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09 March 2020

होली मुबारक..


भंग में रंगों  की तरंगें  मुबारक
गली में नुक्कड़ों में  हुड़दंगे मुबारक।
बच्चों की टोली को ठिठोली मुबारक
ठंडाई और गुझिया की होली मुबारक।

सब ओर बरसते गुलाल मुबारक
फागों के रागों को सुर ताल मुबारक।
बुजुर्गों को यादों की हर झोली मुबारक
कहानियों और किस्सों की होली मुबारक।

मुबारक मुबारक-मुबारक मुबारक
दोस्तों को यारों की महफिल मुबारक।
अमन  और चैन की हर बोली मुबारक
जो करती है एक सबको  होली मुबारक ।

-यशवंत माथुर 




20 March 2019

क्या है असली होली?......विजय माथुर

प्रति वर्ष हर्षोल्लास के साथ होली पर्व हम  सभी मनाते हैं.इस होली पर हम सब आप सब को बहुत-बहुत मुबारकवाद देते हैं.तमाम तरह की बातें तमाम दन्त-कथाएं होली के सम्बन्ध में प्रचलित हैं.लेकिन वास्तव में हम होली क्यों मनाते हैं.HOLY =पवित्र .जी हाँ होली पवित्र पर्व ही है.जैसा कि हमारे कृषी-प्रधान देश में सभी पर्वों को फसलों के साथ जोड़ा गया है उसी प्रकार होली भी रबी की फसल पकने पर मनाई जाती है.गेहूं चना जौ आदि की बालियों को अग्नि में आधा पका कर खाने का प्राविधान है.दरअसल ये अर्ध-पकी बालियाँ ही 'होला' कहलाती है संस्कृत का 'होला' शब्द ही होली का उद्गम है.इनके सेवन का आयुर्वेदिक लाभ यह है कि आगे ग्रीष्म काल में 'लू' प्रकोप से शरीर की रक्षा हो जाती है.वस्तुतः होली पर्व पर चौराहों पर अग्नि जलाना पर्व का विकृत रूप है जबकि असल में यह सामूहिक हवन(यज्ञ) होता था.विशेष ३६ आहुतियाँ जो नयी फसल पकने पर राष्ट्र और समाज के हित के लिए की जाती थीं और उनका प्रभाव यह रहता था कि न केवल अन्न धन-धान्य सर्व-सुलभ सुरक्षित रहता था बल्कि लोगों का स्वास्थ्य भी संरक्षित होता था.लेकिन आज हम कर क्या रहे है.कूड़ा-करकट टायर-ट्यूब आदि हानिकारक पदार्थों की होली जला रहे हैं.परिणाम भी वैसा ही पा रहे हैं.अग्निकांड अति वर्षा बाढ़-सूखा चोरी -लूट विदेशों को अन्न का अवैद्ध परिगमन आदि कृत गलत पर्व मनाने का ही दुष्फल हैं.संक्रामक रोग और विविध प्रकोप इसी का दुष्परिणाम हैं.

इस पर्व के सम्बन्ध में हमारे पोंगा-पंथी बन्धुओं ने 'प्रह्लाद' को उसके पिता द्वारा उसकी भुआ के माध्यम से जलाने की जो कहानी लोक-प्रिय बना रखी है उसके वैज्ञानिक मर्म को समझने तथा मानने की आवश्यकता है न कि बहकावे में भटकते रहने की.लेकिन बेहद अफ़सोस और दुःख इस बात का है कि पढ़े-लिखे विद्व-जन भी उसी पाखंड को पूजते एवं सिरोधार्य करते हैं,सत्य कथन/लेखन को 'मूर्खतापूर्ण कथा' कह कर उपहास उड़ाते हैं और लोगों को जागरूक नहीं होने देना चाहते हैं.इसी विडम्बना ने हमारे देश को लगभग हजार वर्षों तक गुलाम बनाये रखा और आज आजादी के ६३ वर्ष बाद भी देशवासी उन्हीं पोंगा-पंथी पाखंडों को उसी प्रकार  चिपकाये हुए हैं जिस प्रकार बन्दरिया अपने मरे बच्चे की खाल को चिपकाये  फिरती रहती है.

