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14 May 2015

खुद से ही बहुत दूर.....

खुद से कहीं दूर
थोड़ा हैरान
थोड़ा परेशान
खुद को पाने के
हर जतन
करता हुआ
रेतीली राहों पर
चलता हुआ 
हर पल
जीने की कोशिश में
साथ लिए 
भीतर थोड़ा दर्द
सामने थोड़ी मुस्कान 
खुद के कुछ नजदीक
खुद को छूने की
कोशिश करता हुआ 
न जाने क्यों
होता जा रहा हूँ
खुद से ही बहुत दूर।

~यशवन्त यश©

09 May 2015

कुछ लोग -16

बहुत सस्ते होते हैं 
कुछ लोग
जो बिताया करते हैं
अंधेरी रातें
फुटपाथों पर
और दिन में
झुलसा करते हैं
घिसटा करते हैं
डामर वाली
चमकदार सड़कों पर
चमका करते हैं
चाँद के चेहरे पर
कील मुहांसों की तरह।

ये सस्ते लोग
खुदा,गॉड और
भगवान नहीं
सिर्फ एक
ऊपर वाले के
हाथों से ढल कर
परीक्षक बन कर
धरती पर
आते हैं 
और फिर
वापस चले जाते हैं
साहब लोगों की
चमचमाती कारों के
काले टायरों की
पैमाइश ले कर।

ये सस्ते लोग
आवारा कटखने
श्वानों का तकिया
सिरहाने रख कर
हर रोज़
चैन की नींद सोते हैं
क्योंकि
इन्हें कोई डर नहीं होता 
चेहरे से
नकाब के हटने का।

~यशवन्त यश©

05 May 2015

कुछ लोग -15

रेत के महलों के भीतर
आसन जमाए
कुछ लोग
सिर्फ देख सकते हैं
काल्पनिक चलचित्र
जिनमें
अच्छा ही अच्छा
सब कुछ
सकारात्मक
सुलझा हुआ
और सिकुड़न मुक्त होता है
लेकिन नहीं जानते
कि यह सब दृश्य
परिणाम हैं
उनके खौफ
या प्रभाव के
जिसका अंत
संभव है
तेज़ हवा के
सिर्फ एक
झोंके से ।

~यशवन्त यश©

01 May 2015

क्योंकि मैं मज़दूर हूँ -(मई दिवस विशेष)

ढोता हूँ
दिन भर
ईंट,पत्थर और गारा 
अपने घर का
और नयी इमारत का सहारा
मैं नहीं वह बेचारा
जो नायक है
काल्पनिक चलचित्रों
कविताओं
और कहानियों का
जो अपने सुखांत
और दुखांत के बीच
मेरे जीवन की
अनकही
अनजानी रेखाओं को
सरे बाज़ार 
नीलाम करने के बाद भी
रखती नहीं
एक धेला
मेरी कर्मठ
काली
मांसल हथेलियों  पर .....

मैं
समय की
अनंत ऊंचाई पर बंधी
महीन रस्सी पर
चल कर
संघर्ष के
सँकरे रस्तों से गुज़र कर 
रोज़ मिलता हूँ
जीवन और मृत्यु से....
अपने  और अपनों के
सुनहरे कल की
चाहत लिये
हजारों की भीड़ में 
कहीं हमकदम
गुमनाम हो कर
खून पसीना पी कर 
ठोकरें खा कर
चुन जाता हूँ
किसी नींव में
किसी दीवार में
फिर भी नज़र नहीं आता हूँ
इतिहास के
किसी गर्द भरे
पन्ने पर
क्योंकि
मैं
मज़दूर!
दूसरों को
उनकी मंज़िल दे कर
बहुत दूर हूँ
खुद की मंज़िल से। 

~यशवन्त यश©

27 April 2015

यूं ही जीता चलता हूँ

यहीं कहीं
कभी कभी
मन के
एक कोने मे
छुप कर
जी भर
बातें करता हूँ
खुद से ही
अनकही को
कहता हूँ
अंधेरों से भरे
सुनसान रस्तों पर
डरता हूँ
मगर चलता हूँ
हताशा-निराशा के पलों में
झुरमुटों की ओट से
किसी रोशनी की
तमन्ना
और उम्मीद लिये
अपने मन की
सुनता चलता हूँ
यूं ही जीता चलता हूँ। 

~यशवन्त यश©

16 April 2015

सूने खेतों को अब सिसक कर रोना ही होगा.......

सूने खेतों को अब सिसक कर रोना ही होगा
चूल्हे की आग को दिल में जलना ही होगा
नहीं यहाँ कोई कि जो पी सके आंसुओं को
मजबूरी को हर हाल में बहना ही होगा।

~यशवन्त यश©

12 April 2015

कुछ लोग-14

अपने आप से ही
कई अनुमान
लगाने वाले
कुछ लोग
अपने गुमान में खो कर
कभी कभी
करने लगते हैं
दूसरों के
अस्तित्व पर प्रहार
और खुद हो जाते हैं शिकार
वक़्त की तीखों चोट का
क्योंकि
वक़्त
अपने भीतर
समाए हुए है
सही गलत का
पूरा लेखा जोखा
जिसे मिटाना
संभव नहीं
किसी भी
पैबंद से। 

~यशवन्त यश©

08 April 2015

बदलता ज़माना .....

कभी
किसी जमाने में
निकला करते थे
सूरज और चाँद
पेड़ों की
या
पहाड़ों की
ओट से
हँसते मुस्कुराते हुए
अपनी गरमाहट
और ठंडक से 
दिया करते थे
शांति 
झुलसते या
ठिटुरते मन को ....
और अब
आज के
इस दौर में
चाँद और
सूरज पर
दिखने लगा है
असर
समय के
संक्रमण का  .....
दोनों
निकलते हैं
अब भी
अपने समय से 
एक उदासी के साथ
तलाशते हैं
हरी पत्तियों का
स्वागत हार
लेकिन
अब इनके
चेहरे के सामने
हर सुबह और शाम 
खड़ी होती है 
सीमेंट की
ऊंची दीवार 
जिसके उस पार
प्रकृति से बेपरवाह
हम सब
उलझे रहते हैं
बदलते जमाने की
भूल भुलैया में। 
 
~यशवन्त यश©

01 April 2015

मूर्ख कौन ?

मूर्ख कौन ?

वह ?
जो दिन रात एक करके
खून पसीने से
सींचता है
खेतों में
लहलहाती फसलों को
और बदले में
झेलता है
आँधी-पानी
तीखे कटाक्ष
खाता है
समय की तीखी मार
और हो जाता है शरणागत
मृत्यु देवी के चरणों में......

या
मूर्ख
वह ?
जिसकी पोटली में
भरे रहते हैं
झूठ के
अनंत आश्वासन
और उसकी निगाहें
ताकती हैं मौका
किसी की
बंजर -उर्वर
धरती को
छलनी करके
आंसुओं की नींव पर
सपनों की
दुनिया सजाने का ....

जो भी हो
मूर्ख
और मूर्खता
जड़ मूल हैं
किसी की विपत्ति
और
किसी की समृद्धि का
क्योंकि
विकास और विनाश
संभव नहीं
सीधे सादे
तरीकों से
आज के समय में।

~यशवन्त यश©