद मैंने ईश्वर पर अविश्वास किया?
मैं यह समझने में पूरी तरह से असफल रहा हूँ कि अनुचित गर्व या वृथाभिमान किस तरह किसी व्यक्ति के ईश्वर में विश्वास करने के रास्ते में रोड़ा बन सकता है? किसी वास्तव में महान व्यक्ति की महानता को मैं मान्यता न दूँ – यह तभी हो सकता है, जब मुझे भी थोड़ा ऐसा यश प्राप्त हो गया हो जिसके या तो मैं योग्य नहीं हूँ या मेरे अन्दर वे गुण नहीं हैं, जो इसके लिये आवश्यक हैं। यहाँ तक तो समझ में आता है। लेकिन यह कैसे हो सकता है कि एक व्यक्ति, जो ईश्वर में विश्वास रखता हो, सहसा अपने व्यक्तिगत अहंकार के कारण उसमें विश्वास करना बन्द कर दे? दो ही रास्ते सम्भव हैं। या तो मनुष्य अपने को ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी समझने लगे या वह स्वयं को ही ईश्वर मानना शुरू कर दे। इन दोनो ही अवस्थाओं में वह सच्चा नास्तिक नहीं बन सकता। पहली अवस्था में तो वह अपने प्रतिद्वन्द्वी के अस्तित्व को नकारता ही नहीं है। दूसरी अवस्था में भी वह एक ऐसी चेतना के अस्तित्व को मानता है, जो पर्दे के पीछे से प्रकृति की सभी गतिविधियों का संचालन करती है। मैं तो उस सर्वशक्तिमान परम आत्मा के अस्तित्व से ही इनकार करता हूँ। यह अहंकार नहीं है, जिसने मुझे नास्तिकता के सिद्धान्त को ग्रहण करने के लिये प्रेरित किया। मैं न तो एक प्रतिद्वन्द्वी हूँ, न ही एक अवतार और न ही स्वयं परमात्मा। इस अभियोग को अस्वीकार करने के लिये आइए तथ्यों पर गौर करें। मेरे इन दोस्तों के अनुसार, दिल्ली बम केस और लाहौर षडयन्त्र केस के दौरान मुझे जो अनावश्यक यश मिला, शायद उस कारण मैं वृथाभिमानी हो गया हूँ।
मेरा नास्तिकतावाद कोई अभी हाल की उत्पत्ति नहीं है। मैंने तो ईश्वर पर विश्वास करना तब छोड़ दिया था, जब मैं एक अप्रसिद्ध नौजवान था। कम से कम एक कालेज का विद्यार्थी तो ऐसे किसी अनुचित अहंकार को नहीं पाल-पोस सकता, जो उसे नास्तिकता की ओर ले जाये। यद्यपि मैं कुछ अध्यापकों का चहेता था तथा कुछ अन्य को मैं अच्छा नहीं लगता था। पर मैं कभी भी बहुत मेहनती अथवा पढ़ाकू विद्यार्थी नहीं रहा। अहंकार जैसी भावना में फँसने का कोई मौका ही न मिल सका। मैं तो एक बहुत लज्जालु स्वभाव का लड़का था, जिसकी भविष्य के बारे में कुछ निराशावादी प्रकृति थी। मेरे बाबा, जिनके प्रभाव में मैं बड़ा हुआ, एक रूढ़िवादी आर्य समाजी हैं। एक आर्य समाजी और कुछ भी हो, नास्तिक नहीं होता। अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद मैंने डी0 ए0 वी0 स्कूल, लाहौर में प्रवेश लिया और पूरे एक साल उसके छात्रावास में रहा। वहाँ सुबह और शाम की प्रार्थना के अतिरिक्त में घण्टों गायत्री मंत्र जपा करता था। उन दिनों मैं पूरा भक्त था। बाद में मैंने अपने पिता के साथ रहना शुरू किया। जहाँ तक धार्मिक रूढ़िवादिता का प्रश्न है, वह एक उदारवादी व्यक्ति हैं। उन्हीं की शिक्षा से मुझे स्वतन्त्रता के ध्येय के लिये अपने जीवन को समर्पित करने की प्रेरणा मिली। किन्तु वे नास्तिक नहीं हैं। उनका ईश्वर में दृढ़ विश्वास है। वे मुझे प्रतिदिन पूजा-प्रार्थना के लिये प्रोत्साहित करते रहते थे। इस प्रकार से मेरा पालन-पोषण हुआ। असहयोग आन्दोलन के दिनों में राष्ट्रीय कालेज में प्रवेश लिया। यहाँ आकर ही मैंने सारी धार्मिक समस्याओं – यहाँ तक कि ईश्वर के अस्तित्व के बारे में उदारतापूर्वक सोचना, विचारना तथा उसकी आलोचना करना शुरू किया। पर अभी भी मैं पक्का आस्तिक था। उस समय तक मैं अपने लम्बे बाल रखता था। यद्यपि मुझे कभी-भी सिक्ख या अन्य धर्मों की पौराणिकता और सिद्धान्तों में विश्वास न हो सका था। किन्तु मेरी ईश्वर के अस्तित्व में दृढ़ निष्ठा थी। बाद में मैं क्रान्तिकारी पार्टी से जुड़ा। वहाँ जिस पहले नेता से मेरा सम्पर्क हुआ वे तो पक्का विश्वास न होते हुए भी ईश्वर के अस्तित्व को नकारने का साहस ही नहीं कर सकते थे। ईश्वर के बारे में मेरे हठ पूर्वक पूछते रहने पर वे कहते, ‘'जब इच्छा हो, तब पूजा कर लिया करो।'’ यह नास्तिकता है, जिसमें साहस का अभाव है। दूसरे नेता, जिनके मैं सम्पर्क में आया, पक्के श्रद्धालु आदरणीय कामरेड शचीन्द्र नाथ सान्याल आजकल काकोरी षडयन्त्र केस के सिलसिले में आजीवन कारवास भोग रहे हैं। उनकी पुस्तक ‘बन्दी जीवन’ ईश्वर की महिमा का ज़ोर-शोर से गान है। उन्होंने उसमें ईश्वर के ऊपर प्रशंसा के पुष्प रहस्यात्मक वेदान्त के कारण बरसाये हैं। 28 जनवरी, 1925 को पूरे भारत में जो ‘दि रिवोल्यूशनरी’ (क्रान्तिकारी) पर्चा बाँटा गया था, वह उन्हीं के बौद्धिक श्रम का परिणाम है। उसमें सर्वशक्तिमान और उसकी लीला एवं कार्यों की प्रशंसा की गयी है। मेरा ईश्वर के प्रति अविश्वास का भाव क्रान्तिकारी दल में भी प्रस्फुटित नहीं हुआ था। काकोरी के सभी चार शहीदों ने अपने अन्तिम दिन भजन-प्रार्थना में गुजारे थे। राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ एक रूढ़िवादी आर्य समाजी थे। समाजवाद तथा साम्यवाद में अपने वृहद अध्ययन के बावजूद राजेन लाहड़ी उपनिषद एवं गीता के श्लोकों के उच्चारण की अपनी अभिलाषा को दबा न सके। मैंने उन सब मे सिर्फ एक ही व्यक्ति को देखा, जो कभी प्रार्थना नहीं करता था और कहता था, ‘'दर्शन शास्त्र मनुष्य की दुर्बलता अथवा ज्ञान के सीमित होने के कारण उत्पन्न होता है। वह भी आजीवन निर्वासन की सजा भोग रहा है। परन्तु उसने भी ईश्वर के अस्तित्व को नकारने की कभी हिम्मत नहीं की।
इस समय तक मैं केवल एक रोमान्टिक आदर्शवादी क्रान्तिकारी था। अब तक हम दूसरों का अनुसरण करते थे। अब अपने कन्धों पर ज़िम्मेदारी उठाने का समय आया था। यह मेरे क्रान्तिकारी जीवन का एक निर्णायक बिन्दु था। ‘अध्ययन’ की पुकार मेरे मन के गलियारों में गूँज रही थी – विरोधियों द्वारा रखे गये तर्कों का सामना करने योग्य बनने के लिये अध्ययन करो। अपने मत के पक्ष में तर्क देने के लिये सक्षम होने के वास्ते पढ़ो। मैंने पढ़ना शुरू कर दिया। इससे मेरे पुराने विचार व विश्वास अद्भुत रूप से परिष्कृत हुए। रोमांस की जगह गम्भीर विचारों ने ली ली। न और अधिक रहस्यवाद, न ही अन्धविश्वास। यथार्थवाद हमारा आधार बना। मुझे विश्वक्रान्ति के अनेक आदर्शों के बारे में पढ़ने का खूब मौका मिला। मैंने अराजकतावादी नेता बाकुनिन को पढ़ा, कुछ साम्यवाद के पिता माक्र्स को, किन्तु अधिक लेनिन, त्रात्स्की, व अन्य लोगों को पढ़ा, जो अपने देश में सफलतापूर्वक क्रान्ति लाये थे। ये सभी नास्तिक थे। बाद में मुझे निरलम्ब स्वामी की पुस्तक ‘सहज ज्ञान’ मिली। इसमें रहस्यवादी नास्तिकता थी। 1926 के अन्त तक मुझे इस बात का विश्वास हो गया कि एक सर्वशक्तिमान परम आत्मा की बात, जिसने ब्रह्माण्ड का सृजन, दिग्दर्शन और संचालन किया, एक कोरी बकवास है। मैंने अपने इस अविश्वास को प्रदर्शित किया। मैंने इस विषय पर अपने दोस्तों से बहस की। मैं एक घोषित नास्तिक हो चुका था।
