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30 November 2010

तरस जाता हूँ

कभी
हरे भरे ऊंचे पेड़
कुछ आम के
कुछ  नीम के
कुछ बरगद और
गुलमोहर के
दिखाई देते थे
घर की छत से

(फोटो:साभार गूगल)

 सड़क पर चलते हुए
 कहीं से आते हुए
कहीं को जाते हुए
कभी गरमी की
तपती धूप में
कभी तेज बरसते पानी में
या कभी
यूँ ही थक कर
कुछ देर को मैं
छाँव में बैठ जाता था

पर अब
बढती विलासिताओं ने
महत्वाकांक्षाओं ने
कंक्रीट की दीवारों ने
कर लिया है
इन पेड़ों का शिकार

(मोबाइल फोटो:मेरे घर की छत से)

ये अब दिखाई नहीं देते
घर की छत से
और न ही
किसी सड़क के किनारे
अब इन्हें पाता हूँ

दो पल के सुकून को
मैं तरस जाता हूँ.




(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)