जैसा कि'श्री मद देवी भागवत -वैज्ञानिक व्याख्या' में पहले ही स्पष्ट किया गया है-हिरण्याक्ष और हिरणाकश्यप कोई व्यक्ति-विशेष नहीं थे.बल्कि वे एक चरित्र का प्रतिनिधित्व करते हैं जो पहले भी थे और आज भी हैं और आज भी उनका संहार करने की आवश्यकता है .संस्कृत-भाषा में हिरण्य का अर्थ होता है स्वर्ण और अक्ष का अर्थ है आँख अर्थात वे लोग जो अपनी आँखे स्वर्ण अर्थात धन पर गडाये रखते हैं हिरण्याक्ष कहलाते हैं.ऐसे व्यक्ति केवल और केवल धन के लिए जीते हैं और साथ के अन्य मनुष्यों का शोषण  करते हैं.आज के सन्दर्भ में हम कह सकते हैं कि उत्पादक और उपभोक्ता दोनों का शोषण करने वाले व्यापारी और उद्योगपति गण ही हिरण्याक्ष  हैं.ये लोग कृत्रिम रूप से वस्तुओं का आभाव उत्पन्न करते है और कीमतों में उछाल लाते है वायदा कारोबार द्वारा.पिसती है भोली और गरीब जनता.


एक और   तो ये हिरण्याक्ष लोग किसान को उसकी उपज की पूरी कीमत नहीं देते और उसे भूखों मरने पर मजबूर करते हैं और दूसरी और कीमतों में बेतहाशा वृद्धी करके जनता को चूस लेते हैं.जनता यदि विरोध में आवाज उठाये तो उसका दमन करते हैं और पुलिस -प्रशासन के सहयोग से उसे कुचल डालते हैं.यह प्रवृति सर्व-व्यापक है -चाहे दुनिया का कोई देश हो सब जगह यह लूट और शोषण अनवरत हो रहा है.
'कश्यप'का अर्थ संस्कृत में बिछौना अर्थात बिस्तर से है .जिसका बिस्तर सोने का हो वह हिरण्यकश्यप है .इसका आशय यह हुआ जो धन के ढेर पर सो रहे हैं अर्थात आज के सन्दर्भ में काला व्यापार करने वाला व्यापारी और घूसखोर अधिकारी (शासक-ब्यूरोक्रेट तथा भ्रष्ट नेता दोनों ही) सब हिरण्यकश्यप हैं.सिर्फ ट्यूनीशिया,मिस्त्र और लीबिया के ही नहीं हमारे देश और प्रदेशों के मंत्री-सेक्रेटरी आदि सभी तो हिरण्य कश्यप हैं.प्रजा का दमन करना उस पर जुल्म ढाना यही सब तो ये कर रहे हैं.जो लोग उनका विरोध करते हैं प्रतिकार करते है सभी तो उनके प्रहार झेलते हैं.

अभी 'प्रहलाद' नहीं हुआ है अर्थात प्रजा का आह्लाद नहीं हुआ है.आह्लाद -खुशी -प्रसन्नता जनता को नसीब नहीं है.करों के भार से ,अपहरण -बलात्कार से,चोरी-डकैती ,लूट-मार से,जनता त्राही-त्राही कर रही है.आज फिर आवश्यकता है -'वराह अवतार' की .वराह=वर+अह =वर यानि अच्छा और अह यानी दिन .इस प्रकार वराह अवतार का मतलब है अच्छा दिन -समय आना.जब जनता जागरूक हो जाती है तो अच्छा समय (दिन) आता है और तभी 'प्रहलाद' का जन्म होता है अर्थात प्रजा का आह्लाद होता है =प्रजा की खुशी होती है.ऐसा होने पर ही हिरण्याक्ष तथा हिरण्य कश्यप का अंत हो जाता है अर्थात शोषण और उत्पीडन समाप्त हो जाता है.