मई 1927 में मैं लाहौर में गिरफ़्तार हुआ। रेलवे पुलिस हवालात में मुझे एक महीना काटना पड़ा। पुलिस अफ़सरों ने मुझे बताया कि मैं लखनऊ में था, जब वहाँ काकोरी दल का मुकदमा चल रहा था, कि मैंने उन्हें छुड़ाने की किसी योजना पर बात की थी, कि उनकी सहमति पाने के बाद हमने कुछ बम प्राप्त किये थे, कि 1927 में दशहरा के अवसर पर उन बमों में से एक परीक्षण के लिये भीड़ पर फेंका गया, कि यदि मैं क्रान्तिकारी दल की गतिविधियों पर प्रकाश डालने वाला एक वक्तव्य दे दूँ, तो मुझे गिरफ़्तार नहीं किया जायेगा और इसके विपरीत मुझे अदालत में मुखबिर की तरह पेश किये बेगैर रिहा कर दिया जायेगा और इनाम दिया जायेगा। मैं इस प्रस्ताव पर हँसा। यह सब बेकार की बात थी। हम लोगों की भाँति विचार रखने वाले अपनी निर्दोष जनता पर बम नहीं फेंका करते। एक दिन सुबह सी0 आई0 डी0 के वरिष्ठ अधीक्षक श्री न्यूमन ने कहा कि यदि मैंने वैसा वक्तव्य नहीं दिया, तो मुझ पर काकोरी केस से सम्बन्धित विद्रोह छेड़ने के षडयन्त्र तथा दशहरा उपद्रव में क्रूर हत्याओं के लिये मुकदमा चलाने पर बाध्य होंगे और कि उनके पास मुझे सजा दिलाने व फाँसी पर लटकवाने के लिये उचित प्रमाण हैं। उसी दिन से कुछ पुलिस अफ़सरों ने मुझे नियम से दोनो समय ईश्वर की स्तुति करने के लिये फुसलाना शुरू किया। पर अब मैं एक नास्तिक था। मैं स्वयं के लिये यह बात तय करना चाहता था कि क्या शान्ति और आनन्द के दिनों में ही मैं नास्तिक होने का दम्भ भरता हूँ या ऐसे कठिन समय में भी मैं उन सिद्धान्तों पर अडिग रह सकता हूँ। बहुत सोचने के बाद मैंने निश्चय किया कि किसी भी तरह ईश्वर पर विश्वास तथा प्रार्थना मैं नहीं कर सकता। नहीं, मैंने एक क्षण के लिये भी नहीं की। यही असली परीक्षण था और मैं सफल रहा। अब मैं एक पक्का अविश्वासी था और तब से लगातार हूँ। इस परीक्षण पर खरा उतरना आसान काम न था। ‘विश्वास’ कष्टों को हलका कर देता है। यहाँ तक कि उन्हें सुखकर बना सकता है। ईश्वर में मनुष्य को अत्यधिक सान्त्वना देने वाला एक आधार मिल सकता है। उसके बिना मनुष्य को अपने ऊपर निर्भर करना पड़ता है। तूफ़ान और झंझावात के बीच अपने पाँवों पर खड़ा रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है। परीक्षा की इन घड़ियों में अहंकार यदि है, तो भाप बन कर उड़ जाता है और मनुष्य अपने विश्वास को ठुकराने का साहस नहीं कर पाता। यदि ऐसा करता है, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उसके पास सिर्फ़ अहंकार नहीं वरन् कोई अन्य शक्ति है। आज बिलकुल वैसी ही स्थिति है। निर्णय का पूरा-पूरा पता है। एक सप्ताह के अन्दर ही यह घोषित हो जायेगा कि मैं अपना जीवन एक ध्येय पर न्योछावर करने जा रहा हूँ। इस विचार के अतिरिक्त और क्या सान्त्वना हो सकती है? ईश्वर में विश्वास रखने वाला हिन्दू पुनर्जन्म पर राजा होने की आशा कर सकता है। एक मुसलमान या ईसाई स्वर्ग में व्याप्त समृद्धि के आनन्द की तथा अपने कष्टों और बलिदान के लिये पुरस्कार की कल्पना कर सकता है। किन्तु मैं क्या आशा करूँ? मैं जानता हूँ कि जिस क्षण रस्सी का फ़न्दा मेरी गर्दन पर लगेगा और मेरे पैरों के नीचे से तख़्ता हटेगा, वह पूर्ण विराम होगा – वह अन्तिम क्षण होगा। मैं या मेरी आत्मा सब वहीं समाप्त हो जायेगी। आगे कुछ न रहेगा। एक छोटी सी जूझती हुई ज़िन्दगी, जिसकी कोई ऐसी गौरवशाली परिणति नहीं है, अपने में स्वयं एक पुरस्कार होगी – यदि मुझमें इस दृष्टि से देखने का साहस हो। बिना किसी स्वार्थ के यहाँ या यहाँ के बाद पुरस्कार की इच्छा के बिना, मैंने अनासक्त भाव से अपने जीवन को स्वतन्त्रता के ध्येय पर समर्पित कर दिया है, क्योंकि मैं और कुछ कर ही नहीं सकता था। जिस दिन हमें इस मनोवृत्ति के बहुत-से पुरुष और महिलाएँ मिल जायेंगे, जो अपने जीवन को मनुष्य की सेवा और पीड़ित मानवता के उद्धार के अतिरिक्त कहीं समर्पित कर ही नहीं सकते, उसी दिन मुक्ति के युग का शुभारम्भ होगा। वे शोषकों, उत्पीड़कों और अत्याचारियों को चुनौती देने के लिये उत्प्रेरित होंगे। इस लिये नहीं कि उन्हें राजा बनना है या कोई अन्य पुरस्कार प्राप्त करना है यहाँ या अगले जन्म में या मृत्योपरान्त स्वर्ग में। उन्हें तो मानवता की गर्दन से दासता का जुआ उतार फेंकने और मुक्ति एवं शान्ति स्थापित करने के लिये इस मार्ग को अपनाना होगा। क्या वे उस रास्ते पर चलेंगे जो उनके अपने लिये ख़तरनाक किन्तु उनकी महान आत्मा के लिये एक मात्र कल्पनीय रास्ता है। क्या इस महान ध्येय के प्रति उनके गर्व को अहंकार कहकर उसका गलत अर्थ लगाया जायेगा? कौन इस प्रकार के घृणित विशेषण बोलने का साहस करेगा? या तो वह मूर्ख है या धूर्त। हमें चाहिए कि उसे क्षमा कर दें, क्योंकि वह उस हृदय में उद्वेलित उच्च विचारों, भावनाओं, आवेगों तथा उनकी गहराई को महसूस नहीं कर सकता। उसका हृदय मांस के एक टुकड़े की तरह मृत है। उसकी आँखों पर अन्य स्वार्थों के प्रेतों की छाया पड़ने से वे कमज़ोर हो गयी हैं। स्वयं पर भरोसा रखने के गुण को सदैव अहंकार की संज्ञा दी जा सकती है। यह दुखपूर्ण और कष्टप्रद है, पर चारा ही क्या है?
आलोचना और स्वतन्त्र विचार एक क्रान्तिकारी के दोनो अनिवार्य गुण हैं। क्योंकि हमारे पूर्वजों ने किसी परम आत्मा के प्रति विश्वास बना लिया था। अतः कोई भी व्यक्ति जो उस विश्वास को सत्यता या उस परम आत्मा के अस्तित्व को ही चुनौती दे, उसको विधर्मी, विश्वासघाती कहा जायेगा। यदि उसके तर्क इतने अकाट्य हैं कि उनका खण्डन वितर्क द्वारा नहीं हो सकता और उसकी आस्था इतनी प्रबल है कि उसे ईश्वर के प्रकोप से होने वाली विपत्तियों का भय दिखा कर दबाया नहीं जा सकता तो उसकी यह कह कर निन्दा की जायेगी कि वह वृथाभिमानी है। यह मेरा अहंकार नहीं था, जो मुझे नास्तिकता की ओर ले गया। मेरे तर्क का तरीका संतोषप्रद सिद्ध होता है या नहीं इसका निर्णय मेरे पाठकों को करना है, मुझे नहीं। मैं जानता हूँ कि ईश्वर पर विश्वास ने आज मेरा जीवन आसान और मेरा बोझ हलका कर दिया होता। उस पर मेरे अविश्वास ने सारे वातावरण को अत्यन्त शुष्क बना दिया है। थोड़ा-सा रहस्यवाद इसे कवित्वमय बना सकता है। किन्तु मेरे भाग्य को किसी उन्माद का सहारा नहीं चाहिए। मैं यथार्थवादी हूँ। मैं अन्तः प्रकृति पर विवेक की सहायता से विजय चाहता हूँ। इस ध्येय में मैं सदैव सफल नहीं हुआ हूँ। प्रयास करना मनुष्य का कर्तव्य है। सफलता तो संयोग तथा वातावरण पर निर्भर है। कोई भी मनुष्य, जिसमें तनिक भी विवेक शक्ति है, वह अपने वातावरण को तार्किक रूप से समझना चाहेगा। जहाँ सीधा प्रमाण नहीं है, वहाँ दर्शन शास्त्र का महत्व है। जब हमारे पूर्वजों ने फुरसत के समय विश्व के रहस्य को, इसके भूत, वर्तमान एवं भविष्य को, इसके क्यों और कहाँ से को समझने का प्रयास किया तो सीधे परिणामों के कठिन अभाव में हर व्यक्ति ने इन प्रश्नों को अपने ढ़ंग से हल किया। यही कारण है कि विभिन्न धार्मिक मतों में हमको इतना अन्तर मिलता है, जो कभी-कभी वैमनस्य तथा झगड़े का रूप ले लेता है। न केवल पूर्व और पश्चिम के दर्शनों में मतभेद है, बल्कि प्रत्येक गोलार्ध के अपने विभिन्न मतों में आपस में अन्तर है। पूर्व के धर्मों में, इस्लाम तथा हिन्दू धर्म में ज़रा भी अनुरूपता नहीं है। भारत में ही बौद्ध तथा जैन धर्म उस ब्राह्मणवाद से बहुत अलग है, जिसमें स्वयं आर्यसमाज व सनातन धर्म जैसे विरोधी मत पाये जाते हैं। पुराने समय का एक स्वतन्त्र विचारक चार्वाक है। उसने ईश्वर को पुराने समय में ही चुनौती दी थी। हर व्यक्ति अपने को सही मानता है। दुर्भाग्य की बात है कि बजाय पुराने विचारकों के अनुभवों तथा विचारों को भविष्य में अज्ञानता के विरुद्ध लड़ाई का आधार बनाने के हम आलसियों की तरह, जो हम सिद्ध हो चुके हैं, उनके कथन में अविचल एवं संशयहीन विश्वास की चीख पुकार करते रहते हैं और इस प्रकार मानवता के विकास को जड़ बनाने के दोषी हैं।
