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09 January 2013

अभावों के भाव

अभावों के भाव
इसी मौसम में बढ़ते हैं
जब ‘नाम’ की उम्मीद में भाव
दर दर भटकते हैं

कहीं कंबल ऊनी
कहीं कागजी दुशाले हैं किस्मत में
रैन बसेरों में
सीले अलाव भी ठिठुरते हैं

हैं वो ही ‘यशवंत’
जो बंद कमरों में बैठ कर
आरंभ से अंत तक
बेतुकी लिखा करते हैं

अभावों के भाव
इसी मौसम में बढ़ते हैं
जब भरी धूप में भाव
बर्फ से जमते हैं ।
©यशवन्त माथुर©

08 January 2013

क्षणिका

खामोशी में
घड़ी की
डरावनी टिक टिक 
न जाने कैसा
आनंद पाती है
कभी न थमने में।

 ©यशवन्त माथुर©

07 January 2013

खानाबदोश कौन ?

खानाबदोश कौन ?
वो जो
आवारा जानवरों की तरह
सड़क किनारे भटकते हैं
दो जून की रोटी को  !
या
खानाबदोश मैं ?
जो हर पल भटक रहा हूँ
दर बदर  
अस्तित्व की तलाश में!
©यशवन्त माथुर©

06 January 2013

अजीब सी धुन .....

मन को लुभाने वाली
संगीत की धुन 
उस वक़्त अजीब सी लगती है 
जब कानों में गूंजने वाली 
मीठी स्वरलहरियाँ 
राह से भटक कर
धर लेती है रूप 
फटे बांस की आवाज़ जैसा :) 
 ©यशवन्त माथुर©

05 January 2013

कुछ प्रश्न

कुछ प्रश्न
हमेशा
सिर्फ प्रश्न ही रहते हैं 
क्योंकि
उनके उत्तरों में लगा
प्रश्न चिह्न
कभी मिटने नहीं देता
अपना अबूझ
अस्तित्व!

©यशवन्त माथुर©

04 January 2013

सफर की दास्तान....

बड़े अजीब से
इन रास्तों पर चल कर
कभी गिर कर
कभी संभल कर
ज़रूरी नहीं कि कोई
इनसां ही
बने हमसफर ...
किनारे गिरे पड़े
टेढ़े मेढ़े पत्थर
पैरों की
खाते हुए ठोकर
सुना सुना कर
खटर पटर
संगीत की तान....
कर देते हैं पूरी
इस सफर की दास्तान।
©यशवन्त माथुर©

03 January 2013

क्षणिका .....

सवेरा कब का हो गया
फिर भी
कोहरे के आँचल तले
अब तक
धूप सो रही है
ले रही है 
मंद हवा के खर्राटे
बता रही है
पेड़ों की हिलती पत्तियों को 
कि आलसी
सिर्फ
इंसान ही नहीं होता। 

 ©यशवन्त माथुर©

02 January 2013

क्षणिका.....

सोच रहा हूँ
ख्वाबों के दल दल से
बाहर आ कर
काल्पनिक दुनिया के
पार आ कर
चुभीली सच्चाई से
हाथ मिला कर
अब कर ही लूँ दोस्ती
वक़्त की
उठती गिरती
लहरों से ।

©यशवन्त माथुर©

01 January 2013

कैसे करूँ स्वागत ?

भोर की पहली किरण
कहीं धुंध
और कहीं खिली धूप
कहीं चिड़ियों का चहचहाना
अपनी ही मस्ती मे
चलते जाना
गाते जाना
स्वागत गीत
कितने सारे
बिंबों के साथ
कितने सारे
चित्रों के साथ
कुछ वास्तविक
कुछ काल्पनिक
कुछ कविता
कुछ कहानी
और कुछ
उड़ते
बिखरते शब्दों का साथ
कर रहा है स्वागत
नव वर्ष का  !

पर
सुखांत के इन बिंबों मे
इन चित्रों मे
कविता मे
कहानी मे 
डाल पर बैठी
उस चिड़िया के गीतों मे
एक रूप
एक स्वर
एक मुस्कुराहट
एक खुशी
अगर 'उसकी'
भी होती ......
एक गीत
अगर
उसके भी मन का होता....
उसके अपनों का  होता....
तो कैसा होता ?
कितना अच्छा होता
नव वर्ष-
तुम्हारा स्वागत
आज के दिन !

अफसोस !
तुम आए हो
उस वक़्त 
जब
लाखों प्रार्थनाओं
की हार पर 
लाखों दुआओं
की हार पर
बे सिर पैर की
रार के बीच
छाया हुआ है
कुछ छद्म
और 
कुछ वास्तविक 
मौन
एक कोने से
दूसरे कोने तक
पत्थरों के भी
रूदन के बीच
नव वर्ष !
अब तुम्ही बता दो
कैसे करूँ
स्वागत ?

©यशवन्त माथुर©