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19 January 2014

मैंने कब कहा .......

मैंने कब कहा
आसमान से
तारे तोड़ कर लाऊँगा

मैंने कब कहा मैं ही
चाँद और
मंगल पर जाऊंगा

मैंने कब कहा
अँधेरों में
रोशनी बन जाऊंगा

मैंने कब कहा
सोने पर
हीरे सा जड़ जाऊंगा

मैंने कब कहा
सीढ़ी लगा
गगन से मिल आऊँगा

मैंने कब कहा
सर्दियों में
रोज़ ही नहाऊँगा

मैंने कब कहा
अपना कहा यूं
लिख कर मिटाउंगा

मैंने कब कहा
हर पाठक के
दिमाग का दही बनाऊंगा 

मैंने जो कहा
तब कहा
कहे से मुकर जाऊंगा

मैंने अब कहा
अपने कहे पर
कहकहे लगाऊँगा

मैंने कब कहा
मेरा लिखा
पढ़ना ज़रूरी है

हूटिंग के इस दौर में
'यशवंत'
अब भागना मजबूरी है।

~यशवन्त यश©

27 April 2012

गनीमत है

बौर बन चुके आम
कीमत बस खास की है
सोच का काम तमाम
आज़ादी बकवास की है। ......
पढ़ना वढ्ना मैं न जानूँ
लढना भिड़ना जानूँ मैं
दोस्त कोई न नाता मेरा
कीमत पूरी मांगू मैं । .........
मैं मैं- मैं मैं
चें चें- पें पें
क्या लिख रहा हूँ
पता नहीं है
झेलने वाले झेल रहे हैं
क्या कहेंगे समझ नहीं है । ........
पेन टूट गया ,खो गयी डायरी
की बोर्ड की अब चढ़ी खुमारी
खटर पटर पर ब्लोगिंग श्लौगिंग
नशा है कोई या अजब बिमारी । .....
किसी को टेढ़ा टेढ़ा लगता
किसी को सीधा सधा सा अक्षर
चश्मा नाक पे चढ़ा मोटा सा
भगा नहीं सकते बैठा मच्छर। .....
हम तो ऐसे ही हैं भैया
शून्य शान सी कीमत है
पढ़ कर पके नहीं अगर आप
अपने लिये यही  गनीमत है
आपके हाथ मे छुपा जो  बैठा
उस टमाटर की कीमत है । :))))