सिर्फ विश्वास और अन्ध विश्वास ख़तरनाक है। यह मस्तिष्क को मूढ़ और मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है। जो मनुष्य अपने को यथार्थवादी होने का दावा करता है, उसे समस्त प्राचीन रूढ़िगत विश्वासों को चुनौती देनी होगी। प्रचलित मतों को तर्क की कसौटी पर कसना होगा। यदि वे तर्क का प्रहार न सह सके, तो टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़ेगा। तब नये दर्शन की स्थापना के लिये उनको पूरा धराशायी करकेे जगह साफ करना और पुराने विश्वासों की कुछ बातों का प्रयोग करके पुनर्निमाण करना। मैं प्राचीन विश्वासांे के ठोसपन पर प्रश्न करने के सम्बन्ध में आश्वस्त हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन परम आत्मा का, जो प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं संचालन करता है, कोई अस्तित्व नहीं है। हम प्रकृति में विश्वास करते हैं और समस्त प्रगतिशील आन्दोलन का ध्येय मनुष्य द्वारा अपनी सेवा के लिये प्रकृति पर विजय प्राप्त करना मानते हैं। इसको दिशा देने के पीछे कोई चेतन शक्ति नहीं है। यही हमारा दर्शन है। हम आस्तिकों से कुछ प्रश्न करना चाहते हैं।
यदि आपका विश्वास है कि एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और सर्वज्ञानी ईश्वर है, जिसने विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बतायें कि उसने यह रचना क्यों की? कष्टों और संतापों से पूर्ण दुनिया – असंख्य दुखों के शाश्वत अनन्त गठबन्धनों से ग्रसित! एक भी व्यक्ति तो पूरी तरह संतृष्ट नही है। कृपया यह न कहें कि यही उसका नियम है। यदि वह किसी नियम से बँधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं है। वह भी हमारी ही तरह नियमों का दास है। कृपा करके यह भी न कहें कि यह उसका मनोरंजन है। नीरो ने बस एक रोम जलाया था। उसने बहुत थोड़ी संख्या में लोगांें की हत्या की थी। उसने तो बहुत थोड़ा दुख पैदा किया, अपने पूर्ण मनोरंजन के लिये। और उसका इतिहास में क्या स्थान है? उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं? सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाये जाते हैं। पन्ने उसकी निन्दा के वाक्यों से काले पुते हैं, भत्र्सना करते हैं – नीरो एक हृदयहीन, निर्दयी, दुष्ट। एक चंगेज खाँ ने अपने आनन्द के लिये कुछ हजार जानें ले लीं और आज हम उसके नाम से घृणा करते हैं। तब किस प्रकार तुम अपने ईश्वर को न्यायोचित ठहराते हो? उस शाश्वत नीरो को, जो हर दिन, हर घण्टे ओर हर मिनट असंख्य दुख देता रहा, और अभी भी दे रहा है। फिर तुम कैसे उसके दुष्कर्मों का पक्ष लेने की सोचते हो, जो चंगेज खाँ से प्रत्येक क्षण अधिक है? क्या यह सब बाद में इन निर्दोष कष्ट सहने वालों को पुरस्कार और गलती करने वालों को दण्ड देने के लिये हो रहा है? ठीक है, ठीक है। तुम कब तक उस व्यक्ति को उचित ठहराते रहोगे, जो हमारे शरीर पर घाव करने का साहस इसलिये करता है कि बाद में मुलायम और आरामदायक मलहम लगायेगा? ग्लैडिएटर संस्था के व्यवस्थापक कहाँ तक उचित करते थे कि एक भूखे ख़ूंख़्वार शेर के सामने मनुष्य को फेंक दो कि, यदि वह उससे जान बचा लेता है, तो उसकी खूब देखभाल की जायेगी? इसलिये मैं पूछता हूँ कि उस चेतन परम आत्मा ने इस विश्व और उसमें मनुष्यों की रचना क्यों की? आनन्द लूटने के लिये? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है?
तुम मुसलमानो और ईसाइयो! तुम तो पूर्वजन्म में विश्वास नहीं करते। तुम तो हिन्दुओं की तरह यह तर्क पेश नहीं कर सकते कि प्रत्यक्षतः निर्दोष व्यक्तियों के कष्ट उनके पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है। मैं तुमसे पूछता हूँ कि उस सर्वशक्तिशाली ने शब्द द्वारा विश्व के उत्पत्ति के लिये छः दिन तक क्यों परिश्रम किया? और प्रत्येक दिन वह क्यों कहता है कि सब ठीक है? बुलाओ उसे आज। उसे पिछला इतिहास दिखाओ। उसे आज की परिस्थितियों का अध्ययन करने दो। हम देखेंगे कि क्या वह कहने का साहस करता है कि सब ठीक है। कारावास की काल-कोठरियों से लेकर झोपड़ियों की बस्तियों तक भूख से तड़पते लाखों इन्सानों से लेकर उन शोषित मज़दूरों से लेकर जो पूँजीवादी पिशाच द्वारा खून चूसने की क्रिया को धैर्यपूर्वक निरुत्साह से देख रहे हैं तथा उस मानवशक्ति की बर्बादी देख रहे हैं, जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति, जिसे तनिक भी सहज ज्ञान है, भय से सिहर उठेगा, और अधिक उत्पादन को ज़रूरतमन्द लोगों में बाँटने के बजाय समुद्र में फेंक देना बेहतर समझने से लेकर राजाआंे के उन महलों तक जिनकी नींव मानव की हड्डियों पर पड़ी है- उसको यह सब देखने दो और फिर कहे – सब कुछ ठीक है! क्यों और कहाँ से? यही मेरा प्रश्न है। तुम चुप हो। ठीक है, तो मैं आगे चलता हूँ।
और तुम हिन्दुओ, तुम कहते हो कि आज जो कष्ट भोग रहे हैं, ये पूर्वजन्म के पापी हैं और आज के उत्पीड़क पिछले जन्मों में साधु पुरुष थे, अतः वे सत्ता का आनन्द लूट रहे हैं। मुझे यह मानना पड़ता है कि आपके पूर्वज बहुत चालाक व्यक्ति थे। उन्होंने ऐसे सिद्धान्त गढ़े, जिनमें तर्क और अविश्वास के सभी प्रयासों को विफल करने की काफ़ी ताकत है। न्यायशास्त्र के अनुसार दण्ड को अपराधी पर पड़ने वाले असर के आधार पर केवल तीन कारणों से उचित ठहराया जा सकता है। वे हैं – प्रतिकार, भय तथा सुधार। आज सभी प्रगतिशील विचारकों द्वारा प्रतिकार के सिद्धान्त की निन्दा की जाती है। भयभीत करने के सिद्धान्त का भी अन्त वहीं है। सुधार करने का सिद्धान्त ही केवल आवश्यक है और मानवता की प्रगति के लिये अनिवार्य है। इसका ध्येय अपराधी को योग्य और शान्तिप्रिय नागरिक के रूप में समाज को लौटाना है। किन्तु यदि हम मनुष्यों को अपराधी मान भी लें, तो ईश्वर द्वारा उन्हें दिये गये दण्ड की क्या प्रकृति है? तुम कहते हो वह उन्हें गाय, बिल्ली, पेड़, जड़ी-बूटी या जानवर बनाकर पैदा करता है। तुम ऐसे 84 लाख दण्डों को गिनाते हो। मैं पूछता हूँ कि मनुष्य पर इनका सुधारक के रूप में क्या असर है? तुम ऐसे कितने व्यक्तियों से मिले हो, जो यह कहते हैं कि वे किसी पाप के कारण पूर्वजन्म में गधा के रूप में पैदा हुए थे? एक भी नहीं? अपने पुराणों से उदाहरण न दो। मेरे पास तुम्हारी पौराणिक कथाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। और फिर क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में सबसे बड़ा पाप गरीब होना है। गरीबी एक अभिशाप है। यह एक दण्ड है। मैं पूछता हूँ कि दण्ड प्रक्रिया की कहाँ तक प्रशंसा करें, जो अनिवार्यतः मनुष्य को और अधिक अपराध करने को बाध्य करे? क्या तुम्हारे ईश्वर ने यह नहीं सोचा था या उसको भी ये सारी बातें मानवता द्वारा अकथनीय कष्टों के झेलने की कीमत पर अनुभव से सीखनी थीं? तुम क्या सोचते हो, किसी गरीब या अनपढ़ परिवार, जैसे एक चमार या मेहतर के यहाँ पैदा होने पर इन्सान का क्या भाग्य होगा? चूँकि वह गरीब है, इसलिये पढ़ाई नहीं कर सकता। वह अपने साथियों से तिरस्कृत एवं परित्यक्त रहता है, जो ऊँची जाति में पैदा होने के कारण अपने को ऊँचा समझते