अब एक कौतूहल यह रह जाता है कि 'नृसिंह अवतार' क्या है ? खम्बा क्या है?किसी चित्रकार ने समझाने के लिए आधा शेर और आधा मनुष्य वाला चित्र बनाया होगा.अगर आज हमारे यहाँ ऐसा ही होता आ रहा है तो इसका कारण साफ़ है लोगों द्वारा हकीकत को न समझना.बहरहाल हमें चित्रकार के मस्तिष्क को समझना और उसी के अनुरूप व्याख्या करना चाहिए.'खम्बा' का तात्पर्य हुआ उस जड़ प्रशासनिक व्यवस्था से जो जन-भावनाओं को नहीं समझती है और क्रूरतापूर्वक उसे कुचलती रहती है.जब शोषण और उत्पीडन की पराकाष्ठा हो जाती है ,जनता और अधिक दमन नहीं सह पाती है तब क्रांति होती है जिसके बीज सुषुप्तावस्था में जन-मानस में पहले से ही मौजूद रहते हैं.इस अवसर पर देश की युवा शक्ति सिंह -शावक की भाँती ही भ्रष्ट ,उत्पीड़क,शोषक शासन-व्यवस्था को उखाड़ फेंकती है जैसे अभी मिस्त्र और ट्यूनीशिया में आपने देखा-सुना.लीबिया में जन-संघर्ष चल ही रहा है.१७८९ ई. में फ़्रांस में लुई १४ वें को नेपोलियन के नेतृत्व में जनता ने ऐसे ही  उखाड़  फेंका था.अभी कुछ वर्ष पहले वहीं जेनरल डी गाल की तानाशाही को मात्र ८० छात्रों द्वारा पेरिस विश्वविद्यालय से शुरू आन्दोलन ने उखाड़ फेंका था.इसी प्रकार १९१७ ई. में लेनिन के नेतृत्व में 'जार ' की जुल्मी हुकूमत को उखाड़ फेंका गया था. १८५७ ई. में हमारे देश के वीरों ने भी बहादुर शाह ज़फ़र,रानी लक्ष्मी बाई ,तांत्या टोपे,अवध की बेगम आदि-आदि के नेतृत्व में क्रांति की थी लेकिन उसे ग्वालियर के  सिंधिया,पजाब के सिखों ,नेपाल के राणा आदि की मदद से साम्राज्यवादियों ने कुचल दिया था.कारण बहुत स्पष्ट है हमारे देश में पोंगा-पंथ का बोल-बाला था और देश में फूट थी.इसी लिए 'प्रहलाद' नहीं हो सका.

आज के वैज्ञानिक प्रगति के युग में यदि हम ढकोसले,पाखण्ड आदि के फेर से मुक्त हो सकें सच्चाई  को समझ सकें तो कोई कारण नहीं कि आज फिर जनता वैसे ही आह्लादित न हो सके.लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि हमारे देश में आज स्वंयभू भगवान् जो अवतरित हो चुके है (ब्रह्माकुमारी,आनंद मार्ग,डिवाईन लाईट मिशन,आशाराम बापू,मुरारी बापू ,गायत्री परिवार, साईं बाबा ,राधा स्वामी  आदि -आदि असंख्य) वे जनता को दिग्भ्रमित किये हुए हैं एवं वे कभी नहीं चाहते कि जनता जागे और आगे आकर भ्रष्ट व्यवस्था को उखाड़ फेंके.

विकृति ही विकृति-होली के पर्व पर आज जो रंग खेले जा रहे हैं वे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं जबकि रंग खेलने का उद्देश्य स्वास्थ्य रक्षा था.टेसू (पलाश) के फूल रंग के रूप में इस्तेमाल करते थे जो  रोगों से त्वचा की रक्षा करते थे और आने वाले प्रचंड ताप के प्रकोप को झेलने लायक बनाते थे.पोंगा-पंथ और  पाखण्ड वाद ने यह भी समाप्त कर दिया एवं खुशी व उल्लास के पर्व को गाली-गलौच का खेल बना दिया. जो लोग व्यर्थ दावा करते हैं  -होली पर सब चलता है वे अपनी हिंसक और असभ्य मनोवृतियों को रीति-रस्म का आवरण पहना देते हैं. आज चल रहा फूहण पन भारतीय सभ्यता के सर्वथा विपरीत है उसे त्यागने की तत्काल आवश्यकता है.काश देशवासी अपने पुराने गौरव को पुनः  प्राप्त करना चाहें !
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साभार-क्रांतिस्वर 

ऐसे ये होली मन जाए

फिर से लौट आए वो बचपन
फिर से वो टोली बन जाए
गिला या शिकवा हो न मन में
ऐसे ये होली मन जाए।

भाईचारे का अबीर गुलाल
सबको सतरंगी कर दे
फागुन की मद-मस्ती सबको
ढेरों खुशियों से भर दे ।

फिर से लौट आए वो मंजर
फिर से मीठी बोली बन जाए
सदभाव ही केवल रहे इस मन में
ऐसे ये होली मन जाए।

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होली की हार्दिक शुभकामनाएँ!