हैं। उसका अज्ञान, उसकी गरीबी तथा उससे किया गया व्यवहार उसके हृदय को समाज के प्रति निष्ठुर बना देते हैं। यदि वह कोई पाप करता है तो उसका फल कौन भोेगेगा? ईष्वर, वह स्वयं या समाज के मनीषी? और उन लोगों के दण्ड के बारे में क्या होगा, जिन्हें दम्भी ब्राह्मणों ने जानबूझ कर अज्ञानी बनाये रखा तथा जिनको तुम्हारी ज्ञान की पवित्र पुस्तकों – वेदों के कुछ वाक्य सुन लेने के कारण कान में पिघले सीसे की धारा सहन करने की सजा भुगतनी पड़ती थी? यदि वे कोई अपराध करते हैं, तो उसके लिये कौन ज़िम्मेदार होगा? और उनका प्रहार कौन सहेगा? मेरे प्रिय दोस्तों! ये सिद्धान्त विशेषाधिकार युक्त लोगों के आविष्कार हैं। ये अपनी हथियाई हुई शक्ति, पूँजी तथा उच्चता को इन सिद्धान्तों के आधार पर सही ठहराते हैं। अपटान सिंक्लेयर ने लिखा था कि मनुष्य को बस अमरत्व में विश्वास दिला दो और उसके बाद उसकी सारी सम्पत्ति लूट लो। वह बगैर बड़बड़ाये इस कार्य में तुम्हारी सहायता करेगा। धर्म के उपदेशकों तथा सत्ता के स्वामियों के गठबन्धन से ही जेल, फाँसी, कोड़े और ये सिद्धान्त उपजते हैं।
मैं पूछता हूँ तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को क्यों नहीं उस समय रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है? यह तो वह बहुत आसानी से कर सकता है। उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं की लड़ने की उग्रता को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे बचाया? उसने अंग्रेजों के मस्तिष्क में भारत को मुक्त कर देने की भावना क्यों नहीं पैदा की? वह क्यों नहीं पूँजीपतियों के हृदय में यह परोपकारी उत्साह भर देता कि वे उत्पादन के साधनों पर अपना व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार त्याग दें और इस प्रकार केवल सम्पूर्ण श्रमिक समुदाय, वरन समस्त मानव समाज को पूँजीवादी बेड़ियों से मुक्त करें? आप समाजवाद की व्यावहारिकता पर तर्क करना चाहते हैं। मैं इसे आपके सर्वशक्तिमान पर छोड़ देता हूँ कि वह लागू करे। जहाँ तक सामान्य भलाई की बात है, लोग समाजवाद के गुणों को मानते हैं। वे इसके व्यावहारिक न होने का बहाना लेकर इसका विरोध करते हैं। परमात्मा को आने दो और वह चीज को सही तरीके से कर दे। अंग्रेजों की हुकूमत यहाँ इसलिये नहीं है कि ईश्वर चाहता है बल्कि इसलिये कि उनके पास ताकत है और हममें उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं। वे हमको अपने प्रभुत्व में ईश्वर की मदद से नहीं रखे हैं, बल्कि बन्दूकों, राइफलों, बम और गोलियों, पुलिस और सेना के सहारे। यह हमारी उदासीनता है कि वे समाज के विरुद्ध सबसे निन्दनीय अपराध – एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र द्वारा अत्याचार पूर्ण शोषण – सफलतापूर्वक कर रहे हैं। कहाँ है ईश्वर? क्या वह मनुष्य जाति के इन कष्टों का मज़ा ले रहा है? एक नीरो, एक चंगेज, उसका नाश हो!
क्या तुम मुझसे पूछते हो कि मैं इस विश्व की उत्पत्ति तथा मानव की उत्पत्ति की व्याख्या कैसे करता हूँ? ठीक है, मैं तुम्हें बताता हूँ। चाल्र्स डारविन ने इस विषय पर कुछ प्रकाश डालने की कोशिश की है। उसे पढ़ो। यह एक प्रकृति की घटना है। विभिन्न पदार्थों के, नीहारिका के आकार में, आकस्मिक मिश्रण से पृथ्वी बनी। कब? इतिहास देखो। इसी प्रकार की घटना से जन्तु पैदा हुए और एक लम्बे दौर में मानव। डार्विन की ‘जीव की उत्पत्ति’ पढ़ो। और तदुपरान्त सारा विकास मनुष्य द्वारा प्रकृति के लगातार विरोध और उस पर विजय प्राप्त करने की चेष्टा से हुआ। यह इस घटना की सम्भवतः सबसे सूक्ष्म व्याख्या है।
तुम्हारा दूसरा तर्क यह हो सकता है कि क्यों एक बच्चा अन्धा या लंगड़ा पैदा होता है? क्या यह उसके पूर्वजन्म में किये गये कार्यों का फल नहीं है? जीवविज्ञान वेत्ताओं ने इस समस्या का वैज्ञानिक समाधान निकाल लिया है। अवश्य ही तुम एक और बचकाना प्रश्न पूछ सकते हो। यदि ईश्वर नहीं है, तो लोग उसमें विश्वास क्यों करने लगे? मेरा उत्तर सूक्ष्म तथा स्पष्ट है। जिस प्रकार वे प्रेतों तथा दुष्ट आत्माओं में विश्वास करने लगे। अन्तर केवल इतना है कि ईश्वर में विश्वास विश्वव्यापी है और दर्शन अत्यन्त विकसित। इसकी उत्पत्ति का श्रेय उन शोषकों की प्रतिभा को है, जो परमात्मा के अस्तित्व का उपदेश देकर लोगों को अपने प्रभुत्व में रखना चाहते थे तथा उनसे अपनी विशिष्ट स्थिति का अधिकार एवं अनुमोदन चाहते थे। सभी धर्म, समप्रदाय, पन्थ और ऐसी अन्य संस्थाएँ अन्त में निर्दयी और शोषक संस्थाओं, व्यक्तियों तथा वर्गों की समर्थक हो जाती हैं। राजा के विरुद्ध हर विद्रोह हर धर्म में सदैव ही पाप रहा है।
मनुष्य की सीमाओं को पहचानने पर, उसकी दुर्बलता व दोष को समझने के बाद परीक्षा की घड़ियों में मनुष्य को बहादुरी से सामना करने के लिये उत्साहित करने, सभी ख़तरों को पुरुषत्व के साथ झेलने तथा सम्पन्नता एवं ऐश्वर्य में उसके विस्फोट को बाँधने के लिये ईश्वर के काल्पनिक अस्तित्व की रचना हुई। अपने व्यक्तिगत नियमों तथा अभिभावकीय उदारता से पूर्ण ईश्वर की बढ़ा-चढ़ा कर कल्पना एवं चित्रण किया गया। जब उसकी उग्रता तथा व्यक्तिगत नियमों की चर्चा होती है, तो उसका उपयोग एक भय दिखाने वाले के रूप में किया जाता है। ताकि कोई मनुष्य समाज के लिये ख़तरा न बन जाये। जब उसके अभिभावक गुणों की व्याख्या होती ह,ै तो उसका उपयोग एक पिता, माता, भाई, बहन, दोस्त तथा सहायक की तरह किया जाता है। जब मनुष्य अपने सभी दोस्तों द्वारा विश्वासघात तथा त्याग देने से अत्यन्त क्लेष में हो, तब उसे इस विचार से सान्त्वना मिल सकती हे कि एक सदा सच्चा दोस्त उसकी सहायता करने को है, उसको सहारा देगा तथा वह सर्वशक्तिमान है और कुछ भी कर सकता है। वास्तव में आदिम काल में यह समाज के लिये उपयोगी था। पीड़ा में पड़े मनुष्य के लिये ईश्वर की कल्पना उपयोगी होती है। समाज को इस विश्वास के विरुद्ध लड़ना होगा। मनुष्य जब अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास करता है तथा यथार्थवादी बन जाता है, तब उसे श्रद्धा को एक ओर फेंक देना चाहिए और उन सभी कष्टों, परेशानियों का पुरुषत्व के साथ सामना करना चाहिए, जिनमें परिस्थितियाँ उसे पटक सकती हैं। यही आज मेरी स्थिति है। यह मेरा अहंकार नहीं है, मेरे दोस्त! यह मेरे सोचने का तरीका है, जिसने मुझे नास्तिक बनाया है। ईश्वर में विश्वास और रोज़-ब-रोज़ की प्रार्थना को मैं मनुष्य के लिये सबसे स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ। मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा हे, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया। अतः मैं भी एक पुरुष की भाँति फाँसी के फन्दे की अन्तिम घड़ी तक सिर ऊँचा किये खड़ा रहना चाहता हूँ।
हमें देखना है कि मैं कैसे निभा पाता हूँ। मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा। जब मैंने उसे नास्तिक होने की बात बतायी तो उसने कहा, ‘'अपने अन्तिम दिनों में तुम विश्वास करने लगोगे।'’ मैंने कहा, ‘'नहीं, प्यारे दोस्त, ऐसा नहीं होगा। मैं इसे अपने लिये अपमानजनक तथा भ्रष्ट होने की बात समझाता हूँ। स्वार्थी कारणों से मैं प्रार्थना नहीं करूँगा।'’ पाठकों और दोस्तों, क्या यह अहंकार है? अगर है तो मैं स्वीकार करता हूँ।

Date Written: 1931
Author: Bhagat Singh
Title: Why I Am An Atheist (Main nastik kyon hoon)
First Published: Baba Randhir Singh, a freedom fighter, was in Lahore Central Jail in 1930-31. He was a God-fearing religious man. It pained him to learn that Bhagat Singh was a non-believer. He somehow managed to see Bhagat Singh in the condemned cell and tried to convince him about the existence of God, but failed. Baba lost his temper and said tauntingly: “You are giddy with fame and have developed and ago which is standing like a black curtain between you and the God.” It was in reply to that remark that Bhagat Singh wrote this article. First appeared in The People, Lahore on September 27, 1931.


20 May 2017

दक्षिण की एक फिल्म से क्यों थर्रा गया बॉलीवुड-सुनील मिश्र, फिल्म समीक्षक

हिंदुस्तान-19/मई/2017
तीन सप्ताह से दिलचस्प तमाशा देखने में आ रहा है।  दक्षिण से दो-तीन साल पहले बनकर आई फिल्म बाहुबली  ने जैसे बॉलीवुड की सारी प्रतिभाओं और क्षमताओं पर तुषारापात करके रख दिया था। बॉलीवुड के ही बरसों से खाली बैठे एक निर्माता उसके वितरक बन बैठे और इतना धन अर्जित किया, जितना यदि वह खुद कोई फिल्म बनाते तो भी न अर्जित कर पाते। केवल डिस्ट्रीब्यूशन से उनके चेहरे पर आर्थिक सफलता की वह मुस्कान तिर गई कि उनको बैठे-बिठाए यही लाभ का धंधा नजर आया। जबकि उनकी पहचान एक ऐसे युवा फिल्मकार के रूप में बनी हुई है, जो नए जमाने के समझ-बूझ वाले सिनेमा का जानकार है और उसकी नब्ज भी समझता है। ऐसा निर्माता एक वितरक के रूप में अपनी कमाई पर गर्व कर तो रहा था, लेकिन शायद वह यह समझने को तैयार नहीं था कि यह धंधा ही उसके परंपरागत कारोबार के लिए सबसे बड़ी चुनौती पेश कर रहा है। 
बाहुबली का निर्माण और उसके पहले संस्करण की सफलता दरअसल मुंबइया सिनेमा को आईना दिखाने वाली बड़ी घटना थी। भारतीय सिनेमा में, सिनेमा के प्रति प्रतिबद्धता, समर्पण, सिनेमा को एक बड़ा और सबसे ज्यादा सांस्कृतिक रूप से संप्रेषणीय आयाम मानकर तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम में बनने वाली अनूठी व असाधारण फिल्मों की एक परंपरा रही है। आज भी दक्षिण की ही फिल्मों को सबसे ज्यादा श्रेणियों में नेशनल अवॉर्ड मिलता है, तो इसकी वजह ही यह है कि वे सिनेमा को अपनी संस्कृति और परंपरा के विस्तार का अविभाज्य अंग मानते हैं। हिंदी सिनेमा में मुंबइया सिनेमा के साथ-साथ बरसों तक दक्षिण का पारिवारिक व सामाजिक सिनेमा चला है, जिसमें जेमिनी व प्रसाद प्रोडक्शंस जैसे घरानों के योगदान को नहीं भुला सकते।
बॉलीवुड के कलाकार 30 साल से ज्यादा समय से अपनी सुरक्षित और व्यावसायिकता की आदर्श शर्तों से भरी रोजी-रोटी दक्षिण के सिनेमा से प्राप्त करते रहे हैं। बॉलीवुड भले बहुत उदार न रहा हो, लेकिन दक्षिण के सिनेमा में बॉलीवुड के सितारों को बहुत उदारतापूर्वक अपनाया गया है। लगभग इतने ही समय से दक्षिण भाषायी फिल्मों का हिंदी में भी निर्माण होता आ रहा है, पिछले एक दशक में यह और अधिक बढ़ गया है। दक्षिण में सिनेमा के 50 दिन चलने पर निर्माता फिर से उसके हजारों-लाखों पोस्टर लगवाकर जश्न मनाता है और दर्शकों का उपकार मानता है, जब सौ दिन या सिल्वर जुबली होती है, तब तो बात अलग ही होती है। सलमान खान को भी दक्षिण से अच्छी स्क्रिप्ट की तलाश रहती है और अक्षय कुमार को भी दक्षिण से प्रेरित कहानियों ने सितारा बनाने में योगदान किया है।
ऐसे केंद्र से बाहुबली का प्रदर्शित होना सब तरफ चमत्कार की तरह प्रचारित कर दिया गया है। बाहुबली का प्रथम प्रदर्शन व उससे जुड़े कौतुहलपूर्ण प्रश्नों को देखते हुए शोले का समय याद आ गया, जिसके संवाद आज भी भुलाए नहीं जा सके हैं। पहले बाहुबली से उपजे प्रश्न का समाधान हमारे देश को इस बाहुबली में जाकर जितनी आसानी से मिल गया, वह कम हास्यास्पद नहीं है, पर यह भी उल्लेखनीय है कि दक्षिण की फिल्म निर्माण संस्थाएं व लोग सस्पेंस, रहस्य व गोपनीयता को आखिरी समय तक जाहिर नहीं होने देते। उन्हें यदि दर्शकों को अचंभित करना है, तो उसकी पूरी तैयारी होती है।
बाहुबली के दूसरे भाग के लिए पूरे देश के सिनेमाघर पूरी तरह शरणागत होकर रह गए। निर्माता, निर्देशक और सितारों ने अपना ध्यान खेल में लगाया और पलक-पांवड़े बिछाकर बाहुबली भाग-दो का स्वागत किया। सारे सिनेमाघर, सारे शो ऐसे इस फिल्म ने मुट्ठी में कर लिए जैसे दूसरी फिल्मों को देश-निकाला दे दिया गया हो। आत्महीनता और गिरे आत्मविश्वास की बात है कि इस तूफान से भयभीत दूसरे निर्माता पीठ करके खड़े हो गए। हाल यह है कि देश के हर सिनेमाघर, हर शो में सिर्फ बाहुबली। देखो तो बाहुबली, न देखो तो बाहुबली। वास्तव में यह दयनीय स्थिति है सिनेमा के लोकतंत्र के लिए, सिनेमा की संस्कृति के लिए। कहना मुश्किल है कि इसमें कितना बाहुबली का अपना बल था और कितना दूसरों की भुजाओं को काठ मार जाना।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

साभार-'हिंदुस्तान'-19/मई/2017

01 February 2016

मुझे रंजीत कात्याल ने नहीं बचाया था----विजू चेरियन, असिस्टेंट एडिटर, हिन्दुस्तान टाइम्स