-यश ©

26 March 2013

अपने मियां मिट्ठू बन लूँ

इस होली पर रंग बिरंगी
पोस्टों में से कुछ को चुन लूँ
चुन चुन चुग चुग कर पढ़ कर
एक पन्ने पर सब को धर कर 
रंग बिरंगा कवर बना कर
उस पर अपना नाम सजा कर
एक किताब की रचना कर लूँ
अपने मियां मिट्ठू बन लूँ।

पीकर गुझिया,ठंडाई खा कर 
और मिठाई में भांग मिला कर
गुब्बारों मे चाशनी भर कर
जो गुजरे मूंह मीठा कर दूँ
अपने मियां  मिट्ठू बन लूँ।

इस होली पर रंग बिरंगी
पोस्टों में से कुछ को चुन लूँ
इधर उधर की सुन सुन कर के
थोड़ी देखा देखी कर के 
मन भर कागज रद्दी कर के
कर सहित कुल कीमत बिक लूँ
या दुकान पर यूं ही सज कर
अपने मियां मिट्ठू बन लूँ। 

(आप सभी को होली शुभ और मंगलमय हो)

~यशवन्त माथुर©

20 March 2011

एक पत्र

माई डियर मैं,
कहीं तुम तो बौराये हुए नहीं हो?मुझे कुछ शक है वो इसलिए कि इस बार आम यूँ तो देर से बौराया है लेकिन अपने से श्रेष्ठ खास लोगों की तरह कहीं तुम जैसा आम न बौरा गया हो इस होली पर.वैसे एक बात तो है तुम आम हो ही नहीं सकते क्यों कि देखने में तुम सूखी पतली सी  डंडी को भी पीछे छोड़  देते हो ; खाने पीने की तुम्हें कोई कमी नहीं है पर तुम तो यार बस तुम ही हो. तुम खास भी  नहीं हो सकते जो भी लिखते हो ,बोलते हो सिरे से बकवास है हाँ तुम्हारी किस्मत कुछ  खास है कि इतने अच्छे अच्छे लोग  तुम्हारे साथ हैं.लेकिन मेरी भी खासियत देखो मुझे लगता है मैं तुम्हारी खिंचाई कुछ अच्छी तरह से कर सकता हूँ.

और बताओ क्या हो रहा है? मैं जानता हूँ तुम यही कहोगे कुछ खास नहीं.हाँ जो खास नहीं वो खास कर भी कैसे सकता है.और हाँ कभी अपने को खास समझने की गलती करना भी मत देख रहे हो न भारत की करकट;ओह्ह माफ करना क्रिकेट टीम को .दुनिया की सबसे खास बैटिंग टिकी हुई है सिर्फ दो खास पर सचिन और सहवाग पर और साढे ग्यारह (सारे ग्यारह)अपने को पूरे बारह समझने लग रहे हैं.कहीं तुम यही न कर बैठना .दो बकवास में एक खास के आनुपातिक समीकरण से लिखते चलते हो और समझते हो अपने को राजा.जबकि असलियत में तुम अपना ही बाजा बजा रहे होते हो.अरे राजा समझना ही है तो ए राजा को समझो और सीखो .लेकिन सब बेकार है तुम्हारे आगे-एक कार तो है नहीं तुम्हारे पास.

खैर मैं अब तुम को और नहीं झेलाउँगा.एक काम करो यहाँ से निकल चलो .कहीं ऐसा न हो इस होली पर रंग के बजाये तुम को सड़े टमाटर ईमेल और टिप्पणी से भेजे जाएँ और तुम गाने लगो -
मैंने सोचा न था ...मैंने सोचा न था ...

अपना ख्याल रखना.

होली की शुभ कामनाओं के साथ -
तुम्हारा अपना
मैं

19 March 2011

वो बीती होली....

वो बचपन की होली
दोस्तों संग ठिठोली
वो मस्ती वो उल्लास
वो अबीर वो गुलाल
गुब्बारों की मार
पिचकारी की फुहार
वो गुझियों पर टूट पड़ना
और ठूंस ठूंस कर खाना
बे फ़िक्र होकर घूमना
ठंडाई के लिए लड़ना
और हंसना
भांग के नशे में झूमते
हुडदंगियों को देख कर

वो रंगे पुते चेहरे
जो एहसास कराते
बीस दिनों तक
होली की ताजगी का

याद  आते हैं वो दिन
जो अब  दुर्लभ हैं
होली अब भी है
पर बेशर्म हुडदंग हैं
और उत्साह
कुछ घंटों का है
क्योंकि
सब व्यस्त हैं
घड़ी की सुइयों से
तेज चलने की
राहें  तलाशने में!

आप सभी प्रबुद्ध पाठकों को सपरिवार होली की हार्दिक शुभकामनाएं !
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