साल 1990 में जब सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर हमला किया था, तो वहां से मुझे भारत सरकार ने एयरलिफ्ट किया था, और दो महीने के उस घटनाक्रम की जो यादें मेरे जेहन में हैं, वे अक्षय कुमार की फिल्म एयरलिफ्ट  से बिल्कुल मेल नहीं खातीं। यह फिल्म अभी-अभी बॉक्स ऑफिस पर आई है।
फिल्म में भारत सरकार को संवेदनहीन व अक्षम दिखाया गया है। मगर इस फिल्म को लेकर मेरा अनुभव यही है कि यह सच के कहीं आस-पास भी नहीं है। वास्तव में वह अतिसंवेदनशील बच्चा आज भी दिल से भारत का आभारी है, जिसे उस संकटग्रस्त जगह से निकाला गया था। यह जरूर है कि देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत यह फिल्म गणतंत्र दिवस पर हमारे अंदर राष्ट्रभक्ति का जज्बा बढ़ाती है। मगर मुझे दिक्कत है, तो मुख्य नायक कारोबारी रंजीत कात्याल की भूमिका से, जिन्हें फिल्म में सारा श्रेय दे दिया गया है।
एयरलिफ्ट  फिल्म मैं इसलिए देखने गया था, ताकि अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण और रोमांचक घटना को फिर से जी सकूं। जब तत्कालीन इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने अपनी ताकत दिखाने का फैसला किया, तब मैं कुवैत में एक स्कूली छात्र था। हमले के बाद मैं और मेरा परिवार कई हफ्तों तक उस मुल्क में रहे, जहां कोई कामकाजी सरकार नहीं थी और सेना की वर्दी में इराकी नौजवान मशीनगनों के साथ सड़कों पर घूमा करते थे। हमें बस में लाद दिया गया, जो रेगिस्तानी इलाके में सर्पीली सड़कों से गुजरती हुई एक रिफ्यूजी कैंप पर रुकी। यह कैंप नो-मैंस लैंड में बनाया गया था, जो इराक और जॉर्डन के बीच का रेगिस्तानी हिस्सा है। मुझे उम्मीद थी कि एयरलिफ्ट  फिल्म में इस तरह के दृश्य होंगे और मैं कह सकूंगा कि हां, मुझे वह घटना याद है या यह वाकई वैसी ही जगह है, जहां मैं रुका था। मगर अफसोस, फिल्म देखने के बाद मुझे उस डिस्क्लैमर का महत्व समझ में आया, जिसमें यह कहा गया है- इस फिल्म के सभी पात्र व घटनाएं काल्पनिक हैं। अगर किसी भी मृत अथवा जीवित व्यक्ति या स्थान के साथ इनका कोई संबंध पाया जाता है, तो यह महज संयोग है।
फिल्म में अक्षय कुमार रंजीत कात्याल की भूमिका में हैं। कुवैत पर इराकी हमले के बाद उन्हें कथित तौर पर लगभग 1.70 लाख भारतीयों (साथ में एक कुवैती और उनकी बेटी) को इराक और जॉर्डन से होते हुए कुवैत से मुंबई (तब बंबई) लाते दिखाया गया है। जैसा कि फिल्म के निर्माता भी मानते हैं कि अक्षय कुमार की भूमिका दो कारोबारी सनी मैथ्यू और एचएस वेदी के जीवन से प्रेरित है, जिन्होंने वहां से भारतीयों को निकालने में बड़ी भूमिका निभाई थी। मगर निर्देशक राजा कृष्ण मेनन ने कात्याल का ऐसा चित्रण किया है, मानो वह कोई पैगंबर हों, जो रेगिस्तान से भारतीयों को 10 बसों और 15 कारों से निकालते हैं। यह फिल्म में तथ्यों से खिलवाड़ का एक उदाहरण-भर है। 1.70 लाख भारतीयों को महज 10 बसों व 15 कारों से एक ही बार में निकालना क्या संभव है? वह बचाव अभियान कई हफ्तों तक चला था, और जैसा कि मुझे याद है, मेरे कुवैत से निकलने से पहले और बाद में भी लोग वहां से निकाले जाते रहे।
इसी तरह, 1.70 लाख भारतीयों का जो आंकड़ा दिखाया गया है, वह भी अतिशयोक्तिपूर्ण लगती है। रिपोर्ट बताती है कि यह आंकड़ा करीब 1.20 लाख ही था।
इराक ने दो अगस्त, 1990 को कुवैत पर हमला बोला था। वह जुमेरात का दिन था, और स्कूल में छुट्टी थी। स्कूली सत्र का अंतिम दिन था वह। हम खाली जगहों और बाजारों में देर तक साइकिल नहीं चला सकते थे। यहां तक कि अपने घर के नजदीक मैदान में फुटबॉल भी नहीं खेल सकते थे। हमें समुद्र के किनारे भी जाने से रोका गया था, क्योंकि ऐसी खबरें आई थीं कि सद्दाम के लड़ाकों ने उसे खोद डाला है। मगर परिवार के बड़े लोगों और बुजुर्गों का जीवन सामान्य ही था। वे गाड़ी चलाते थे और अपने ऑफिस जाते थे। मैं यहां इराक-भारत संबंधों की सराहना जरूर करूंगा कि जो गाडि़यां भारतीय चलाया करते थे, उन्हें रोका नहीं जाता था। बेशक तब खाने-पीने की चीजों का संकट हो गया था, मगर इसमें भी भारतीयों को अपनी पसंद की जगह से खाना खरीदने की अनुमति थी।
हमने 19 या 20 सितंबर को कुवैत छोड़ा। पहले हम बस से इराक के बसरा गए, जहां हमने रात के कुछ घंटे बिताए। वहां से हमें बगदाद पहुंचाया गया, जहां हमने अपनी बसें बदलीं। अगली रात हमने रेगिस्तान के बीच में बने एक कैंप में गुजारी। वहां रात में रेत की आंधी चली, जिससे सब कुछ रेत से ढक गया था; यहां तक कि टेंट और बसें भी। अगली सुबह हम नो-मैंस लैंड पहुंचे, जहां अगले दस दिनों तक के लिए टेंट नंबर ए-87 हमारा घर था। वहां संयुक्त राष्ट्र की तरफ से हमें चादर और कंबल मुहैया कराए गए, क्योंकि रेगिस्तान की रातें काफी ठंडी हो सकती थीं। ट्रकों से खाना भी बंटता था, जिसकी व्यवस्था संयुक्त राष्ट्र ने ही करवाई थी। वहां रेड क्रॉस की तरफ से चिकित्सा सुविधा भी उपलब्ध कराई गई थी। वहां से हम अम्मान के लिए रवाना हुए और वहां करीब पूरे दिन लाइन में लगने के बाद हमें मुंबई का टिकट मिला।
मुझे इस बात से ज्यादा ऐतराज नहीं है कि एयरलिफ्ट फिल्म में कुवैत से हुए बचाव अभियान की कहानी जिस तरह परोसी गई है, वह मेरी यादों से मेल नहीं खाती। मुझे दिक्कत इससे ज्यादा है कि इसमें तथ्यों से खिलवाड़ किया गया है। इसमें अपनी सुविधा के अनुसार घटनाओं को नए सिरे से गढ़ा गया है। दूसरे शब्दों में कहें, तो इस फिल्म के निर्माता नया इतिहास गढ़ रहे हैं। नाटकीयता की छौंक लगाने के चक्कर में इस पटकथा की कुछ घटनाओं को बढ़ाया गया है और नई दिल्ली की भूमिका को भी बुरी तरह से अपमानित किया गया है। आम लोगों के मन में भारतीय नेताओं और नौकरशाहों के प्रति जो आज नाराजगी है, यह फिल्म उसे बड़ी चालाकी से भुनाती है। कुवैत से भारतीयों की सुरक्षित निकासी सुनिश्चित करने में नई दिल्ली के प्रयास को यह खारिज करती है। मगर तथ्य यही है कि तत्कालीन विदेश मंत्री इंद्रकुमार गुजराल खुद इस बचाव अभियान के लिए सद्दाम हुसैन से मिले थे। इस ऑपरेशन के लिए तकलीफ और जोखिम उठाने के बावजूद उनकी चौतरफा आलोचना भी हुई, क्योंकि एक फोटो में वे दोनों एक-दूसरे के साथ गर्मजोशी से गले मिल रहे थे। बहरहाल, एयरलिफ्ट जैसी फिल्म एक उदाहरण है कि जब कोई सरकार अपनी उपलब्धियों को आम लोगों तक पहुंचाने में विफल हो जाती है और फिल्म-निर्माताओं को एक ऐतिहासिक घटना पर जनमत बनाने के लिए अकेला छोड़ दिया जाता है, तो फिर क्या होता है? हालांकि एक ऐसे देश में, जहां अपनी आस्तीन पर देशभक्ति चढ़ाना जरूरी बनता जा रहा है, वहां देशभक्ति से भरपूर दृश्यों वाली एयरलिफ्ट फिल्म आपकी उत्तेजना बढ़ाने की सही खुराक है।

साभार-'हिंदुस्तान'-01/02/2016

30 January 2016

'भारत मे लोकतन्त्र का भविष्य' -डॉ भीम राव अंबेडकर




'भारत मे लोकतन्त्र का भविष्य' शीर्षक से प्रकाशित डॉ भीम राव अंबेडकर के भाषण के अंश 26 जनवरी के 'हिंदुस्तान' से साभार प्रस्तुत हैं।
आज के समय की राजनीति का उनका सटीक पूर्वानुमान गौर करने लायक है।
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ब्बीस जनवरी, 1950 को देश सही अर्थों में आजाद हो जाएगा। उसकी आजादी का क्या होगा? क्या वह अपनी आजादी बरकरार रख पाएगा या उसे खो देगा। यह पहला विचार है, जो मेरे दिमाग में आता है। ऐसा नहीं है कि भारत कभी आजाद नहीं रहा, मुद्दा यह है कि पहले भी वह अपनी आजादी खो चुका है।
क्या यह फिर अपनी आजादी खो देगा? यह ऐसा विचार है, जो मुझे भविष्य को लेकर चिंतित कर देता है। जो चीज मुझे सबसे ज्यादा परेशान करती है, वह यह है कि भारत न सिर्फ एक बार पहले भी अपनी आजादी खो चुका है, बल्कि यह इसलिए हुआ कि इसके अपने ही कुछ लोगों ने गद्दारी की। जब मुहम्मद बिन कासिम की सेना ने हमला किया था, तो उसने धार के कुछ सेनापतियों को घूस दी थी। इन सेनापतियों ने बाद में धार के राजा की तरफ से लड़ने से इनकार कर दिया था।
एक जयचंद था, जिसने पृथ्वीराज से लड़ने के लिए मुहम्मद गोरी को आमंत्रित किया था। जब शिवाजी आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे, तो कई राजाओं ने मुगल सम्राट का साथ दिया था। जब ब्रिटिश सिख शासकों को परास्त करने की कोशिश कर रहे थे, तब प्रमुख सेनापति गुलाब सिंह चुप बैठ गया था, उस कठिन वक्त में उसने अपने राज्य की कोई मदद नहीं की।
ये विचार मुझे इसलिए भी परेशान कर रहे हैं कि जाति और तरह-तरह के विश्वासों जैसे हमारे पुराने दुश्मन तो हैं ही, साथ ही हमारे यहां अब बहुत सारे राजनीतिक दल भी होंगे, जिनका नजरिया हर मुद्दे पर एक-दूसरे का विरोधी हो सकता है। क्या भारतीय अपने देश को इन विश्वासों और मतभेदों से ऊपर रख सकेंगे? मुझे नहीं पता, लेकिन अगर पार्टियां अपने विचार को अपने देश से ऊपर रखेंगी, तो हमारी आजादी हमेशा के लिए खतरे में पड़ जाएगी। हमें इस खतरे से देश को बचाना होगा। हमें यह प्रण लेना चाहिए कि हम अपनी आजादी की रक्षा अपने खून की अंतिम बूंद तक करेंगे।
26 जनवरी,1950 से भारत एक लोकतांत्रिक देश होगा, इस अर्थ में कि यहां जनता की सरकार होगी, जनता के द्वारा होगी और जनता के लिए होगी। फिर वही विचार मेरे दिमाग में आता है कि क्या भारत अपने लोकतांत्रिक संविधान की रक्षा कर पाएगा? क्या वह इसे बरकरार रख पाएगा या खो देगा? यह दूसरा विचार मुझे और भी ज्यादा चिंतित करता है। भारत में पहले भी लोकतंत्र जैसी व्यवस्था वाले गणराज्य रहे हैं, संसदीय व्यवस्था और संसदीय परंपराएं दिखती रही हैं। लेकिन उन लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को भारत ने खो दिया। क्या वह फिर इन्हें खो देगा? भारत जैसे देश में खतरा यह भी है कि यहां कहीं लोकतंत्र ही तानाशाही का मार्ग न प्रशस्त कर दे। किसी नए लोकतंत्र के लिए यह बहुत संभव है कि वह अपना रूप तो बरकरार रखे, लेकिन वास्तव में उसकी जगह तानाशाही स्थापित हो जाए। अगर किसी जगह पर भूस्खलन होता है, तो अगली बार उसी जगह पर भूस्खलन का खतरा सबसे ज्यादा होता है।
अगर हम लोकतंत्र के रूप को ही नहीं, इसकी अंतर्वस्तु को भी बचाना चाहते है, तो हमें क्या करना चाहिए? सबसे पहला तरीका तो मेरी समझ से यह है कि हमें सांविधानिक तरीकों का इस्तेमाल सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए करना चाहिए। इसका अर्थ है कि हमें खूनी क्रांति को छोड़ देना चाहिए। इसका यह भी अर्थ है कि हमें सिविल नाफरमानी, असहयोग और सत्याग्रह जैसी चीजों को भी छोड़ देना चाहिए। जब सामाजिक और आर्थिक लक्ष्य हासिल करने के लिए कोई सांविधानिक रास्ता न हो, तो ऐसे तरीकों को जायज ठहराया जा सकता है। लेकिन जब संविधान का रास्ता सबके लिए खुला है, तो गैर-सांविधानिक तरीकों का इस्तेमाल जायज नहीं कहा जा सकता। ये तरीके अराजकता का व्याकरण रचने के अलावा कुछ नहीं करेंगे, इनको जितनी जल्दी छोड़ दिया जाए, उतना ही अच्छा है।
दूसरी चीज जो मेरे दिमाग में आ रही है, वह है जॉन स्टुअर्ट मिल की चेतावनी। यह उन लोगों के लिए है, जो लोकतंत्र को बरकरार रखना चाहते हैं। वह कहते हैं कि अपनी स्वतंत्रताओं को किसी भी शख्स, चाहे वह कितना भी महान क्यों न हो, के चरणों में कभी समर्पित न करें, उस पर विश्वास करके उसे ऐसी शक्तियां कभी न दें, जो लोकतंत्र की संस्थाओं को नीचा करती हों। किसी महान व्यक्ति ने अगर देश की बड़ी सेवा की है, तो उसके प्रति शुक्रगुजार होने में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन इसकी भी एक हद होती है। आइरिश देशभक्त डेनियल ओकोनेल के शब्दों में कहा जाए, तो कोई व्यक्ति अपने सम्मान की कीमत पर शुक्रगुजार नहीं हो सकता, कोई महिला अपनी मर्यादा की कीमत पर शुक्रगुजार नहीं हो सकती और कोई मुल्क अपनी आजादी की कीमत पर शुक्रगुजार नहीं हो सकता।
दूसरे देशों के मुकाबले भारत के लिए यह ज्यादा जरूरी है। यहां राजनीति में भी जिस तरह की भक्ति दिखाई देती है, वैसी दुनिया में और कहीं नहीं दिखाई देती। धर्म के मामले में भक्ति मुक्ति की राह हो सकती है, लेकिन राजनीति में भक्ति निश्चित तौर पर तानाशाही का रास्ता ही खोलेगी।
तीसरी चीज यह है कि हमें अपने राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र बनाना चाहिए। अगर हमने सामाजिक लोकतंत्र का आधार नहीं तैयार किया, तो राजनीतिक लोकतंत्र ज्यादा नहीं चलेगा। सामाजिक लोकतंत्र का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है एक ऐसी जीवन शैली, जो स्वतंत्रता, समता और भाईचारे के मूल्यों को मान्यता देती है। इन तीनों मूल्यों को अलग-अलग नहीं देखना होगा, इन तीनों की त्रिमूर्ति है और इनमें से एक को भी अलग कर देने का अर्थ है, लोकतंत्र के मकसद को ही पीछे छोड़ देना। स्वतंत्रता को आप बराबरी से अलग नहीं कर सकते, बराबरी स्वतंत्रता से अलग नहीं की जा सकती। इसी तरह, आप स्वतंत्रता और बराबरी को भाईचारे से अलग नहीं कर सकते। अगर बराबरी और स्वतंत्रता नहीं होगी, तो कुछ लोग बाकी पर शासन करने लगेंगे। अभी तक भारत एक ऐसा समाज है, जिसमें श्रेणीगत गैर-बराबरी है। इसलिए ऐसे कुछ लोग हैं, जिनके पास अथाह दौलत है और दूसरी तरफ ऐसे लोग हैं, जो पूरी तरह दरिद्रता में जी रहे हैं।
26 जनवरी, 1950 को हम विसंगतियों से भरे जीवन में प्रवेश करेंगे। राजनीति में हमारे यहां समता होगी, आर्थिक जीवन में विषमता होगी। राजनीति में हम एक व्यक्ति, एक वोट और हर वोट की समान अहमियत के सिद्धांत को मान्यता देंगे। लेकिन हमारी जो सामाजिक और आर्थिक संरचना है, उसके चलते हम हर व्यक्ति की समान अहमियत के सिद्धांत से दूर ही रहेंगे। अगर यह लंबे समय तक चला, तो हमारा राजनीतिक लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए जितनी जल्दी हो सके, हमें गैर-बराबरी को खत्म करना होगा।
आजादी निश्चित तौर पर खुशी का कारण होती है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आजादी ने हमें बड़ी जिम्मेदारी भी सौंपी है। आजादी का अर्थ है उस मौके को खो देना, जब हर गलत चीज की जिम्मेदारी ब्रिटिश शासकों पर थोपी जा सकती थी। अगर अब कुछ गलत होता है, तो उसके लिए कोई और नहीं, हम खुद जिम्मेदार होंगे। अब गलत होने का खतरा बहुत बड़ा है।

(संविधान सभा के समापन भाषण का संपादित अंश)

साभार-'हिंदुस्तान'-26/01/2016

~यशवन्त यश©

16 January 2016

मोबाइल और मेल का मायाजाल-पीटर फ्लेमिंग, प्रोफेसर, सिटी यूनिवर्सिटी लंदन

काम करने की लत का सबसे बुरा उदाहरण क्या हो सकता है, यह मुझे मैनेजमेंट के पूर्व सलाहकार ने बताया। उनकी टीम के एक सदस्य गैरी पर कंपनी ने दबाव डाला कि वह छुट्टी मनाने जाएं। कंपनी को उनके 'बर्नआउट' होने, यानी लगतार काम के दबाव से क्षमता चुक जाने का खतरा दिखाई दे रहा था।

यह एक ऐसी समस्या है, जो मौजूदा अर्थव्यवस्था की बड़ी बीमारी है, जिसकी भारी कीमत कंपनियों को चुकानी पड़ती है। नतीजा यह हुआ कि गैरी अपनी गर्लफ्रेंड के साथ दो हफ्ते की छुट्टी पर रवाना हो गए। जब वह छुट्टी मना रहे थे, तो कंपनी ने देखा कि उनकी ई-मेल हर 20 मिनट के अंतराल पर लगातार आ-जा रही हैं। वापस आने पर जब गैरी से इसका कारण पूछा गया, तो पता चला कि हालांकि वह एक समुद्र तट पर छुट्टियां मना रहे थे, लेकिन वह उस समुद्र तट की खूबसूरती में रमकर बैठे नहीं रह सकते थे। कुछ था, जो उनके अंदर लगातार कुलबुलाता रहता था। वह अपने साथ अपना स्मार्टफोन ले गए थे और हर कुछ समय बाद वह टॉयलेट में जाकर ई-मेल देखने और भेजने का काम करते थे। गैरी के सहयोगियों ने इस वाकये का काफी   मजा लिया, लेकिन कुछ लोगों को इस पर चिंता भी हुई।

यह कहना मुश्किल है कि ऑफिस तकनीक का यह रूप अचानक ही परेशानी, तनाव व काम का बोझ कब बन गया? जब  इसकी शुरुआत हुई, तो इसे आजादी का औजार माना जा रहा था। तब ये सोचा गया था कि चलो, सुस्त रफ्तार से आने वाले भारी-भरकम संदेशों से नाता छूटा। पर अब एक औसत कर्मचारी को लगता है कि यह एक अजीबोगरीब-सी निरंकुशता है, जिसकी लत लग जाती है। अगर आप यह समझना चाहते हैं कि इससे पीछा छुड़ाना कितना मुश्किल है, तो शहर के किसी भी कर्मचारी से कहिए कि वह लंच टाइम में अपना मोबाइल बंद कर दे, फिर पता चलेगा कि इससे कितनी तरह की परेशानियां खड़ी हो सकती हैं।

पिछले 15 साल से 'हरदम काम पर' की जो संस्कृति चल पड़ी है, उसकी सबसे अच्छी अभिव्यक्ति मोबाइल फोन है। चार्टेड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट का एक अध्ययन बताता है कि बहुत-से कर्मचारी न चाहते हुए भी अपनी सालाना छुट्टियां रद्द कर देते हैं और कार्यालय से आ जाने के बाद भी काम में लगे रहते हैं। अध्ययन बताता है कि इसी वजह से लोगों की क्षमताएं चुक रही हैं और स्वास्थ्य की समस्याएं भी पैदा हो रही हैं।

लेकिन यहां अब एक दूसरा मुद्दा है। स्मार्टफोन में ऐसा कुछ नहीं है, जो लोेगों पर ऑफिस का समय समाप्त हो जाने के बाद भी ई-मेल भेजने का दबाव बनाता हो। यह तो बस सिलिकॉन और प्लास्टिक का छोटा-सा टुकड़ा भर है। अगर हम इसे बंद नहीं कर पाते, तो इसका अर्थ है कि इस दबाव का कारण कहीं और है। बेशक इसका एक कारण यह हो सकता है कि कम लोगों से ज्यादा काम लिया जा रहा है। लागत में कटौती के दौर में कई जगह यह रोजगार नीति का स्थायी हिस्सा है। लेकिन इस बीच कई दूसरे बदलाव भी हुए हैं।

कुछ नव-उदारवादी अर्थशास्त्रियों के अनुसार, लोग अब अपने आप को इंसान मानने की बजाय 'मानव पूंजी' यानी 'ह्यूमन कैपिटल' मानने लग गए हैं। एक ऐसी पूंजी, जिसमें निवेश कभी नहीं रुकता। इसकी क्षमताएं, इसकी सोच और इसके रंग-रूप को हमेशा निखारा जा सकता है। इस पूंजी को बढ़ाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज है काम करना। काम ही ऐसा तरीका है, जिससे इसका विकास परिभाषित होता है। यही वह बिंदु है, जहां रोजगार और जीवन धीरे-धीरे एक-दूसरे में इतना घुल-मिल जाते हैं कि उन्हें अलग-अलग पहचानना मुश्किल हो जाता है। अब काम का अर्थ वह नहीं रह गया है, जिसे हम किसी सामाजिक लक्ष्य को पाने के लिए करते हैं। अब यह ऐसी गतिविधि है, जिसके अपने अलग लक्ष्य हैं। अब काम का अर्थ है हर रोज 24 घंटे सक्रिय रहना। खुद अपना शोषण करना हमें निजी स्वतंत्रता की तरह लगता है।

व्यापक अर्थ में देखें, तो तकनीक ने मानव पूंजी के आर्थिक सिद्धांत को व्यावहारिक रूप में संभव बनाया है। इसलिए कोई हैरत नहीं कि कुछ लोगों को अब अपने फोन के साथ ही सोने की आदत पड़ गई है- अगर कोई जरूरी फोन आ ही गया तो? पहनी जा सकने वाली तकनीक, अपने ऊपर प्रशासन करने के एप और सोशल मीडिया, सब इस मानव पूंजी के हिसाब से ही बनाए जा रहे हैं। इस लिहाज से यह सोचना शायद गलत है कि औद्योगिक काल के बाद का काम अतीत में फैक्टरियों में होने वाले काम की तुलना में कम मेहनत वाला है। इसमें व्यक्तित्व पर नियंत्रण को जोड़ दिया गया है, और इससे जो स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होती हैं, वे बताती हैं कि हम अब भी भौतिक मेहनत वाले समाज में ही जी रहे हैं।

ऐसे हालात में हम क्या कर सकते हैं? डेविड कैमरन के सलाहकार रहे स्टीवन हिल्टन आजकल सिलिकॉन वैली में कारोबार करते हैं। वह बताते हैं कि पिछले एक साल से वह अपने पास फोन ही नहीं रख रहे। लेकिन यह तरीका एक वैकल्पिक जीवन शैली की तरह है और हर कोई इसे नहीं कर सकता। यह एक ऐसी समस्या है, जिसे किसी आधुनिक थेरेपी या निजी आध्यात्मिक प्रयास से नहीं सुलझाया जा सकता। इसकी जड़ में आर्थिक व सामाजिक आग्रह हैं और इसे उसी स्तर पर सुलझाया जा सकता है। कुछ देशों ने ऐसे नियम-कायदे बनाए हैं, जिनमें कार्यालय की अवधि के बाद काम से संबंधित ई-मेल रोक दी गई है।
इसके पीछे का तर्क भी आर्थिक ही है, क्योंकि इसकी वजह से पैदा तनाव और बर्नआउट से उत्पादकता घटती है। कुछ कंपनियों ने यह प्रावधान किया है कि अगर कर्मचारी छुट्टी पर गया है, तो उसकी ई-मेल अपने आप डिलीट हो जाएंगी। छुट्टी से लौटने पर अगर आपको अपनी इनबॉक्स में ढेर सारी मेल दिखें, तो वे किसी मुसीबत से कम नहीं लगतीं। लेकिन यह समस्या तकनीक की पैदा की हुई नहीं है। स्मार्टफोन और ई-मेल से पैदा हुई परेशानियां दरअसल काम के प्रति हमारी उस सनक को दिखाती हैं, जहां हम सब मानव पूंजी हैं और इसे स्विच ऑफ नहीं किया जा सकता। इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है।

साभार- द गार्जियन
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


'हिंदुस्तान'-16/01/2016 संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित

06 January 2016

युद्ध् न होने देंगे भाई- रमेशराज

एटम का विस्फोट करेंगे
लेकिन गांधी बने रहेंगे
एक गाल पर थप्पड़ खाकर
दूजा गाल तुरत कर देंगे
भले भून डाले जनता को
आतंकी या आताताई
युद्ध् न होने देंगे भाई।
दुश्मन कूटे-पीसे मारे
चिथड़े-चिथड़े करे हमारे
हम केवल खामोश रहेंगे
भले युद्ध् को वो ललकारे
खुश हो चखते सिर्फ रहेंगे
हम सत्ता की दूध्-मलाई
युद्ध् न होने देंगे भाई।
कितने भी सैनिक शहीद हों
पाकिस्तान किन्तु जायेंगे
हम शरीफ के साथ बैठकर
अपनी फोटो खिंचवायेंगे
खाकर पाकिस्तानी चीनी
खत्म करें सारी कटुताई
युद्ध् न होने देंगे भाई।
अब हम को कुछ याद नहीं है
क्या थी धारा तीन सौ सत्तर
हम तो केवल इतना जानें
खून नहीं है खून का उत्तर
भगत सिंह, बिस्मिल को छोड़ो
हम गौतम-ईसा अनुयायी
युद्ध् न होने देंगे भाई।
दुश्मन आता है तो आये
हम अरि को घर आने देंगे
पार नियंत्रण रेखा के हम
सेना कभी न जाने देंगे
दुश्मन बचकर जाये हंसकर
हमने ऐसी नीति बनायी
युद्ध् न होने देंगे भाई!
यदि हम सबसे प्यार जताएं
हिंसा के बादल छंट जाएं
अपना है विश्वास इस तरह
सच्चे मनमोहन कहलाएं
भले कहो तुम हमको कायर
पाटें पाक-हिन्द की खाई
युद्ध् न होने देंगे भाई ।
 

-रमेशराज©
जनवादी लेखक संघ -फेसबुक ग्रुप से साभार